
महज 57 हजार की आबादी वाले देश के पीछे क्यों पड़े हैं ट्रंप? ग्रीनलैंड में US की दिलचस्पी की असली वजह
ग्रीनलैंड 1953 में औपचारिक रूप से नॉर्डिक साम्राज्य का हिस्सा बना था और डेनिश संविधान के अधीन आ गया। वहीं 2009 ग्रीनलैंड को आत्म-शासन का अधिकार मिला, जिसमें डेनमार्क से स्वतंत्रता की घोषणा करने का भी अधिकार शामिल है।
Trump Greenland News: साल की शुरुआत में ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला पर आक्रमण कर पूरी दुनिया में सनसनी मचा दी। अमेरिका ने ना सिर्फ वेनेजुएला पर हमला किया बल्कि एक संप्रभु देश की राजधानी में घुसकर वहां के राष्ट्रपति को जलील कर अपने देश कैदी में बना किया। अब अमेरिका एक और देश के पीछे पड़ा है, और वह है ग्रीनलैंड। बीते कुछ दिनों में ट्रंप ने कई बार यह दोहराया है कि अमेरिका को किसी भी हाल में ग्रीनलैंड को अपने अधीन करना होगा। यहां तक कि ट्रंप और उनके सलाहकारों ने यह भी कहा है कि इसके लिए सैन्य मदद भी लेनी पड़ेगी तो अमेरिका पीछे नहीं हटेगा। इसके बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि आखिर अमेरिका ग्रीनलैंड के पीछे क्यों पड़ा है?
वाइट हाउस ने मंगलवार को कहा है कि ट्रंप ग्रीनलैंड पर नियंत्रण के लिए सैन्य कार्रवाई समेत सभी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। वाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने मंगलवार को कहा कि ग्रीनलैंड को हासिल करना ट्रंप के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकता है। इसका मकसद रूस और चीन जैसे अमेरिकी विरोधियों को रोकना है। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति और उनकी टीम इस लक्ष्य को पाने के लिए कई विकल्पों पर चर्चा कर रही है और जरूरत पड़ी तो राष्ट्रपति के पास अमेरिकी सेना भी मौजूद विकल्पों में से एक है।
डेनमार्क ने दी चेतावनी
इसके बाद तनाव और बढ़ गया है। डेनमार्क ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जा किया तो नाटो समूह खत्म हो जाएगा। वहीं पश्चिमी देशों ने अमेरिका के खिलाफ एक संयुक्त बयान जारी कर दिया है जिसमें इस तरह की किसी भी कार्रवाई को नाटो के खिलाफ जंग माने जाने की चेतावनी दे गई है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट फ्रेडरिक्सन ने छह अन्य देशों के प्रमुखों के साथ यह संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा है कि ग्रीनलैंड के संबंध में फैसले लेने का अधिकार 'सिर्फ और सिर्फ' ग्रीनलैंड और डेनमार्क के पास है। इस बयान में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिच मर्ज़, इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनल्ड टस्क, स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सैंचेज़ और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर का नाम शामिल है।
महज 57000 है ग्रीनलैंड की आबादी
ग्रीनलैंड 1953 में औपचारिक रूप से नॉर्डिक साम्राज्य का हिस्सा बना और डेनिश संविधान के अधीन आ गया। इसके बाद 2009 में ग्रीनलैंड को आत्म-शासन का अधिकार मिला, जिसमें डेनमार्क से स्वतंत्रता की घोषणा करने का भी अधिकार शामिल है। ग्रीनलैंड की प्रो-बिजनेस डेमोक्रेटिक पार्टी, जिसने बीते साल चुनाव जीता था, अमेरिकी दखल के खिलाफ एकजुटता दिखाने के लिए गठबंधन की तलाश में है। यह पार्टी धीरे-धीरे डेनमार्क से स्वतंत्रता के पक्ष में भी है।
अर्थव्यवस्था की बात करें तो ग्रीनलैंड की लगभग 57,000 की आबादी मुख्य रूप से मछली पकड़ने पर निर्भर है, जो देश के 95 फीसदी से अधिक निर्यात का हिस्सा है। देश में दुर्लभ खनिजों, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे प्राकृतिक संसाधन के अथाह भंडार हैं। फिलहाल यहां ज्यादातर ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन की खनन कंपनियां हैं।
अमेरिका की क्या है दिलचस्पी?
ग्रीनलैंड खनिज संपदा से भरपूर है। ग्रीनलैंड में पाए जाने वाले रेयर अर्थ मिनरल मोबाइल फोन, कंप्यूटर, बैटरी और अन्य हाईटेक उपकरणों के लिए बेहद जरूरी होते हैं। फिलहाल इन अहम खनिजों की सप्लाई पर चीन का एकछत्र राज है। ऐसे में अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देश चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। इसी वजह से ग्रीनलैंड के खनिज अमेरिका के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। हालांकि ग्रीनलैंड में खनन करना आसान नहीं है। वहां की कठोर जलवायु और सख्त पर्यावरण नियम निवेशकों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति अहम
ग्रीनलैंड में ज्यादातर इनुइट समुदाय के हैं। लंबे समय तक दुनिया ने इस इलाके को नजरअंदाज किया है। ग्रीनलैंड का करीब 80 फीसदी हिस्सा आर्कटिक सर्कल के ऊपर है और इसकी स्थिति आर्कटिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम मानी जाती है।
ग्रीनलैंड कनाडा के उत्तर-पूर्वी तट के पास स्थित है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जा किया था, ताकि यह नाजी जर्मनी के हाथ न लगे और उत्तरी अटलांटिक समुद्री रास्तों की सुरक्षा की जा सके। शीत युद्ध के बाद आर्कटिक क्षेत्र सहयोग का इलाका बना रहा, लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के चलते बर्फ पिघल रही है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए नए समुद्री रास्ते खुलने की संभावना बढ़ गई है। इसके साथ ही रूस, चीन और अन्य देशों के बीच इस इलाके के खनिज संसाधनों और पहुंच को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है।

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