US की कठपुतली बना पाकिस्तान युद्ध रुकवाने का क्रेडिट ले गया, भारत की साख पर होगा कितना असर

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि युद्ध को रुकवाना खुद पाकिस्तान के लिए भी जरूरी हो गया था क्योंकि ईरान सऊदी पर हमले कर रहा था और ऐसे में पूर्व में हुए एक समझौते के तहत पाकिस्तान पर ईरान पर हमले करने का दबाव था।

US की कठपुतली बना पाकिस्तान युद्ध रुकवाने का क्रेडिट ले गया, भारत की साख पर होगा कितना असर

अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष विराम कराने के लिए कई पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान की भूमिका की सराहना की है। देशों ने इसे उसकी कूटनीतिक सफलता बताया है, लेकिन पाकिस्तान की यह वाहवाही तात्कालिक है तथा उसे इसका कोई दूरगामी फायदा होने की उम्मीद नहीं है। भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध विराम में पाकिस्तान की भूमिका महज संदेशों के आदान-प्रदान तक ही सीमित रही है। युद्ध विराम का खाका तैयार करने में उसकी कोई भूमिका नहीं है।

मध्यस्थ नहीं, माध्यम बना पाकिस्तान

पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने एक्स पर लिखा कि इस संघर्ष को रोकने में पाकिस्तान की भूमिका एक आर्किटेक्ट के रूप में नहीं बल्कि एक माध्यम के रूप में रही है। पाकिस्तान ने इस मामले में वह रास्ता दिया जिसके माध्यम से संदेशों का आदान-प्रदान हुआ। समय सीमाएं नरम पड़ीं और कूटनीतिक अवसर का एक संकरा रास्ता खुला। देखा जाए तो पारंपरिक अर्थों में यह मध्यस्थता नहीं है लेकिन इसे हल्की-फुल्की टिप्पणियों से खारिज भी नहीं किया जा सकता है। जो हम देख रहे हैं,वह संघर्ष का समाधान नहीं है बल्कि उसकी स्थिति में बदलाव है। युद्ध समाप्त नहीं हुआ बल्कि वह एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है जहां दबाव और वार्ता साथ-साथ चल रही।

खास बात है कि अमेरिका, ईरान के अलावा ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, नार्वे, मलेशिया, संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान की भूमिका की सराहना की है।

युद्ध रुकवाना मजबूरी

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि युद्ध को रुकवाना खुद पाकिस्तान के लिए भी जरूरी हो गया था क्योंकि ईरान सऊदी पर हमले कर रहा था और ऐसे में पूर्व में हुए एक समझौते के तहत पाकिस्तान पर ईरान पर हमले करने का दबाव था। दूसरे, घरेलू और अन्तरराष्ट्रीय दबाव में अमेरिका भी इस संघर्ष को खत्म करने के पक्ष में था जिसके लिए उसने पाकिस्तान को माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया।

अमेरिका की कठपुतली बना

जेएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर अमित सिंह कहते हैं कि पाकिस्तान की यह खुशी तात्कालिक है। क्योंकि अन्तरराष्ट्रीय मंच पर उसकी साख इतनी ज्यादा खराब हो चुकी है कि वह महज इस एक मामले से स्थापित नहीं होने वाली। पाक ने अमेरिका की कठपुतली की तरह काम किया और सिर्फ पाकिस्तान को एक जगह के रूप में इस्तेमाल किया जिसमें उसकी भूमिका संदेशों को ईधर-उधर पहुंचाने भर की थी। इसलिए उसकी इस तथाकथित कूटनीतिक सफलतता से भारत को कोई फर्क नहीं पड़ता है।

मुस्लिम देशों में बढ़ सकता है प्रभाव

अमेरिकी मीडिया में आई कुछ विश्लेषणात्मक रिपोर्टों में हालांकि दावा किया गया है कि इस मामले से मुस्लिम देशों के बीच पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ सकता है तथा अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उसे अमेरिका से कर्ज हासिल हो सकता है। हालांकि सऊदी अरब और यूएई समेत कई मुस्लिम देश पाकिस्तान से अपने कर्ज का तकाजा कर सकते हैं क्योंकि उन्हें युद्ध से भारी नुकसान हुआ है। यूएई पहले ही 3.5 मिलियन डालर के कर्ज लौटने के लिए पाकिस्तान को कह चुका है।

भारत पर कितना असर

मध्य पूर्व एशिया में 39 दिन बाद अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध रुकने को लेकर वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध विराम का मध्यस्थ बनने से पाकिस्तान का कद बढ़ा है। हालांकि भारत की वैश्विक छवि पर इसका असर नहीं पड़ेगा। भविष्य में पाकिस्तान अपनी इस छवि का इस्तेमाल कैसे करता है, इसपर भारत का अगला कदम तय होगा।

बीएचयू स्थित यूनेस्को पीस चेयर के अध्यक्ष और पूर्व आचार्य प्रो. प्रियंकर उपाध्याय इस युद्ध और विराम को वैश्विक राजनीति में एक ‘शिफ्ट’ की तरह देखते हैं। उन्होंने कहा कि इसे पिछले कई दशकों में पाकिस्तान की सबसे बड़ी राजनयिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा सकता है। जिस देश की छवि आतंकी राष्ट्र की थी, उसे अब शांतिदूत का तमगा मिला है। यह बदलाव निश्चित तौर पर अमेरिका, मध्य पूर्व और मुस्लिम देशों के सामने पाकिस्तान का कद बढ़ाएगा। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान इकलौता परमाणु संपन्न मुस्लिम राष्ट्र है।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान चाहे तो गर्त में जाती अर्थव्यवस्था को इससे थोड़ा उछाल दे सकता है। साथ ही शांतिदूत की छवि बनाए रखने लिए सीमापार आतंकवाद रोकने पर भी विचार कर सकता है।

प्रो. उपाध्याय ने कहा कि भारत की छवि दुनिया में अलग जगह पर है। अरब देश हों या ईरान या फिर अमेरिका-इजरायल, भारत के संबंध सभी से प्रगाढ़ हैं। ऐसे में पाकिस्तान शांतिदूत की छवि के साथ खुद को भारत की बराबरी पर देखने की भूल न करे। प्रो. उपाध्याय ने यह भी कहा कि इस हमले और फिर युद्ध विराम ने अमेरिका की वैश्विक छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है। साथ ही मध्यपूर्व में इजरायल की दबंग मौजूदगी को भी झटका लगा है। इन सबके बीच ईरान एक साहसी मुल्क बनकर उभरा है जहां संकट के समय जनता भी सड़कों पर उतर पड़ी।

Nisarg Dixit

लेखक के बारे में

Nisarg Dixit

निसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।

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