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अंटार्कटिक तक पहुंची लालच की आंच

डॉयचे वेले,दिल्लीPublished By:
Thu, 08 Jul 2021 04:25 PM
अंटार्कटिक तक पहुंची लालच की आंच

अंटार्कटिक किसी एक देश का नहीं है. सबका साझा यह इलाका अब लालच की उस आंच को झेल रहा है, जो ऐतिहासिक संधि को भी खतरे में डाल सकती है.सब कुछ निकाल लेने पर आमादा इंसानी उद्योगों से अब तक बचे रहे धरती के आखिरी इलाकों पर फॉसिल ईंधनों की मार पड़ने लगी है. ऐसा ही एक छोर है अंटार्कटिक का. 60 साल पहले अंटार्कटिक की संधि अमल में आ गयी थी. उस वक्त देशों को इस बात का जरा भी अंदाजा न था कि उनकी संधि कितनी कामयाब रह पाएगी. ऑस्ट्रेलिया के दोगुने आकार वाले एक गैर-आबाद महाद्वीप को युद्ध, हथियार और एटमी कचरे से मुक्त रखने पर, विश्व नेता सहमत हुए थे. उन्होंने ऐलान किया था कि दक्षिण ध्रुव का 98 प्रतिशत बर्फ वाला इलाका, जहां कोई आबादी भी नहीं रहती, वो किसी देश का नहीं होगा और उसका इस्तेमाल साझा वैज्ञानिक गतिविधियों में किया जाएगा. आने वाले दशकों में खनिजों और तेल की खुदाई वाली कंपनियों को रोकने के लिए अतिरिक्त नियम बनाए गए जिनकी बदौलत अंटार्कटिक दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक भंडार बन गया. लेकिन अब जलवायु परिवर्तन कामयाबी की उस कहानी को उलट रहा है. अंटार्कटिक की हिम की चादर के तले दुनिया का करीब 90 प्रतिशत पानी जमा है. धरती गरम हो रही है और ग्लेशियर पिघलने और अस्थिर होने लगे हैं. ये ग्लेशियर ढहने लगें तो न्यू यार्क से जकार्ता तक दुनिया के तमाम तटीय शहरों को डुबो सकते हैं. टूट रही है बर्फ दुनिया के सभी नेता, वैश्विक तापमान को इस शताब्दी दो डिग्री सेल्सियस से कम रखने का वादा कर चुके हैं लेकिन उनकी मौजूदा नीतियां, जर्मनी के एक शोध समूह ‘क्लाइमेट एक्शन ट्रेकर' के मुताबिक दुनिया को करीब तीन डिग्री सेल्सियस तक गरम कर देंगी. मई में नेचर जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी में कहा गया है कि वैश्विक तापमान में तीन डिग्री की बढ़त से अंटार्कटिक की बर्फ में पिघलाव की रफ्तार में "आकस्मिक उछाल” आ जाएगा जो आगे चलकर समुद्र की सतह में "द्रुत और अबाध” उभार का कारण बनेगा. साइंस अवेरनेस जर्नल में जून में प्रकाशित एक दूसरे अध्ययन के मुताबिक एक लाख 75 हजार वर्ग किलोमीटर वाले पाइन आईलैंड ग्लेशियर को संभालने वाली आइस शेल्फ तेजी से टूटती जा रही है. वैश्विक समुद्री सतह के उभार में अंटार्कटिक की एक चौथाई से ज्यादा भूमिका इसी ग्लेशियर से आती है. अगर ये गरम पानी में गिरा तो तेजी से पिघलेगा. लेखकों का कहना है, "अगर बर्फ की चादर तेजी से सिकुड़ती रही तो ये ग्लेशियर को संभावित समय से पहले ही अस्थिर करने लगेगी.” ऑस्ट्रेलिया की फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी में इतिहासकार, अलेसान्द्र अंतोनेलो ने अंटार्कटिक की पर्यावरणीय राजनीति पर एक किताब लिखी है. वह कहते हैं, "आज अंटार्कटिक की सबसे प्रमुख पर्यावरणीय चुनौती निस्संदेह जलवायु परिवर्तन ही है.” संधि पर हस्ताक्षर करने वाले 54 देशों में से वोटिंग अधिकार वाले 29 देश हैं और विडंबना देखिए कि इनमें भी अमेरिका और जर्मनी जैसे दुनिया में सबसे बड़े ऐतिहासिक प्रदूषक देशों के अलावा चीन, भारत और ब्राजील जैसे उत्सर्जक देश भी शामिल हैं. अंतोनेल्लो का कहना है कि, "ये पाखंड की इंतहा