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27 सितम्बर, 2020|7:45|IST

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इस्लामिक स्टेट के हमलों से अफगानिस्तान से सिखों और हिंदुओं का पलायन तेज, बचे महज 700

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अफगानिस्तान में लगातार घटता रहा सिख और हिंदू समुदाय न्यूनतम स्तर तक सिमट चुका है। इस्लामिक स्टेट (आईएस) के बढ़ते खतरे की वजह से इन अल्पसंख्यक समुदायों के लोग अपने जन्मस्थान को छोड़कर पलायन को मजबूर हैं। अफगानिस्तान में कभी इनकी संख्या करीब 250,000 थी जो अब घटकर 700 तक सिमट गई है। मुस्लिम बहुल देश में भेदभाव की वजह से इन समुदायों के लोगों की संख्या सालों से लगातार घटती रही है, लेकिन अब सरकार की ओर से अपर्याप्त सुरक्षा और इस्लामिक स्टेट के बढ़ते हमलों की वजह से हिंदू और सिख पूरी तरह निर्वासित हो सकते हैं। 

पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर एक व्यक्ति ने कहा, ''हम यहां और नहीं रह पाएंगे।'' हमदर्द सरनेम वाले व्यक्ति ने कहा कि मार्च में समुदाय के एक मंदिर पर इस्लामिक स्टेट के हमले में उनकी बहन, भतीजे और दामाद सहित सात रिश्तेदार मारे गए। हमले में 25 सिखों की मौत हो गई। 

हमदर्द ने कहा कि जन्मस्थान को छोड़ना मां को छोड़ने जितना ही मुश्किल है। इसके बावजूद पिछले महीने वह सिख और हिंदुओं के एक ऐसे समूह में शामिल हो गए जिन्होंने भारत जाने के लिए अफगानिस्तान छोड़ दिया। वहां से से ये किसी तीसरे देश में चले जाएंगे। यद्यपि सिख और हिंदू अलग-अलग धर्मों का पालन करते हैं, उनकी धार्मिक पुस्तकें और मंदिरें अलग हैं, लेकिन अफगानिस्तान में वे एक दूसरे से गुथे हुए हैं। वे यहां एक ही छत के नीचे एकत्रित होकर अपने-अपने तरीकों से सर्वशक्तिमान का ध्यान करते हैं। 

हमदर्द ने कहा, ''रूढीवादी मुस्लिम देश में समुदाय को बड़े पैमाने पर भेदभाव का सामना करना पड़ा है। सभी सरकारों ने हमें अपने तरीकों से धमकाया।'' 2001 में अमेरिका के प्रवेश के बाद लड़ाकों ने उनके घर पर कब्जा कर लिया, जिसकी वजह से उन्होंने घर छोड़कर काबुल में एक गुरुद्वारे में शरण ली।  

1990 के दशक में  तालिबान शासन में सिख और हिंदुओं को अपनी पहचान उजागर करने के लिए पीला आर्मबैंड पहनने को कहा गया था, लेकिन वैश्विक विरोध के बाद इस नियम को लागू नहीं किया गया। सिखों और हिंदुओं के घरों, कारोबार और पूजा स्थलों पर कब्जा कर लिया गया था, लेकिन वापस नहीं दिलाया जा सका। इस वजह से भी पलायन में तेजी आई। 1992-1996 के बीच प्रतिद्वंद्वी सरदारों में क्रूर हिंसा के दौर में काबुल के पुराने हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया।

मार्च में इस्लामिक स्टेट के आतंकी के हमले के अलावा 2018 में इस्लामिक स्टेट के फिदायीन हमले में जलालाबाद शहर में 19 लोग मारे गए थे, जिनमें अधिकतर सिख थे। इनमें एक पुराने नेता भी शामिल थे, जो अफगान संसद के लिए नामित हो चुके थे। 

सुरक्षा कारणों से अपने प्रवास का स्थान जाहिर किए बिना सिख समुदाय के एक नेता चरण सिंह खालसा ने कहा, ''एक छोटे समुदाय के लिए इतनी मौतें सहन योग्य नहीं हैं।'' दो साल पहले खालसा के भाई का काबुल में अपहण कर लिया गया और फिर उन्हें मार डाला गया, इसके बाद उन्होंने अफगानिस्तान को छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि पिछले तीन साल सभी अफगानियों के लिए बेहद खराब रहे हैं विशेषकर सिख और हिंदुओं के लिए।'' 

समुदायों ने मौजूदा सरकारों को इस्लामिक स्टेट के खतरे से बचाने के लिए अपर्याप्त सुरक्षा को लेकर आलोचना की है। अफगानिस्तान सरकार ने 2010 में फैसला लिया कि नेशनल असेंबली में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए विशेष चेयर की व्यवस्था होगी, तब से अब तक दो सिख प्रतिनिधि हुए हैं। हालांकि, खालसा इन पदों को सांकेतिक बताते हैं।  

पिछले महीने राष्ट्रपति अशरफ गनी के प्रवक्ता सेदीक सेदीक्की ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि सिख और हिंदू समुदाय के सदस्य अफगानिस्तान में शांति बहाली के बाद लौट आएंगे। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता तारिक अरियन ने कहा, ''हम लोगों को सुरक्षा देने के लिए सभी संसाधनों का इस्तेमाल करेंगे। हम उनकी (सिख और हिंदू) मानसिक और निजी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध और जिम्मेदार हैं।'' 

अगस्त में 176 अफगान सिख और हिंदू स्पेशल वीजा पर भारत गए। मार्च से यह दूसरा जत्था था। जुलाई में 11 सदस्य भारत पहुंचे थे। खासला ने कहा कि अफगान, कनाडा और यूरोपीय देशों के हिंदू और सिख अफगान से उन लोगों को निकालने में मदद कर रहे हैं जो एयर टिकट का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं।  

पिछले साल भारत में ऐसे ही लोगों को ध्यान में रखकर नागरिकता कानून में संशोधन किया गया। इसके जरिए  पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार गैर मुस्लिमों के लिए नागरिकता का रास्ता आसान बनाया गया। हालांकि, मुसलमानों के प्रति इसे भेदभावपूर्ण बताकर काफी विरोध भी किया गया।

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  • Web Title:Sikhs and Hindus from Afghanistan leave their birthplace as threat from Islamic State rises