चीन ने बनाया प्रलयंकारी कानून, विदेशों में भी अपने लोगों पर कसेगा शिकंजा; भारत में रहने वालों पर लागू?
इस पूरे कानून में सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान इसकी धारा 63 पर गया है। इस धारा के जरिए चीन ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लांघकर अपने कानूनी हाथ विदेशों तक फैलाने का प्रावधान किया है।

चीन की सरकार सख्ती के लिए जानी जाती है। वहां रहने वाले लोगों पर काफी बंदिशें होती हैं। अब उसने अपनी सीमाओं से बाहर जाकर दुनिया के दूसरे देशों में रहने वाले अपने लोगों पर शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है। इसके लिए एक बेहद विवादित और सख्त कानून लागू कर दिया है।
चीन की सरकार का कहना है कि उसके पास विदेशों में रहने वाले उन सभी व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है जो उसकी जातीय एकता को नुकसान पहुंचाने या उसे कमजोर करने का प्रयास करते हैं। चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस द्वारा इसी साल मार्च में पारित किया गया जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला कानून आधिकारिक तौर पर बुधवार से प्रभावी हो गया है।
क्या है चीन का नया कानून?
इस पूरे कानून में सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान इसकी धारा 63 पर गया है। इस धारा के जरिए चीन ने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लांघकर अपने कानूनी हाथ विदेशों तक फैलाने का प्रावधान किया है। इस धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है, "चीन से बाहर का कोई भी संगठन या व्यक्ति जो चीन के खिलाफ ऐसे अपराध करता है जिसका उद्देश्य देश की जातीय एकता और प्रगति को कमजोर करना या जातीय विभाजन पैदा करना है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।"
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि यह धारा सीधे तौर पर चीन को अपनी सीमाओं से बाहर जाकर किसी पर कानूनी कार्रवाई करने की ताकत देती है। इसकी दुनिया भर में आलोचना शुरू हो गई है।
दुनिया में होने लगी आलोचना
संयुक्त राष्ट्र (UN) के अल्पसंख्यक अधिकारों और सांस्कृतिक अधिकारों के विशेष दूतों सहित कई वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने इस कानून की कड़ी निंदा की है। उनका आरोप है कि इस कानून का उद्देश्य जातीय सद्भाव बढ़ाना नहीं है। एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि इस कानून की धारा 63 का इस्तेमाल विदेशों में रह रहे चीनी नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और असंतुष्टों के दमन लिए किया जा सकता है।
एमनेस्टी की डिप्टी रीजनल डायरेक्टर सारा ब्रूक्स ने आगाह करते हुए कहा, "दुनिया में कहीं भी किसी के भी द्वारा चीन में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठाना भी अब चीन की नजर में जातीय एकता को कमजोर करना माना जा सकता है।" उन्होंने साफ किया कि यहां चीन के लिए एकता का मतलब विभिन्न समुदायों के बीच आपसी भाईचारा नहीं, बल्कि बीजिंग की राजनीतिक विचारधारा और लाइन के सामने पूरी तरह घुटने टेकना है।
आरोप है कि चीन पहले से ही विदेशों में अनौपचारिक गुप्त पुलिस स्टेशनों, छात्र संगठनों और सांस्कृतिक समूहों के नेटवर्क के जरिए अपने प्रवासियों और आलोचकों पर नजर रखता है। अब इस कानून से उसे और बल मिलेगा।
पश्चिमी मीडिया कर रहा है बदनाम
इस बढ़ते अंतरराष्ट्रीय विवाद पर चीन के स्टेट काउंसिल इंफॉर्मेशन ऑफिस प्रेस ब्यूरो के उप महानिदेशक और प्रवक्ता झोउ जियानशे ने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि धारा 63 पूरी तरह से वैध, कानूनी, आवश्यक और व्यावहारिक प्रावधान है। उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिमी मीडिया इस कानून को लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन के रूप में पेश करके इसे विकृत करने और चीन को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है।


