दुनिया का आपातकालीन तेल भंडार घटा, संकट बढ़ने के आसार
दुनिया में तेल की आपूर्ति रुकने पर आपातकालीन कच्चे तेल का भंडार तेजी से घट रहा है। आईईए की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सहित वैश्विक तेल कीमतों में तेज उछाल आने का खतरा है। कुछ संकेत अमेरिका में तेल भंडार बढ़ने के हैं, लेकिन एशिया के लिए ढुलाई लागत बढ़ सकती है।

नई दिल्ली, एजेंसी। दुनिया में अचानक तेल की आपूर्ति रुकने पर कीमतों को संभालने के लिए इस्तेमाल होने वाला आपातकालीन कच्चे तेल का भंडार तेजी से घट रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने मार्च में करीब 40 करोड़ बैरल आपातकालीन तेल बाजार में उतारा था। इसमें से करीब 35 करोड़ बैरल यानी लगभग 88 फीसदी अब बाजार में खप चुका है। इसका असर आने वाले समय में भारत समेत पूरी दुनिया पर दिख सकता है और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। चॉइस इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार में तेल भंडार घटने की मौजूदा रफ्तार करीब 24 लाख बैरल प्रतिदिन बनी हुई है। इस आधार पर अनुमान है कि आईईए की ओर से जारी 40 करोड़ बैरल आपातकालीन तेल में से 88 प्रतिशत हिस्से का इस्तेमाल हो चुका है। इसका मतलब है कि बाजार के पास आपूर्ति में किसी नए संकट का सामना करने के लिए पहले के मुकाबले कम अतिरिक्त सहारा बचा है। रिपोर्ट का मानना है कि अगर मौजूदा सप्लाई की दिक्कतें लंबे समय तक बनी रहती हैं तो कच्चे तेल की कीमतों पर इसका असर दिखाई दे सकता है।
अभी तस्वीर पूरी तरह खराब नहीं
वैश्विक बाजार में कुछ ऐसे संकेत भी हैं जो अचानक बहुत बड़ी कीमत वृद्धि के जोखिम को सीमित कर सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में कच्चे तेल का भंडार एक सप्ताह में करीब 1.7 करोड़ बैरल बढ़ा है। यह जनवरी 2023 के बाद एक सप्ताह में सबसे बड़ी बढ़ोतरी है। खाड़ी तट पर आयात बढ़ने और निर्यात कमजोर रहने से वहां ज्यादा तेल जमा हुआ। चीन भी कुछ समय तक अपने तेल भंडार का इस्तेमाल करने के बाद दोबारा खरीद बढ़ा रहा है। जुलाई में चीन के शानडोंग क्षेत्र में तेल भंडार में रिकॉर्ड 3.5 करोड़ बैरल की कमी आई थी। अब रिफाइनरियों में रखरखाव पूरा होने के बाद तेल की खपत बढ़ने की उम्मीद है। अगस्त में वहां रिफाइनरियों की प्रोसेसिंग 6 फीसदी से ज्यादा बढ़ने का अनुमान है।
एशिया के लिए बढ़ सकती है ढुलाई लागत
सऊदी अरब ने भी तेल भेजने का रास्ता बदला है। रिपोर्ट के मुताबिक, उसने मिस्र की सुमेद पाइपलाइन के जरिए अगस्त में कच्चे तेल का निर्यात करीब 23 लाख बैरल प्रतिदिन कर दिया है, जबकि जुलाई में यह करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन था। लाल सागर से जुड़े सुरक्षा जोखिमों से बचने के लिए इस रास्ते का अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। इस बदलाव का असर एशियाई खरीदारों पर पड़ सकता है। अगर तेल को एशिया तक पहुंचने में ज्यादा समय लगता है तो माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा, जिससे भारत के लिए आयातित तेल की वास्तविक लागत और बढ़ सकती है।
डीजल पर भी अलग से खतरा
चिंता सिर्फ कच्चे तेल की नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में पेट्रोलियम उत्पादों का बाजार भी तंग हो रहा है। यूरोप में गैसोइल के रिफाइनिंग मार्जिन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। आगे रिफाइनरियों में रखरखाव का दौर शुरू होने से डीजल जैसे ईंधनों की सप्लाई कम हो सकती है। इससे कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। भारत के लिए यह इसलिए अहम है क्योंकि डीजल का इस्तेमाल परिवहन के अलावा कृषि और कई उद्योगों में भी होता है।
ब्रेंट क्रूड को लेकर क्या है अनुमान
इन तमाम जोखिमों के बावजूद रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ब्रेंट क्रूड का अनुमान 82 डॉलर प्रति बैरल पर बरकरार रखा गया है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी साफ कहा गया है कि अगर तेल की आपूर्ति में मौजूदा रुकावट एक हफ्ते से ज्यादा समय तक बनी रहती है, तो इस अनुमान से ज्यादा कीमतें देखने का जोखिम बढ़ सकता है।
भारत के लिए इस संकट के मायने
कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने का सबसे सीधा असर भारत में पेट्रोल और डीजल की लागत पर पड़ता है। तेल महंगा होने पर भारत का आयात बिल बढ़ता है। इससे रुपये पर भी दबाव पड़ सकता है और सरकार तथा तेल कंपनियों के लिए ईंधन की लागत बढ़ सकती है। साथ ही डीजल की लागत बढ़ने से ट्रक, बस और दूसरे मालवाहक वाहनों का परिवहन खर्च बढ़ सकता है। इससे सब्जी, अनाज, दूध, किराना और दूसरी जरूरी वस्तुओं को बाजार तक पहुंचाने की लागत बढ़ सकती है। यानी कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहने पर भारत की महंगाई पर दोबारा दबाव बन सकता है।
रुपये पर भी पड़ सकता है दबाव
तेल खरीदने के लिए भारत को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। जब कच्चा तेल महंगा होता है तो तेल आयातकों की डॉलर की जरूरत बढ़ती है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। अगर रुपया कमजोर होता है तो भारत के लिए विदेश से खरीदा जाने वाला कच्चा तेल और महंगा पड़ता है। इस तरह महंगा तेल और कमजोर रुपया मिलकर आयात की लागत को और बढ़ा सकते हैं।
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