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चीन के लिए ताइवान है टेढ़ी खीर, क्यों वेनेजुएला जैसा ऑपरेशन नहीं चला सकता ड्रैगन?

चीन के लिए ताइवान है टेढ़ी खीर, क्यों वेनेजुएला जैसा ऑपरेशन नहीं चला सकता ड्रैगन?

संक्षेप:

अमेरिका ने वेनेजुएला में जिस तरह केवल तीन घंटे के अभियान में ही राष्ट्रपति को पकड़कर युद्धपोत पर कैद दिया, वैसा अभियान चीन के लिए संभव ही नहीं है। अगर ऐसा होता तो वह कब का ताइवान पर कब्जा कर चुका होता।

Jan 13, 2026 12:20 am ISTAnkit Ojha लाइव हिन्दुस्तान
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अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमला करके जिस तरह से राष्ट्राध्यक्ष को महज तीन घंटे के अंदर उठा लिया, यह पूरी दुनिया को हैरान करने वाला अभियान है। चीन भी अपनी सेना की बराबरी अमेरिका के साथ करना चाहता है। हालांकि जानकारों का कहना है कि चीन के पास अभी इतना सामंजस्य और बाहरी समर्थन नहीं है कि वह इस तरह के अभियान को अंजाम दे सके। ताइवान चीन से महज 100 किलोमीटर की दूरी पर है। इसके बाद भी चीन दूर से ही गीदड़भभकी देता रहता है। वह आज भी ताइवान में घुसकर कोई ऑपरेशन करने में सक्षम नहीं है।

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पेंटागन की बराबरी नहीं कर पाया चीन

एससीएमपी की रिपोर्ट के मुताबिक वॉशिंगटन के पास केवल ताकतवर हथियार ही नहीं बल्कि सभी विभागों और संस्थानों में अद्भुत सामंजस्य भी है। चीन में इसकी बड़ी कमी है। चीन बीते दो दशकों से अपनी सेना और हथियारों को ताकतवर बनाने में लगा है। उसने कई हथियार और युद्धपोत बनाए। साइबर स्पेस फोर्स तैयार की। इसके बाद भी चीन अब तक इसतरह के अभियान चलाने के लिए संगठन नहीं तैयार कर पाया। चीन में राजनीति इतनी मजबूत नहीं है कि वे इस तरह से संवेदनशील अभियान के लिए तैयार हो सकें।

जानकारों का कहना है कि अगर चीन मादुरो स्टाइल में कोई अभियान चलाता भी है तो यह बहुत धीमा होगा और इससे नुकसान ज्यादा होगा। इसके अलावा पूरी दुनिया चीन पर टूट पड़ेगी। अमेरिका ने वेनेजुएला में जो अभियान चलाया है वह आधुनिक युग के एयर पावर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और खुफिया तंत्र की कामयाबी का बड़ा उदाहरण है। इनमें से किसी एक को ऑपरेशन का पूरा क्रेडिट नहीं दिया जा सकता बल्कि सारे ही विभाग एक कमांड पर काम कर रहे थे। इस वजह से महज तीन घंटे में अमेरिका ने इतने बड़े ऑपरेशन को अंजाम तक पहुंचा दिया और सभी सैनिकों की सुरक्षित वापसी भी हो गई। इसके अलावा वेनेजुएला के आम लोगों को हताहत भी नहीं किया गया।

बता दें कि 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन में 20 से 30 हजार स्पेशल ऑपरेशन के लिए नियुक्त किए गए जवान हैं। इसके बाद भी राष्ट्रीय स्तर पर कोई एकीकृत कमांड सेंटर नहीं है। ऐसे में बीजिंग अमेरिका की नकल करने में कामयाब नहीं हो सकता। इसके अलावाल चीन की सेना भी कई स्तरों में बंटी है। पीएलए का स्पेशल ऑपरेशन ब्रिगेड जल, थल और वायुसेना तीनों में है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी खुद को इतना असुरक्षित महसूस करती है कि उसने सैन्य शक्ति का एकीकरण करके रखा है। अगर सेना को कोई भी नियंत्रित कर लेता है तो वह चीन की सत्ता पर काबिज हो सकता है।

ऐसे में चीनी सेना के बड़े अधिकारियों को भी राजनीतिक बेड़ियां लगी हैं। नौकरशाही उन्हें जकड़कर रखती है। ऐसे में उनकी रणनीति मजबूत नहीं हो पाती है। चीन के ही एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि अमेरिका के पास जिस तरह के कंट्रोल और सामंजस्य है, वहां तक पहुंचने में अभी चीन को दशकों लग जाएंगे।

Ankit Ojha

लेखक के बारे में

Ankit Ojha
अंकित ओझा पिछले 8 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। अंकित ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया से स्नातक के बाद IIMC नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया है। इसके बाद कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की है। राजनीति, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय डेस्क पर कार्य करने का उनके पास अनुभव है। इसके अलावा बिजनेस और अन्य क्षेत्रों की भी समझ रखते हैं। हिंदी, अंग्रेजी के साथ ही पंजाबी और उर्दू का भी ज्ञान है। डिजिटल के साथ ही रेडियो और टीवी के लिए भी काम कर चुके हैं। और पढ़ें

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