ईरान-अमेरिका का 60 दिन का समझौता खत्म, गतिरोध बरकरार
- समझौते के कुछ ही सप्ताह बाद स्थिति बिगड़ गई वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका और

- समझौते के कुछ ही सप्ताह बाद स्थिति बिगड़ गई वॉशिंगटन, एजेंसी। अमेरिका और ईरान के बीच 17 जून को हुआ 14 सूत्री समझौता ज्ञापन (एमओयू) सोमवार को 60 दिन की अवधि पूरी होने के साथ समाप्त हो गया। दोनों देशों के बीच फिलहाल बड़े पैमाने पर लड़ाई रुकी हुई है, लेकिन 28 फरवरी से शुरू हुआ युद्ध अभी खत्म होने से काफी दूर है। होर्मुज से पोतों की आवाजाही, युद्धविराम और ईरान के पुनर्निर्माण जैसे मुद्दों पर असहमति ने समझौते को शुरुआत से ही कमजोर कर दिया था।
समझौते का उद्देश्य
पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुए इस एमओयू का मकसद दोनों देशों के बीच 60 दिन की शांति वार्ता शुरू करना था। समझौते में होर्मुज को फिर से खोलने का प्रावधान भी था, लेकिन समझौते की कई शर्तों की अस्पष्ट भाषा के कारण दोनों पक्षों के बीच यह विवाद पैदा हो गया कि होर्मुज से गुजरने वाले पोतों के मार्ग को तय करने और उन्हें नियंत्रित करने का अंतिम अधिकार किसके पास होगा।
क्या था ईरान-अमेरिका का एमओयू
17 जून को ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच 14 सूत्री एमओयू पर सहमति बनी थी। समझौते में दोनों पक्षों ने सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई तत्काल और स्थायी रूप से रोकने पर सहमति जताई थी। इसमें लेबनान भी शामिल था। अमेरिका को 30 दिनों के भीतर ईरान की नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करनी थी। अंतिम समझौता होने के बाद ईरान के आसपास तैनात अमेरिकी बलों को हटाने और ईरान के पुनर्निर्माण व आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर का पैकेज तैयार करने की बात कही गई थी। अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध हटाने, उसके तेल निर्यात के लिए छूट देने और विदेशों में जमा ईरानी राशि तक पहुंच की अनुमति देने पर भी सहमति जताई थी। इसके बदले ईरान को होर्मुज से बारूदी सुरंगें हटानी थीं और 60 दिनों तक पोतों को बिना किसी शुल्क के सुरक्षित रास्ता देने का वादा किया था। तेहरान ने परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं करने और यूरेनियम संवर्धन जैसे मुद्दों पर बातचीत करने की प्रतिबद्धता भी जताई थी।
होर्मुज बना सबसे बड़ा विवाद
समझौते के अनुच्छेद-5 में होर्मुज से वाणिज्यिक पोतों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की बात थी, लेकिन इसमें जलडमरूमध्य के भविष्य के प्रशासन और समुद्री सेवाओं को लेकर ईरान और ओमान के बीच बातचीत की भी बात कही गई थी। यहीं से विवाद शुरू हुआ। ओमान ने अमेरिका के समर्थन से ऐसा समुद्री मार्ग जारी किया, जिसमें पोतों को उसके तट के करीब से गुजरना था। दूसरी ओर, ईरान पहले ही ऐसा नक्शा जारी कर चुका था, जिसमें पोतों को उसके तट के करीब से गुजरना था और ओमान की ओर के मार्ग को प्रतिबंधित बताया गया था। जून के अंत में ओमान वाले मार्ग से गुजरने वाले कई पोतों को निशाना बनाया गया। इससे दोनों देशों के बीच यह विवाद और बढ़ गया। इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर फिर हमले शुरू कर दिए, जो करीब दो सप्ताह तक चले।
लेबनान को लेकर भी फंसा समझौता
1. एमओयू के अनुच्छेद-1 में सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई रोकने और लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता तथा संप्रभुता सुनिश्चित करने की बात कही गई थी, लेकिन इसमें इजरायल का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
2. इजरायल लेबनान के दक्षिणी हिस्से में मौजूद है और वहां लगातार हमले करता रहा है। ईरान का कहना था कि एमओयू के तहत लेबनान में इजरायली सैन्य कार्रवाई भी रुकनी चाहिए। इजरायल ने इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया।
3. एमओयू के अनुच्छेद-6 में ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर की योजना तैयार करने की बात कही गई थी, लेकिन इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि यह राशि कौन देगा और इसे किस तरह खर्च किया जाएगा।
पोत पर हमले के बाद फिर से शुरू हुआ संघर्ष
समझौते के करीब एक सप्ताह बाद ही स्थिति बिगड़ने लगी। 25 जून को सिंगापुर के झंडे वाला वाणिज्यिक पोत एवर लवली ओमान के तट के करीब बने समुद्री मार्ग से गुजर रहा था, तभी एक रॉकेट की चपेट में आ गया। ईरान ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली, लेकिन उसका खंडन भी नहीं किया। अमेरिका ने इसके लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया।


