Explainer: ईरान पर अमेरिका नहीं, अब चीन लगाएगा लगाम? ड्रैगन की अगली चाल पर खाड़ी देशों की नजर
पश्चिम एशिया में जारी ईरान और अमेरिका युद्ध में अब ड्रैगन की एंट्री होने वाली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हूती होर्मुज और बॉव अल मंडेब में बढ़ते खतरे के बीच खाड़ी देशों ने चीन को इस मामले में हस्तक्षेप करने का निमंत्रण दिया है।

पश्चिम एशिया का युद्ध पिछले पांच महीनों से बदस्तूर जारी है। अमेरिकी मिसाइलों के लगातार हमले सहने के बाद भी ईरान झुकने को तैयार नहीं है। दूसरी तरफ होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के बाद वैश्विक ऊर्जा व्यापार के हालात और भी ज्यादा खराब हो चुके हैं। रही सही कसर यमन के हूती विद्रोहियों की तरफ से आई उस खबर ने पूरी कर दी, जिसमें कहा गया कि अब वह बॉव अल मंडेब पर भी टोल टैक्स लगाने की योजना बना रहे हैं। होर्मुज और बॉव अल मंडेब पर टैक्स लगने की खबर सबसे ज्यादा खाड़ी देशों को परेशान करने वाली है। क्योंकि इनका ज्यादातर तेल इन्हीं रास्तों के जरिए जाता है। अमेरिका पहले ही ईरान के साथ युद्ध में उलझा हुआ है। लेकिन इसके बाद भी उसे झुकाने में समर्थ नहीं है। ऐसे में अब खाड़ी देशों की नजर बीजिंग के ऊपर है कि आखिर कैसे ड्रैगन तेहरान पर दबाव बनाकर उनके रास्ते फिर से खोल सकता है।
अमेरिका के साथ युद्ध के दौरान तनाव के माहौल के बीच चीन हमेशा ही ईरान का सबसे बड़ा साथी और खरीददार रहा है। वह अमेरिका की तमाम धमकियों के बीच अभी भी ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीददार है। वह लगातार इस युद्ध से दूरी बनाकर रखे हुए है, लेकिन इसके बाद भी उसके तेल के जहाज ईरान बड़ी ही आसानी के साथ निकलने दे रहा है। ऐसे में खाड़ी देश अब उसकी तरफ देख रहे हैं कि चीन कैसे इस मामले में उनकी मदद कर सकता है। क्योंकि पिछले चार महीनों में खाड़ी देश यह देख चुके हैं कि ईरान को अमेरिका या इजरायल द्वारा नहीं रोका जा सकता।
खाड़ी देशों ने चीन से हस्तक्षेप करने की अपील की
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जिस वक्त होर्मुज और बॉव अल मंडेब पर ईरान और हूती विद्रोहियों ने टोल टैक्स लगाने और बंद करने की अपील की। उसके तुरंत बाद ही खाड़ी देशों ने इस मुद्दे पर चीन को हस्तक्षेप करने के लिए आमंत्रित कर लिया है। इस मामले पर चीनी विदेश मंत्रालय द्वारा एक बयान जारी करके कहा गया कि वह सभी पक्षों के साथ बातचीत कर रहा है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी भी लगातार खाड़ी देशों के नेताओं के साथ बातचीत कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, खाड़ी देश चाहते हैं कि चीन अपने आर्थिक ताकत का प्रयोग करके ईरान पर दबाव बनाए। ताकि इन देशों का तेल व्यापार फिर से शुरू हो सके।
इन देशों को उम्मीद है कि चूंकि ईरान अपना ज्यादातर तेल चीन को ही बेचता है। ऐसे में चीन का तेहरान पर थोड़ा ज्यादा दबाव होगा। अगर चीन ऐसा करने के लिए राजी हो जाता है, तो यह युद्ध भी काफी हद तक टल सकता है।
पश्चिम एशियाई युद्ध लंबा खिंचने में चीन का फायदा
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही खाड़ी देश इस युद्ध को रोकने के लिए चीन की तरफ देख रहे हैं। लेकिन उन्हें इस बात का अंदाजा भी है कि पश्चिम एशिया के इस युद्ध का लंबा खिंचना बीजिंग के लिए फायदेमंद है। क्योंकि चीन को इस युद्ध से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा है। ईरान से उसका व्यापार जारी है और वह लगातार अपनी स्थिति को मजबूत कर रहा है। दूसरी तरफ अमेरिका लगातार कमजोर हो रहा है। ऐसे में चीन के लिए यह फायदेमंद है कि वह अमेरिका को ईरान में ही उलझाए रखे।
हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें कहा गया था कि चीन पाकिस्तान के रास्ते ईरान को हथियार उपलब्ध करवा रहा है। हालांकि, बाद में पाकिस्तान और चीन दोनों ने ही इस खबर का खंडन किया था।
पश्चिम एशिया में चीन और अमेरिका के बीच प्रभुत्व की लड़ाई
वैश्विक स्तर पर अभी भी अमेरिका सबसे बड़ी शक्ति है। लेकिन चीन भी ज्यादा पीछे नहीं है। ऐसे में अब जबकि अमेरिका पश्चिम एशिया में युद्ध में उलझा हुआ है, तो चीन धीरे-धीरे खाड़ी देशों में अपने पैर पसार रहा है। सत्तर के दशक से यह देश अमेरिका के साझेदार बने हुए हैं। लेकिन ईरान युद्ध और ट्रंप की नीतियों की वजह से अब यह अमेरिका से आगे देख रहे हैं। सऊदी और पाकिस्तान के बीच हुई डिफेंस डील भी इसी का उदाहरण हैं।
चीन फिलहाल कूटनीतिक स्तर पर इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। 2022 में गल्फ चीन शिखर सम्मेलन के बाद चीन ने छह देशों बहरीन, कतर, कुवैत, ओमान, सऊदी अरब और यूएई के साथ अपने निवेश संबंध मजबूत किए हैं। वह लगातार इन देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है। चीन विशेषज्ञ हेनरी टगेंडहैट के अनुसार, बीजिंग की पहली प्राथमिकता क्षेत्र के सभी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना है। इसलिए वह किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से बचता है।
क्या अमेरिका से अलग होकर चीन के साथ जा सकते हैं खाड़ी देश?
भले ही खाड़ी देश पाकिस्तान और चीन के साथ अपने रिश्तों को मजबूत कर रहे हैं। लेकिन अमेरिका से पूरी तरह से अलग होना फिलहाल उनके लिए संभव नहीं है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, खाड़ी देश इस वक्त चीन से तकनीक, निवेश और ड्रोन के मामले में समझौता तो कर सकते हैं लेकिन वह स्वतंत्र रूप से चीन से बातचीत नहीं कर सकते। कहीं न कहीं उन्हें अमेरिका को लूप में रखना ही होगा। क्योंकि अभी भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है।
भले ही खाड़ी देश अभी स्वतंत्र रूप से चीन के साथ जाकर नहीं मिल सकते। लेकिन ईरान युद्ध ने चीन के दरवाजे पश्चिम एशिया के लिए खोल दिए हैं। चीन लगातार दुनिया के तमाम देशों को यह भरोसा दिला रहा है कि उसकी विदेश नीति अमेरिका की तरफ उठापटक वाली नहीं बल्कि संतुलित और भरोसेमंद रहेगी। वह यूरोपीय देश, जो कभी चीन को राजनीतिक रूप से अछूत मानते थे वह भी अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप के आने के बाद बीजिंग की तरफ देख रहे हैं।
लेखक के बारे में
Upendra Thapakउपेंद्र ने डिजिटल पत्रकारिता की शुरुआत लाइव हिन्दुस्तान से की है। पिछले एक साल से वे होम टीम में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024, ऑपरेशन सिंदूर और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की कवरेज की है। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (बैच 2023-24) से पूरी करने वाले उपेंद्र को इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीति, खेल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़े विषयों में गहरी रुचि है। स्नातक स्तर पर बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के कारण उन्हें मेडिकल और वैज्ञानिक विषयों की भाषा की भी अच्छी समझ है। वे मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के निवासी हैं।
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