
C5+1 क्या है, जिसके नेताओं पर ट्रंप डाल रहे डोरे; एक दांव से ही पुतिन और जिनपिंग दोनों को टेंशन कैसे?
इस मंच की स्थापना 2015 में उज़्बेकिस्तान के समरकंद में अपनी पहली बैठक में हुई थी, जब छह देशों के विदेश मंत्रियों ने व्यापार, परिवहन, ऊर्जा और संचार के क्षेत्र में आपसी सहयोग मजबूत करने का संकल्प लिया था।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गुरुवार (6 नवंबर) को वाशिंगटन डीसी में एक वार्षिक शिखर सम्मेलन में पांच मध्य एशियाई देशों के प्रमुखों की मेजबानी करने वाले हैं। इन पांच देशों में उज़्बेकिस्तान, कज़ाकिस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान शामिल है। 2015 में स्थापित इस समूह को C5+1 के नाम से जाना जाता है, जो पाँच मध्य एशियाई देशों और अमेरिका को दर्शाता है। ये सभी पूर्व सोवियत संघ से निकले हुए देश हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि इस शिखर सम्मेलन में ट्रंप ने देशों के प्रमुखों से व्यापार समझौतों पर चर्चा करेंगे।खासकर उन समझौतों पर चर्चा करेंगे जो महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों से जुड़े हैं।

बड़ी बात यह भी है कि ये शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब रूस और चीन दोनों इस क्षेत्र में अपने-अपने व्यापार समझौते सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं। इस मंच की यह 10वीं शिखर बैठक है। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, इस मंच का उद्देश्य निष्पक्ष और पारस्परिक आर्थिक साझेदारी, बढ़ी हुई ऊर्जा सुरक्षा और शक्ति के माध्यम से शांति को बढ़ावा देने के माध्यम से "वैश्विक चुनौतियों के क्षेत्रीय समाधानों को आगे बढ़ाने" के लिए वाशिंगटन और मध्य एशियाई देशों के बीच सहयोग बढ़ाना है।
C5+1 क्या है?
इस मंच की स्थापना 2015 में उज़्बेकिस्तान के समरकंद में अपनी पहली बैठक में हुई थी, जब अमेरिका और इन पांच देशों यानी कुल छह देशों के विदेश मंत्रियों ने व्यापार, परिवहन, ऊर्जा और संचार के क्षेत्र में आपसी सहयोग मजबूत करने का संकल्प लिया था। इस वार्ता में 2021 में अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने से पहले अफगानिस्तान में युद्ध से संबंधित सुरक्षा चिंताओं पर भी चर्चा की थी। C5 से मतलब सेंट्रल एशिया के पांच देश प्लस 1 से मतलब अमेरिका से है। C5+1 कार्य समूह जुड़ाव के तीन स्तंभों का समर्थन करते हैं: अर्थव्यवस्था, ऊर्जा और सुरक्षा।
दो साल पहले 2023 में तत्कालीन अमेरिकी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान मध्य एशियाई नेताओं के साथ बैठक की थी। उनकी ये बैठक रूस-यूक्रेन जंग छिड़ने के बाद हुई थी। उसके बाद से मध्य एशिया के इस क्षेत्र पर अमेरिका के दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव आया है। हालांकि, तब बाइडेन ने कहा था कि इन देशों के साथ सहयोग संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति हमारी साझा प्रतिबद्धता पर आधारित है।
6 माह में मध्य एशिया के साथ कुल 12.4 अरब डॉलर के समझौते
बहरहाल, अमेरिका ने ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले छह महीनों में मध्य एशिया के साथ कुल 12.4 अरब डॉलर के व्यापार समझौते किए हैं। इनमें विमानन, सुरक्षा और रेयर अर्थ मिनरल्स के मुद्दे शामिल हैं। माना जा रहा है कि हालिया सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति इन मध्य एशियाई देशों के साथ रेयर अर्थ मिनरल्स पर समझौते को आगे बढ़ा सकते हैं क्योंकि चीन से इस मामले में झटका मिलने के बाद अमेरिका विकल्प की तलाश में जुटा है।
C5 देशों पर ट्रंप की नजर क्यों?
बता दें कि मध्य एशियाई देशों में दुर्लभ-पृथ्वी धातुओं के प्रचूर भंडार हैं, जो स्मार्टफोन से लेकर वायु सेना के जेट विमानों तक, हर चीज के निर्माण के लिए जरूरी हैं। अप्रैल में, कज़ाकिस्तान ने नए दुर्लभ-पृथ्वी धातुओं, सेरियम, लैंथेनम, नियोडिमियम और यिट्रियम के भंडार खोजे हैं, जिनका उपयोग स्मार्टफ़ोन और कंप्यूटर हार्ड डिस्क के पुर्जों के निर्माण में किया जाता है।
हालांकि यह अभी भी प्रारंभिक चरण में है, क्योंकि भंडारों का सत्यापन और प्रसंस्करण किया जाना बाकी है। उद्योग और निर्माण मंत्रालय के अनुसार, मध्य कज़ाकिस्तान के करागांडी में भंडार स्थल पर इन धातुओं के 20 मिलियन टन से अधिक होने का अनुमान है। अगर यह सही साबित होता है, तो यह चीन के दुर्लभ-पृथ्वी संसाधनों का लगभग आधा होगा। फिलहाल चीन के पास दुनिया में सबसे अधिक करीब 90 फीसदी रेयर अर्थ मिनरल्स के भंडार हैं।
चीन और रूस को क्यों टेंशन
ट्रंप की नजर इसी रेयर अर्थ मिनरल्स पर टिकी है। अगर ट्रंप इन देशों के रेयर अर्थ मिनरल्स पाने में कामयाब रहते हैं तो चीन की धाक न सिर्फ कम हो सकेगी बल्कि इन धातुओं की सप्लाई पर उसकी दादागिरी भी कम होगी। ट्रंप लंबे समय से चीन के इस एकाधिकार को तोड़ने की कोशिशों में जुटे हैं और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इस संसाधन के लिए सौदे कर रहे हैं। ट्रंप यूक्रेन के साथ भी ऐसा ही समझौता कर चुके हैं।
दूसरी तरफ, चूंकि ये देश पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे हैं और उनकी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से अच्छे संबंध रहे हैं, इसलिए भी ट्रंप उन देशों को अपने पाले में करना चाह रहे हैं ताकि इसके बहाने वह रूस पर दबाव बना सकें। रूस पहले ही इन C5+1 देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने पर 2022 में समझौते कर चुके हैं। बता दें कि रूस और चीन दोनों अमेरिका के बड़े प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। और दोनों की नजरें मध्य एशियाई देशों पर पहले से टिकी हुई है।

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