चीन की जिस लैब से फैला था कोरोना वायरस, उसे US के टॉप साइंटिस्ट ने दिए थे पैसे; तुलसी गबार्ड का बड़ा धमाका

लाइव हिन्दुस्तान, वॉशिंगटन
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तुलसी गबार्ड ने पिछले महीने ट्रंप प्रशासन के राष्ट्रीय खुफिया निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने कहा था कि उनके पति कैंसर से जूझ रहे हैं, इसलिए वह पद छोड़ रही हैं। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में पद छोड़ने वाली वह चौथी कैबिनेट अधिकारी हैं।

Tulsi Gabbard

अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस चीफ तुलसी गबार्ड ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन गुरुवार (18 जून) को एक ऐसा धमाका किया है, जिसने पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया है। गबार्ड ने कहा है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के पूर्व चीफ मेडिकल एडवाइजर एंथनी फाउची ने चीन के वुहान में उस रिसर्च लैब को फंड दिया था, जहां से कोरोना वायरस फैला था। ऐसा माना जाता है कि इसी लैब से COVID-19 महामारी फैली थी। गबार्ड ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन कभी न देखे गए उन गुप्त दस्तावेजों को सार्वजनिक कर दिया है, जो सीधे तौर पर जो बाइडन के पूर्व मुख्य चिकित्सा सलाहकार डॉ. एंथनी फाउची को कटघरे में खड़ा करते हैं।

बता दें कि फाउची ने 2020 की शुरुआत में अमेरिका में कोविड वायरस का संक्रमण आने पर बाइडन सरकार की कोविड रणनीति का नेतृत्व किया था। गबार्ड द्वारा जारी दस्तावेजों के अनुसार, एंथनी फाउची ने अमेरिकी टैक्सपेयर्स के लाखों डॉलर चीन की उसी वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को दिए, जिसे कोरोना महामारी का केंद्र माना जाता है। गुप्त दस्तावेजों के मुताबिक, फाउची ने वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी (WIV) में चमगादड़ कोरोना वायरस पर खतरनाक गेन-ऑफ़-फ़ंक्शन रिसर्च के लिए ये फंड दिए थे।

संसद में सफेद झूठ और 'डीप स्टेट' की चालें?

तुलसी गबार्ड ने फाउची पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि उन्होंने 2024 में अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के सामने शपथ लेकर झूठ बोला था। गबार्ड का आरोप है कि फाउची ने इंटेलिजेंस कम्युनिटी के साथ मिलकर लैब-लीक के सबूतों को दबाया और दुनिया के सामने वायरस के प्राकृतिक उत्पत्ति का फर्जी नैरेटिव पेश किया ताकि उनके द्वारा फंड की गई खतरनाक रिसर्च छिपी रहे।

गबार्ड के ऑफिस ने जारी किया बयान

गबार्ड के ऑफ़िस ने एक बयान में कहा कि फ़ाउची ने "वायरस के लैब-लीक से फैलने की सच्चाई को दबाने के लिए राजनीति से प्रेरित अधिकारियों के साथ मिलकर काम किया।"बयान में कहा गया है, “ये दस्तावेज़ COVID-19 पर IC (इंटेलिजेंस कम्युनिटी) के आकलन को प्रभावित करने और उनमें हेरफेर करने में फाउची की सीधी भूमिका का पर्दाफ़ाश करते हैं। साथ ही, ये बताते हैं कि कैसे फ़ाउची ने 2024 में कांग्रेस से झूठ बोला था, जब उन्होंने शपथ के तहत वायरल रिसर्च के बारे में इंटेलिजेंस अधिकारियों के साथ बातचीत की जानकारी या उसमें अपनी भागीदारी से इनकार किया था।”

सच बोलने वालों का गला घोंटा गया!

खुलासे में यह भी सामने आया है कि जिन व्हिसलब्लोअर्स या विशेषज्ञों ने पाउची के झूठ को चुनौती देने की कोशिश की, उन्हें डराया-धमकाया गया और उनके करियर बर्बाद कर दिए गए। गबार्ड ने इसे "डीप स्टेट प्लेबुक" का हिस्सा बताते हुए कहा कि फाउची जैसे लोगों ने अपनी गलतियों को छिपाने के लिए न केवल जनता को गुमराह किया, बल्कि निर्वाचित राष्ट्रपति तक को महत्वपूर्ण तथ्यों से दूर रखा। 85 वर्षीय फाउची जिन्होंने लगभग 38 वर्षों तक अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी (NIAID) पर राज किया, अब इन गंभीर आरोपों के घेरे में हैं।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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