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जलवायु नीति पर G-7 देशों का रुख नहीं दिखा खास, नवंबर में होने वाली काफ-26 की बैठक न हो जाए असफल

मदन जैड़ा,नई दिल्लीPublished By: Priyanka
Thu, 17 Jun 2021 06:30 AM
जलवायु नीति पर G-7 देशों का रुख नहीं दिखा खास, नवंबर में होने वाली काफ-26 की बैठक न हो जाए असफल

दुनिया के सबसे अमीर देशों के समूह जी-7 के रुख से जलवायु नीति को लेकर अमीर एवं गरीब देशों के बीच खाई और गहरी होने का अनुमान है। दरअसल, जी-7 बैठक में जलवायु वित्त यानी क्लाइमेट फाइनेंस से लेकर कोरोना टीकाकरण जैसे मुद्दों पर कई उम्मीदें लगी हुई थीं, लेकिन जी-7 देशों ने जिस प्रकार से सतही तरीके से इन मुद्दों पर प्रतिक्रिया दी हैं, उससे निराशा उत्पन्न हुई है। सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक पर अब दुनिया की नजरें हैं और यदि इसमें भी अमीर देशों की तरफ से कोई ठोस पहल नहीं की जाती हैं तो फिर नवंबर में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की काफ-26 बैठक के भी असफल होने की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। 

हाल में ब्रिटेन में हुई जी-7 बैठक में प्रत्येक देश ने जलवायु खतरों से निपटने के लिए वित्त बढ़ाने की प्रतिबद्धता को प्रकट की लेकिन कोई स्पष्ट पेशकश नहीं की गई है। जलवायु वित्त में सुधार की बात भी 2025 तक कही गई है। जबकि दस साल पूर्व हुई सहमति के तहत 2020 से जलवायु कोष में 100 अरब डॉलर सालाना जमा होने चाहिए। उसका सबसे बड़ा दारोमदार सात सर्वाधिक अमीर देशों पर है जो जी-7 के रूप में जाने जाते हैं। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा तथा जापान शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जी-7 देशों को जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए वित्त, तकनीकी एवं अन्य मुद्दों पर स्पष्ट घोषणा करनी चाहिए। 

ग्रीनपीस की कार्यकारी निदेशक जेनिफ़र मॉर्गन ने कहा कि हर कोई कोविड-19 और बिगड़ते जलवायु प्रभावों की चपेट में आ रहा है, लेकिन जी-7 नेताओं के इस रवैये से सबसे ज़्यादा परेशानी उन्हें होगी जो सबसे कमज़ोर हैं और सबसे ख़राब स्थिति में है। इस बैठक की विफलता से अब काप-26 के विफल होने के आसार पैदा हो गए हैं। क्योंकि अमीर और विकासशील देशों के बीच विश्वास की कमी बनी हुई है।  

संयुक्त राष्ट्र की पूर्व जलवायु प्रतिनिधि रेचल कायट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा क्लाइमेट एक्शन के लिए 100 अरब डॉलर को वास्तविकता बनाने के लिए विस्तृत योजना की आवश्यकता है। यह जलवायु कूटनीति के लिए एक बड़ा वर्ष है और जी-7 देशों को जुलाई में जी-20 वित्त बैठक, सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा, अक्तूबर में आईएमएफ विश्व बैंक की वार्षिक बैठकों में भी हिस्सेदारी करनी है। उनके अपेक्षा की जाती है कि वह इनमें अच्छा प्रभाव बनाएं।

इसके अलावा विशेषज्ञों का कहना है कि जी-7 देशों ने गरीब देशों को टीकाकरण के लिए जो एक अरब टीकों की पेशकश की है, वह कम है। पहले से जलवायु खतरों से जूझ रही गरीब जनता के लिए यह पर्याप्त नहीं है तथा उनकी चुनौतियां कम नहीं होती हैं। जी-7 देशों को कोरोना टीकों को पूरी तरह से पेटेंट मुक्त कराने का समर्थन करने के साथ-साथ इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।

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