आर्कटिक रूट: चीन नई चाल से बदलने चला समुद्री कारोबार
चीन ने दक्षिणी समुद्री रास्ते की जगह 20 दिन में यूरोप पहुंचने वाले आर्कटिक समुद्री रास्ते का संचालन शुरू करने का फैसला किया है। यह नया मार्ग दूरी और समय की बचत के साथ-साथ चीन-यूरोप व्यापार को बढ़ाने में मदद करेगा। भारत भी इस रास्ते में रुचि दिखा रहा है।

नई दिल्ली, एजेंसी। पिछले कुछ सालों में लाल सागर, स्वेज नहर और दूसरे समुद्री रास्तों पर युद्ध और तनाव ने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि अगर एक समुद्री रास्ता बंद हुआ तो हजारों जहाजों का रास्ता बदल सकता है, माल पहुंचने में कई दिन या हफ्ते ज्यादा लग सकते हैं और परिवहन लागत बढ़ सकती है। अब चीन ने दक्षिण के जोखिम भरे रास्ते की जगह 20 दिन में यूरोप पहुंचने वाला आर्कटिक समुद्री रास्ता इस्तेमाल करने का फैसला किया है। अभी चीन से यूरोप जाने वाले बड़े कंटेनर जहाजों को आमतौर पर दक्षिण की ओर जाना पड़ता है। हिंद महासागर, अरब सागर, लाल सागर और फिर स्वेज नहर के जरिए भूमध्य सागर पार करके यूरोप पहुंचा जाता है लेकिन उत्तरी जल मार्ग में रास्ता उल्टा है। जहाज चीन के उत्तरी हिस्से से निकलकर रूस के साइबेरियाई तट के ऊपर से आर्कटिक महासागर में जाते हैं और फिर यूरोप की तरफ नीचे आते हैं यानी दुनिया के नक्शे पर चीन से यूरोप जाने के लिए जो रास्ता नीचे की तरफ जाता है, उसकी जगह चीन अब ऊपर से जाने वाला रास्ता तलाश रहा है।
चीन की इतनी दिलचस्पी का कारण
चीन लंबे समय से इस बात को लेकर चिंतित रहा है कि उसके व्यापार और ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा कुछ समुद्री रास्तों पर निर्भर है। इसे चीन की मलक्का दुविधा से भी जोड़कर देखा जा सकता है। मलक्का एशिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है। चीन के लिए वहां किसी बड़े संकट या नाकेबंदी की स्थिति गंभीर समस्या पैदा कर सकती है। यही वजह है कि आइस सिल्क रोड को चीन सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि जियोपॉलिटक्स का प्रोजेक्ट भी मान रहा है। यानी जिस समय अमेरिका और यूरोप रूस पर प्रतिबंध और दबाव बढ़ा रहे हैं, उसी समय चीन रूस के साथ मिलकर एक ऐसा व्यापारिक रास्ता विकसित कर रहा है जिसका रणनीतिक महत्व आने वाले वर्षों में बढ़ सकता है। यह पश्चिम के लिए एक नई चुनौती हो सकती है।
यह रास्ता खास क्यों है
यह रास्ता लगभग 5,600 किलोमीटर लंबा है, रूस के आर्कटिक तट के साथ-साथ चलता है, और पूर्वी एशिया को यूरोप से जोड़ने वाला सबसे छोटा शिपिंग मार्ग है। चीन से उत्तरी यूरोप तक यह रास्ता करीब 18-20 दिन में पूरा हो सकता है। इसके मुकाबले स्वेज नहर या अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते यात्रा में 40-50 दिन तक लगते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा दूरी और समय की बचत है। छोटा रास्ता होने से अनुकूल परिस्थितियों में ईंधन और परिचालन लागत भी घट सकती है। लेकिन अभी यह पूरे साल खुला नहीं रहता और