है.” शांति बनाए रखने की जरूरत उन 12 देशों ने 1959 में इस अंटार्कटिक संधि पर दस्तखत किए थे जिनके वैज्ञानिक उस इलाके में सक्रिय थे. दो साल बाद संधि अमल में आ गयी. सभी देश राजी थे कि इलाका "शांति और विज्ञान को समर्पित एक प्राकृतिक रिजर्व की तरह होगा.” अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ जैसी महाशक्तियों के लिए अंटार्कटिक सहयोग की एक जगह बना. जिसने शीतयुद्ध के एटमी तनावों के खिलाफ एक दुर्लभ राहत हासिल कराई थी. कौन जानता था कि अगले तीन दशकों के दौरान ये दोनों महाशक्तियां खुद को एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के भूगोलों में प्रॉक्सी लड़ाइयों में झोंक देने वाली थीं. अमेरिका में पेन स्टेट यूनिवर्सिटी में ग्लेसियोलॉजिस्ट श्रीधर आनंदकृष्णन कहते हैं कि इन देशों के प्रतिनिधि दूसरे सामरिक स्थानों पर "अपनी छाती पीटते और चीखते-चिल्लाते” थे लेकिन अंटार्कटिक संधि की बैठकों में वे "औपचारिक, आधिकारिक और खुले ढंग से बात करने लगते थे.” वैज्ञानिकों के लिए सहयोग का मतलब था, दूसरे देशों के ठिकानों पर विमानों में तेल भर सकना- जो इस कदर रूखे लैंडस्केप में निहायत ही जरूरी था- और तमाम खोजों, नतीजों को साझा करते रहना. अंटार्कटिक में वैज्ञानिक दलों ने सैकड़ों हजारों साल पहले के जलवायु आंकड़ों को जमा किया है. 1985 में उन्होंने इसी इलाके के ऊपर ओजोन की परत में एक खतरनाक छेद खोजा था. आनंदकृष्णन के मुताबिक अंटार्कटिक में हर कोई "परोपकारी मकसदों” से तैनात है. वो 1985 से अब तक 23 वैज्ञानिक अभियानों में वहां जा चुके हैं. वो कहते हैं, "हम वहां उस चीज के लिए मौजूद हैं जो उम्मीद है हमसे बड़ी है और समाज की सेवा की खातिर है.” माइनिंग, ड्रिलिंग और फिशिंग धरती के ध्रुवीय इलाके बाकी जगहों के मुकाबले तेजी से गरम हो रहे हैं. लेकिन बर्फ के पिघलने से वहां के अहम संसाधन भी उजागर हुए हैं. इसी वजह से उत्तरी ध्रुव भूराजनीतिक तनावों का केंद्र बन चुका है. लेकिन उसके उलट दक्षिणी ध्रुव यानी अंटार्कटिक में कोयले और तेल के भंडारों के अलावा उतने ज्ञात खनिज या ईंधन नहीं हैं. यही कारण है कि इस पर अभी खुदाई और खनन करने वाली कंपनियों का ध्यान नहीं गया है. फिर भी अंटार्कटिक बड़ा है और संसाधन-संपन्न नजदीकी भूगर्भीय इलाकों से करीब करीब मिलताजुलता है. बर्फ की मोटी परत और रूखे मौसम वाले असहनीय लैंडस्केप में खुदाई या खनन या ड्रिलिंग करना बहुत महंगा सौदा है. और वैसे भी संधि के तहत 1991 में इस इलाके में माइनिंग और ड्रिलिंग पर प्रतिबंध लग चुका है जिसकी बदौलत अंटार्कटिक वैज्ञानिक अभियानों और अन्वेषणों से इतर किसी और काम के लिए नहीं है. ये रोक अनिश्चित काल के लिए लगाई गई है और हो सकता है कि 2048 में ही इसकी पहली समीक्षा संभव हो पाए. लेकिन इसके आसपास जो पानी है उसे देखते हुए तस्वीर इतनी रौनकभरी नहीं रह जाती. पानी पर संकट माइनिंग और ड्रिलिंग से इलाके को बचाने का कामयाब अभियान छेड़ने वाले नॉर्डिक ग्रीनपीस में ध्रुवीय इलाकों की विशेषज्ञ और ईकोलॉजिस्ट लॉरा मेलर का कहना है कि "जलवायु की खराबी अंटार्कटिक की दृश्यावली को बुरी तरह बदल रही है. महाद्वीप के इर्दगिर्द फैले जल-जीवन के लिए ये एक बहुत बुरा रूपान्तरण है.” अंटार्कटिक के आसपास सदर्न ओशन में पेटागोनियन टूथफिश जैसी प्रजातियों का अभी भी बेरोकटोक शिकार किया जाता है. अल्बत्रोस और पेट्रल जैसे समुद्री परिंदे फिशिंग जहाजों के विशाल जालों में बाइकैच की तरह फंस जाते हैं और फिर फेंक दिए जाते हैं. क्रिल्ल की फिशिंग भी फलफूल रही है. 