सिर्फ गरीबी घटना पर्याप्त नहीं, असमानता भी घटे : थॉमस पोगे

हिन्दुस्तान, बिहारशरीफ
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नालंदा विश्वविद्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में गरीबी और असमानता की समस्याओं पर विचार किया गया। प्रो. थॉमस पोगे ने कहा कि केवल गरीबी कम होने से प्रगति का आकलन नहीं किया जा सकता, असमानता की भी जांच जरूरी है। विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों ने अध्यायन किया और न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिए वैश्विक ज्ञान साझा करने की आवश्यकता पर बल दिया।

सिर्फ गरीबी घटना पर्याप्त नहीं, असमानता भी घटे : थॉमस पोगे

सिर्फ गरीबी घटना पर्याप्त नहीं, असमानता भी घटे : थॉमस पोगे नालंदा विवि में वैश्विक न्याय पर अंतरराष्ट्रीय मंथन, विकास के लाभ पर उठे सवाल ग्लोबल नॉर्थ-साउथ की खाई पाटने पर हुआ विमर्श गरीबी, असमानता और वैश्विक शासन पर मंथन को जुटे देश-विदेश के विशेषज्ञ नालंदा में वैश्विक न्याय की नई परिभाषा पर जमकर हुई बहस, वंचितों तक विकास पहुंचाने पर दिया गया जोर राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस हॉल में ‘रीथिंकिंग ग्लोबल जस्टिस’ विषय पर बोले दर्जनों विद्वान फोटो : नालंदा यूनिवर्सिटी : नालंदा विश्वविद्यालय में गुरुवार को राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस हॉल में ‘रीथिंकिंग ग्लोबल जस्टिस’ विषय पर मंथन करते कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी, येल विश्वविद्यालय के प्रो. थॉमस पोगे व अन्य। राजगीर, कार्यालय संवाददाता। नालंदा विश्वविद्यालय में येल विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र व अंतरराष्ट्रीय मामलों के लिटनर प्रोफेसर और ग्लोबल जस्टिस प्रोग्राम के संस्थापक निदेशक प्रो. थॉमस पोगे ने कहा कि गरीबी के खिलाफ हुई प्रगति का आकलन सिर्फ गरीबी घटने से नहीं किया जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि असमानता कितनी कम हुई और आर्थिक विकास का लाभ समाज के सबसे वंचित तबके तक किस हद तक पहुंचा। जलवायु परिवर्तन, तकनीकी बदलाव, वैश्विक स्वास्थ्य संकट और बढ़ती आर्थिक असमानता के बीच दुनिया में न्यायपूर्ण व्यवस्था कैसे कायम हो, इस पर गुरुवार को नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मंथन हुआ।

वैश्विक उत्तर-दक्षिण की खाई पर चर्चा :

विश्वविद्यालय के राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस हॉल में ‘रीथिंकिंग ग्लोबल जस्टिस’ विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में दुनिया के विश्वभर से जुटे शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और नीति विशेषज्ञों ने वैश्विक न्याय की मौजूदा चुनौतियों पर विचार रखे। प्र. पोगे ने कहा कि गरीबी और असमानता को मापने के मौजूदा तरीके लोगों की वास्तविक परिस्थितियों को कितनी सही तरह सामने रखते हैं, इस पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। भारत से अपने बौद्धिक जुड़ाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने नालंदा में इस विमर्श का हिस्सा बनने पर खुशी जतायी।

गरीबी, शासन से लेकर पेटेंट तक पर बहस :

संगोष्ठी में तीन प्रमुख सत्र हुए। पहले सत्र में गरीबी, विकास और वैश्विक न्याय, दूसरे में नैतिकता, वैश्विक शासन और संस्थागत जवाबदेही व तीसरे में बौद्धिक संपदा अधिकार, नवाचार और वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने वैश्विक संस्थाओं की जवाबदेही, विकास के असमान वितरण और तकनीकी नवाचार के लाभों की समान पहुंच जैसे मुद्दों पर विचार रखा। इसके बाद वैलेडिक्टरी सत्र हुआ। कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. अशोक आचार्य, जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रो. सैकत सिन्हा रॉय, नालंदा विश्वविद्यालय के प्रो. एसके मोहंती व प्रो. अरविंद कुमार, काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट की प्रो. नित्या नंदा समेत देश-विदेश के कई शिक्षाविद और विशेषज्ञ शामिल हुए।

सामान्य प्रश्न

इस संगोष्ठी का मुख्य विषय क्या था?
इस संगोष्ठी का मुख्य विषय 'रीथिंकिंग ग्लोबल जस्टिस' था।
Hindustan | Bureau

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