इस्लामिक आतंकवाद पर क्या बोले रुबियो? भारत ने जताई आपत्ति, US में जुटे 67 देश
अमेरिकी विदेश मंत्री के इस बयान के बीच भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा ने आतंकवाद के प्रति भारत के कड़े और स्पष्ट रुख को दोहराया। उन्होंने भारत में वामपंथी उग्रवाद यानी कि नक्सलवाद से निपटने के देश के लंबे अनुभवों के बारे में बताया।
अमेरिका द्वारा वामपंथी चरमपंथ और आतंकवाद के खिलाफ आयोजित एक उच्च स्तरीय मंत्रिस्तरीय बैठक में भारत सहित दुनिया के 67 देशों ने हिस्सा लिया। वाशिंगटन में हुई इस महत्वपूर्ण बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा ने किया। बैठक के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दुनिया से वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया। हालांकि इस दौरान उन्होंने यह भी दावा किया कि जिहादी आतंकवाद का खतरा अब काफी कम हो गया है।
अमेरिकी विदेश मंत्री के इस बयान के बीच भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा ने आतंकवाद के प्रति भारत के कड़े और स्पष्ट रुख को दोहराया। उन्होंने भारत में वामपंथी उग्रवाद यानी कि नक्सलवाद से निपटने के देश के लंबे अनुभवों के बारे में बताया। साथ ही वैश्विक मंच पर यह भी साफ कर दिया कि आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनानी होगी। क्वात्रा ने विशेष रूप से सीमा पार आतंकवाद और अलगाववादी एजेंडे को बढ़ावा देने वाले समूहों का मुद्दा उठाया, जो भारत के लिए सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील रहे हैं।
इस बैठक में भले ही 67 देशों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन कई देशों ने इसमें अपने जूनियर डिप्लोमैट्स को भेजना ही बेहतर समझा। इसका मुख्य कारण अमेरिका द्वारा बैठक के एजेंडे को पूरी तरह वामपंथी खतरे पर केंद्रित करना था। कई देश इस बात से असहमत थे कि इस्लामिक चरमपंथ की तुलना में केवल वामपंथी उग्रवाद को ही सबसे बड़ा खतरा मान लिया जाए। भारत भी उनमें से एक था।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अपने संबोधन में कहा कि वामपंथी हिंसा का दौर अब समाप्त होना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि व्यापार, आप्रवासन और ऊर्जा जैसे मुद्दों पर अमेरिका के साथ वैचारिक मतभेद होने के बावजूद 60 से अधिक देशों के नेता, विशेषज्ञ और कानून प्रवर्तन अधिकारी इस बैठक में शामिल हुए हैं। उनके मुताबिक, यह दर्शाता है कि दुनिया भर में वामपंथी आतंकवाद को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।
आतंकवाद के बदलते स्वरूप पर चिंता जताते हुए रुबियो ने कहा, "आज के दौर में धुर-वामपंथी आतंकवादी एक देश से फंड जुटाते हैं, दूसरे देश के सर्वर पर अपनी बातचीत होस्ट करते हैं, तीसरे देश में ट्रेनिंग लेते हैं, चौथे देश से लड़ाकों की भर्ती करते हैं और फिर इन सब के साथ मिलकर किसी पांचवें देश में हमला करते हैं।" उन्होंने जोर देकर कहा कि इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए देशों के पास आपस में सहयोग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यदि देश सीमाओं के पार जाकर सहयोग नहीं करेंगे तो आतंकवादी कानून और व्यवस्था के बीच के इसी अंतर का फायदा उठाते रहेंगे।
भारत की चिंताएं और आतंकवाद पर विरोधाभास
इस बैठक के लिए भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर सहित करीब 70 देशों के विदेश मंत्रियों को आमंत्रित किया गया था। लेकिन विदेश मंत्री जयशंकर के यात्रा पर होने के कारण राजदूत विनय क्वात्रा ने बैठक में हिस्सा लिया। इस बैठक में भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का वह बयान रहा जिसमें उन्होंने कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद के खतरे को कमतर आंका और सारा ध्यान वामपंथी आतंकवाद पर केंद्रित कर दिया। रुबियो ने कहा कि अमेरिका और यूरोप द्वारा अपनाई गई सफल आतंकवाद-विरोधी रणनीतियों के कारण जिहादी आतंकवाद का खतरा अब काफी हद तक सिमट गया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन इसमें भारी कमी आई है।
अमेरिका का यह आकलन भारत के जमीनी हकीकतों से मेल नहीं खाता। भारत के लिए जिहादी आतंकवाद आज भी उतना ही बड़ा और घातक खतरा बना हुआ है जितना एक दशक पहले था, जिसका सबसे ताजा और बड़ा उदाहरण 2025 में हुआ पहलगाम आतंकवादी हमला है। भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह बात उठाता रहा है कि आतंकवाद को श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता और सीमा पार से मिलने वाले प्रायोजन को रोके बिना इस वैश्विक खतरे का अंत नहीं किया जा सकता।
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