2019 में चार लाख टन क्रिल्ल पकड़ी गई. ये वो जीव है जो अंटार्कटिक के ईकोसिस्टम में मील का पत्थर माना जाता है. पेंग्विन, सील, मछलियां और व्हेल उसे खाती हैं. वो बहुत संकरी तापमान रेंज में जीवित रह पाता है औ जलवायु परिवर्तन के लिए एक लिहाज से बफर का काम करता है. 2019 में नेचर जर्नल में प्रकाशित एक पेपर के मुताबिक ये क्रिल्ल समुद्र की सतह पर जमा, कार्बन से भरपूर फाइटोप्लैंकटन को खाकर कार्बन डाइऑक्साइड जमा करते हैं और महासागर के तल में अपने मल की घनी बुंदकियां टपकाते रहते हैं. एक अनुमान के मुताबिक इस किस्म की जीववैज्ञानिक प्रक्रियाएं, महासागरों में हर साल पांच से 12 गीगाटन सीओटू जमा करती हैं. अंटार्कटिक संधि स्थलीय ईकोसिस्टम की हिफाजत तो करती हैं लेकिन समुद्री जीवन पर वो लागू नहीं होती. उसे एक आयोग देखता है जो 1982 में अमल में आया था. वो क्रिल फिशिंग की सीमा तय करता है, हालांकि जलवायु परिवर्तन से आबादी के नुकसान में उनकी गिनती नहीं होती. देखने वाली बात ये भी है कि पेंग्विन जैसे जानवरों को बचाने के लिए संधि कितना काम आती है. पेंग्विन अपना अधिकांश समय समन्दर में बिताती हैं और सिर्फ ब्रीडिंग के लिए जमीन पर आती हैं. क्षेत्र में संरक्षण समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले अंटार्कटिक एंड सदर्न ओशन कोएलिशन (एएसओसी) के वरिष्ठ सलाहकार और ध्रुवीय इलाकों के विशेषज्ञ रिकार्डो राउरा कहते हैं, "इसमें कुछ भी साफ नहीं है.” पर्यटक और कचरा कानूनी अनिश्चितता पर्यटन पर भी लागू होती है. अंटार्कटिक में हर साल करीब 70 हजार सैलानी आते हैं, ज्यादातर गर्मियों में. वैसे तो महाद्वीप के आकार को देखते हुए ये संख्या कम है लेकिन सैलानी ज्यादातर उन्हीं कई दर्जनों लोकेशनों में बार बार जाते हैं, जिन पर उनकी आवाजाही का असर पड़ता ही है. अंटार्कटिक में कचरा गायब नहीं होता हैः इतनी भीषण ठंडक और सूखा है कि कोई भी चीज न टूटती गलती है न बह जाती है जब तक कि कोई ग्लेशियर पिघल कर, कचरे को महासागरों में न फेंक दे. वैज्ञानिक इस बारे में माथापच्ची कर रहे हैं कि आखिर इस कचरे से कैसे निपटे. ग्लेशियोलॉजिस्ट आनंदकृष्णन कहते हैं, "आप खुद से ही ये पूछ रहे होते हैं कि क्या वाकई एक कैंडी रैपर को यहां डंप करना चाहते हैं जो आज से दस हजार साल बाद किसी सील का गला चोक कर दे?” लेकिन टूरिस्टों की संख्या बढ़ती रही तो अंटार्कटिक संधि की शर्तों और बचावों को लागू करते रह पाने में भी मुश्किलें आ सकती हैं. अंटार्कटिक में कोई पुलिस फोर्स तो है नहीं और कोई संप्रभु सरकार भी नहीं है. ऐसे में ये अब भी साफ नहीं है कि विदेशी आगुंतको के किए नुकसान की भरपाई कौन करेगा. खासकर एक खड़े जहाज से होने वाले तेल रिसाव जैसी बड़ी गंभीर स्थितियों में. फिर भी वैश्विक सहयोग की एक मिसाल के रूप में अंटार्कटिक संधि का जवाब नहीं. हालांकि कुछ जानकारों को संदेह है कि उभरते लोकप्रियतावाद के आज के राजनीतिक हालात में इसे दोहराना संभव हो पाएगा. आनंदकृष्णन कहते हैं कि इसे भूमंडलीकरण की तरह देखा जाएगा जो कि ये है भी. "आज की तारीख में ये संधि पास हो जाए, इसकी रत्ती भर भी उम्मीद नहीं की जा सकती.”

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