बर्फ, मौसम, बीमा, आइस-क्लास जहाज तथा आइसब्रेकर जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। यह मार्ग आर्कटिक नॉर्थईस्ट पैसेज से होकर गुजरता है और फिर उत्तरी यूरोप और बाल्टिक सागर क्षेत्र के कई प्रमुख बंदरगाहों पर रुकता है, जिनमें फेलिक्सस्टोव - यूके का सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह, साथ ही नीदरलैंड में रॉटरडैम, जर्मनी में हैम्बर्ग और पोलैंड में ग्डीनिया शामिल हैं।
समय की बचत सबसे बड़ा लाभ
इस मार्ग का एक उल्लेखनीय लाभ यात्रा का समय है। चीन से यूरोप की यात्रा में लगभग 20 दिन लगते हैं, जबकि चीन-यूरोप रेल मार्ग से लगभग 25 दिन, स्वेज नहर के रास्ते 40 दिन और केप ऑफ गुड होप के चारों ओर से जाने पर 50 दिन लगते हैं। इस मार्ग का पहला परीक्षण सितंबर 2025 में किया गया था। उस समय, निंगबो-झुशान बंदरगाह से चलने वाली ट्रेनें लगभग 20 दिनों में फेलिक्सस्टोव पहुंच गईं, जिससे चीन और यूरोप के बीच माल परिवहन के समय को काफी कम करने की क्षमता प्रदर्शित हुई। यह मार्ग फिलहाल केवल मौसमी तौर पर, मुख्य रूप से जुलाई से अक्टूबर तक ही चालू रहता है। बर्फ, मौसम, सीमित बंदरगाह, महंगा बीमा और आइसब्रेकर की जरूरत इसे स्वेज नहर का तत्काल विकल्प नहीं बनने देती।
रूस का ‘कब्जा’ और चीन की बढ़ती मौजूदगी
आर्कटिक रूट पर सबसे मजबूत नियंत्रण रूस का है। यह मार्ग रूस के उत्तरी समुद्री तट के साथ चलता है और रूस इस क्षेत्र में बंदरगाह, आइसब्रेकर, ऊर्जा परियोजनाओं और जहाजरानी ढांचे को तेजी से विकसित कर रहा है। रूस इस रूट को अपने ऊर्जा निर्यात और एशियाई बाजारों तक पहुंच के लिए भी इस्तेमाल कर रहा है। 2026 में रूसी तेल की एशिया को आपूर्ति तेजी से बढ़ी है। यही वजह है कि चीन की बढ़ती मौजूदगी को केवल व्यापारिक गतिविधि के तौर पर नहीं देखा जा रहा। चीन आर्कटिक में प्रत्यक्ष तटीय देश न होने के बावजूद वहां आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव बढ़ाना चाहता है। रूस के साथ मिलकर काम करना उसे इस क्षेत्र में प्रवेश का मजबूत आधार देता है।
भारत भी क्यों चाहता है रास्ते में हिस्सेदारी?
भारत के लिए इस रास्ते का महत्व मुख्य रूप से ऊर्जा सुरक्षा, रूस के साथ व्यापार और यूरोप से संपर्क से जुड़ा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हाल में कहा है कि भारत इस मार्ग में रुचि दिखा रहा है। भारत इस रास्ते के जरिए रूसी आर्कटिक क्षेत्र और सुदूर पूर्व से व्यापार बढ़ा सकता है। खासकर तेल, गैस और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की आपूर्ति में यह मार्ग उपयोगी हो सकता है। भारत-रूस सहयोग बढ़ने पर भविष्य में भारतीय जहाजों और कंपनियों की इस कॉरिडोर में भूमिका बढ़ सकती है। भारत ने रूस के साथ व्यापार को बढ़ावा देने और स्वेज नहर के माध्यम से शिपिंग पर निर्भरता कम करने के प्रयास में, 2027 में रूस के उत्तरी तट के साथ उत्तरी समुद्री मार्ग पर परीक्षण के लिए अपना पहला मालवाहक जहाज लॉन्च करने की योजना बनाई है।


