फलस्तीन पर प्रस्ताव के बदले संयुक्त बयान पर राजी हुआ ईरान, यूएई भी आया साथ
ईरान ने संयुक्त बयान पर राजी होकर फलस्तीन को संयुक्त राष्ट्र का पूर्ण सदस्य बनाने की शर्त रखी है। यूएई ने भी समर्थन किया है। दिल्ली घोषणा में मध्य एशिया को परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव शामिल है। यह प्रस्ताव इजरायल के लिए कूटनीतिक झटका है।

नई दिल्ली, मदन जैड़ा। अमेरिकी हमलों के खिलाफ आक्रामक रूख अपनाने वाला ईरान आखिर ब्रिक्स में संयुक्त बयान पर कैसे राजी हुआ? इसी प्रकार दूसरा देश यूएई कैसे तैयार हुआ, इसे लेकर हालांकि आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है लेकिन सूत्रों का दावा है कि ईरान फलस्तीन को लेकर संयुक्त बयान में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव जोड़ने की शर्त पर माना जिसमें फलस्तीन को संयुक राष्ट्र का पूर्ण सदस्य देश घोषित करने की मांग प्रमुख रूप से शामिल है। यूएई ने भी इन प्रस्तावों का समर्थन किया। इसके बाद ईरान और यूएई की केमिस्ट्री में बदलाव दिखा। सूत्रों के अनुसार सभी को एकमत करने के लिए भारत ने सभी पक्षों से शनिवार सुबह 4 बजे बात की है। दिल्ली घोषणा पत्र के प्रस्ताव संख्या 31 में कहा गया है कि हम इस बात की पुष्टि करते हैं कि इजरायल-फलस्तीन संघर्ष का सही और स्थाई समाधान केवल शांतिपूर्ण तरीकों से ही हासिल किया जा सकता है और यह फलस्तीनी लोगों के कानूनी अधिकारों की पूर्ति पर निर्भर करता है, जिसमें आत्मनिर्णय और वापसी का अधिकार भी शामिल है। ब्रिक्स सभी वैश्विक संगठनों में फलस्तीन के सही प्रतिनिधित्व की जरूरत को मानता है जिसमें मल्टीलेटरल फाइनेंशियल संस्थाएं भी शामिल हैं। दूसरे, अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार दो देश समाधान के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन को पूरी सदस्यता का समर्थन करता है। अभी संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन गैर सदस्य पर्यवेक्षक राज्य का दर्जा प्राप्त है। उसे पूर्ण सदस्य देश के रूप में मान्यता नहीं है.
मध्य एशिया को परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव
दिल्ली घोषणा में समूचे मध्य एशिया को परमाणु हथियारों से मुक्त क्षेत्र घोषित करने का भी प्रस्ताव किया गया है। यदि संयुक्त राष्ट्र किसी क्षेत्र को परमाणु हथियारों से मुक्त क्षेत्र घोषित करता है तो वहां परमाणु हथियारों का निर्माण और वितरण निषेध होता है। ईरान पर अमेरिकी हमलों के मद्देनजर यह एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव है। दरअसल अमेरिका ईरान पर परमाणु हथियार बनाने का आरोप लगाता है। यदि संयुक्त राष्ट्र मध्य एशिया को परमाणु हथियारों से मुक्त क्षेत्र घोषित करता है तो ईरान के इस दावे को बल मिलेगा कि वह परमाणु हथियार नहीं बना रहा.
ब्रिक्स का प्रस्ताव इजरायल के लिए कूटनीतिक झटका
ईरान की भांति यूएई भी फलस्तीन समस्या के द्वि राष्ट्र समाधान का समर्थक है। सूत्रों का कहना है कि यूएई भी इस प्रस्ताव के पक्ष में रहा और संयुक्त बयान पर आमराय बनाने में भारत की राह आसान हुई। भारत भी फलस्तीन को राष्ट्र के रूप में मान्यता देता है। एक प्रकार से ब्रिक्स का यह प्रस्ताव इजरायल के लिए कूटनीतिक झटका है। घोषणा पत्र में फलस्तीन को लेकर और भी कई बिन्दु हैं। इसमें यूएन सिक्योरिटी काउंसिल और जनरल असेंबली के संबंधित प्रस्ताव, और अरब पीस इनिशिएटिव शामिल हैं, जिसमें 1967 की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं के अंदर एक संप्रभु, स्वतंत्र और व्यवहार्य फलस्तीन राज्य की स्थापना शामिल है, जिसमें गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक शामिल हैं जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम हो, ताकि शांति और सुरक्षा के साथ साथ रहने वाले दो राज्यों का सपना पूरा हो सके.
मंत्रिस्तरीय बैठक बिना संयुक्त बयान के खत्म हुई थी
इससे पहले ईरान और यूएई के मतभेद की वजह से मई में राजधानी में हुई ब्रिक्स मंत्रिस्तरीय बैठक ब्लॉक के इतिहास में पहली बार बिना किसी आम संयुक्त बयान के खत्म हुई थी। इसके बजाय, ईरान और यूएई के बीच गहरे मतभेदों की वजह से सदस्य देशों के बीच आम सहमति नहीं बन पाई, इसलिए भारत ने सिर्फ 'अध्यक्ष का बयान' और 'परिणाम दस्तावेज' जारी किया था। भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार कहते आए हैं कि टकराव सुलझाने के लिए संवाद और कूटनीति का समर्थन जरूरी है। उन्होंने दोहराया कि यह दौर युद्ध का नहीं है और समाधान युद्ध के मैदान से नहीं निकलेगा। सबसे खास बात ये भी है कि अपनी जी20 अध्यक्षता की तरह ही, ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे भारत ने इस समूह को पश्चिम-विरोधी बनाए बिना 'ग्लोबल साउथ' के हितों को बढ़ाने पर जोर दिया.


