बांग्लादेश को लेकर टेंशन में अमेरिका, आम चुनाव से पहले अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर चेतावनी

Feb 10, 2026 02:59 pm ISTDevendra Kasyap लाइव हिन्दुस्तान
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अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो माइकल रुबिन ने कहा कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार लोकतांत्रिक सुधारों के दावों की सच्चाई का सबसे विश्वसनीय मापदंड है। रुबिन ने कहा कि कोई देश अपने धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह किसी अन्य चीज से बेहतर मापक है।

बांग्लादेश को लेकर टेंशन में अमेरिका, आम चुनाव से पहले अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर चेतावनी

बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनाव दुनिया की नजरों में हैं। शेख हसीना की सरकार के हटने और अवामी लीग के चुनाव से बाहर रहने के बाद यह पहला बड़ा चुनावी मौका है। लेकिन चुनाव से ठीक पहले ही धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों पर बढ़ते खतरे और कट्टरपंथी ताकतों के उभरने की आशंका गहरा गई है। अमेरिका ने इस स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। अमेरिकी कांग्रेस की एक हालिया ब्रीफिंग में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है, जहां लोकतंत्र, धार्मिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय स्थिरता दांव पर लगी हुई है।

दरअसल, चुनाव से कुछ दिन पहले वाशिंगटन के रेबर्न हाउस ऑफिस बिल्डिंग में आयोजित इस ब्रीफिंग में शिक्षाविदों, पत्रकारों और सामुदायिक नेताओं को एक साथ लाया गया। इसका उद्देश्य बांग्लादेश के राजनीतिक रास्ते का आकलन करना था, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता, चुनावी विश्वसनीयता और इस्लामी ताकतों के उदय पर खास ध्यान दिया गया। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि बांग्लादेश इस चुनावी चक्र को कैसे संभालता है, यह न केवल उसके आंतरिक भविष्य को तय करेगा, बल्कि दक्षिण एशिया में स्थिरता का एक व्यापक संकेतक भी होगा। उन्होंने वाशिंगटन से अधिक स्पष्ट और सक्रिय रुख अपनाने की मांग की।

वाशिंगटन के लिए बांग्लादेश चिंता की विषय

अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो माइकल रुबिन ने कहा कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार लोकतांत्रिक सुधारों के दावों की सच्चाई का सबसे विश्वसनीय मापदंड है। रुबिन ने कहा कि कोई देश अपने धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह किसी अन्य चीज से बेहतर मापक है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी जैसी इस्लामी पार्टियों की बात करें तो वे धर्म का इस्तेमाल जवाबदेही से बचने और उकसावे के लिए करती हैं। एक बार सहिष्णुता खो जाने पर उसे वापस पाना बेहद मुश्किल होता है। रुबिन ने आगे चेतावनी दी कि बांग्लादेश धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में विशेष चिंता का विषय बनने की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश की दिशा को लेकर वाशिंगटन को राजनीतिक दलों की परवाह किए बिना चिंतित होना चाहिए।

जमात-ए-इस्लामी आतंकवादी संगठन

उन्होंने कहा कि हम बांग्लादेश में ऐसा नहीं देखना चाहते। जनसंख्या और अर्थव्यवस्था के लिहाज से बांग्लादेश सबसे महत्वपूर्ण देशों में से एक है। मेरा मानना है कि यह दक्षिण एशिया के लिए एक तरह से मानक है। अमेरिका से सक्रिय प्रतिक्रिया की मांग करते हुए उन्होंने दक्षिण एशिया नीति में अपनाए गए प्रतिक्रियात्मक रवैये की आलोचना की। रुबिन ने कहा कि रिपब्लिकन हो या डेमोक्रेटिक सरकार, अमेरिका में सक्रिय होने के बजाय प्रतिक्रियात्मक रहने की बुरी आदत रही है। उन्होंने आधिकारिक रिपोर्टिंग में राजनीतिक हिंसा के वर्णन पर सवाल उठाए और चेतावनी दी कि अस्पष्ट भाषा जवाबदेही को धुंधला कर सकती है।

रुबिन ने कहा कि पैसिव वॉइस का इस्तेमाल करके आप यह जता रहे हैं कि आपको नहीं पता बम किसने फोड़ा, या आप जानबूझकर इसे छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। आप एक तरह से आतंकवाद को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि जमात-ए-इस्लामी को पारंपरिक राजनीतिक दल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि यह एक आतंकवादी संगठन है।

'सत्ता का फैसला बल से होता है'

वहीं पत्रकार और भू-राजनीतिक विश्लेषक एडेल नाजारियन ने कहा कि 12 फरवरी का मतदान बांग्लादेश की सीमाओं से परे देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह चुनाव केवल बांग्लादेश का घरेलू मुकाबला नहीं है। यह एक क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा की घटना है। इस दौरान नाजारियन ने चेतावनी दी कि चुनावी प्रक्रिया से अवामी लीग को बाहर रखने से जबरदस्ती की राजनीति को सामान्य बनाने का खतरा है। उन्होंने कहा कि जब किसी प्रमुख पार्टी को चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है, तो समाज को दिया जाने वाला संदेश सरल और खतरनाक होता है। सत्ता का फैसला बल से होता है, वैधता से नहीं। उन्होंने आगे कहा कि राजनीतिक क्षेत्र में भय को हथियार के रूप में तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है।

Devendra Kasyap

लेखक के बारे में

Devendra Kasyap

देवेन्द्र कश्यप पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगस्त 2025 से वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। संस्थान की होम टीम का वह एक अहम हिस्सा हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर रहती है। वायरल कंटेंट के साथ-साथ लीक से हटकर और प्रभावशाली खबरों में उनकी विशेष रुचि है।

देवेन्द्र ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2013 में महुआ न्यूज से की। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में रिपोर्टिंग की। इस दौरान राजनीति के साथ-साथ क्राइम और शिक्षा बीट पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने जी न्यूज (बिहार-झारखंड) में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2015 में ईनाडु इंडिया के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया।

मूल रूप से बिहार के भोजपुरी बेल्ट रोहतास जिले के रहने वाले देवेन्द्र कश्यप ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पटना से प्राप्त की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और MCU भोपाल से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रवास कर रहे हैं।

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