ब्रिक्स के तीसरे दशक में वैश्विक व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बनाने पर जोर
ब्रिक्स के 20 साल पूरे होने के बाद अब संगठन के सामने वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की चुनौती है। लखनऊ में आयोजित 18वें ब्रिक्स अकादमिक फोरम में नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों ने ब्रिक्स के भविष्य पर चर्चा की। उन्होंने जलवायु सहयोग और टिकाऊ बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया।

लखनऊ, संवाददाता। ब्रिक्स के 20 साल पूरे होने के बाद अब संगठन के सामने वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, तकनीक को समावेशी विकास का माध्यम बनाने और टिकाऊ विकास के लिए सामूहिक प्रयास बढ़ाने की चुनौती है। सोमवार को लखनऊ में शुरू हुए 18वें ब्रिक्स अकादमिक फोरम के पहले दिन नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने ब्रिक्स के भविष्य को लेकर मंथन किया। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत आयोजित फोरम का आयोजन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) ने रिसर्च एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज (आरआईएस) और लखनऊ विश्वविद्यालय के सहयोग से किया।
वैश्विक शासन में सुधार जरूरी
विदेश मंत्रालय में सचिव (ईआर) एवं भारत के ब्रिक्स शेरपा सुधाकर दलेला ने कहा कि ब्रिक्स एक विचार से आगे बढ़कर उभरते बाजारों और विकासशील देशों के बीच सहयोग के प्रमुख मंच के रूप में स्थापित हुआ है। उन्होंने कहा कि भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता का केंद्र बिंदु लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता है। उन्होंने ब्रिक्स अकादमिक फोरम को संगठन के भीतर बौद्धिक संवाद और सहयोग को लगातार मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण पहल बताया। केयरएज के प्रबंध निदेशक एवं समूह मुख्य कार्यकारी अधिकारी मेहुल पांड्या ने विशेष संबोधन में बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच देशों की साख तय करने की मौजूदा व्यवस्था पर पुनर्विचार की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि संप्रभु साख के आकलन में ऋण संरचना, पूंजी निर्माण, जलवायु जोखिम और संरचनात्मक सुधारों को अधिक महत्व मिलना चाहिए।
जलवायु से आपूर्ति तक चुनौतियों पर चर्चा
फोरम के विभिन्न सत्रों में स्थिरता और तकनीक के जरिए ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने जलवायु सहयोग, बेहतर आंकड़ा तंत्र, मिश्रित वित्त, टिकाऊ बुनियादी ढांचे और तकनीकी साझेदारी को मजबूत करने की जरूरत बताई। पहले दिन की चर्चाओं में इस बात पर सहमति दिखी कि ब्रिक्स को संवाद से आगे बढ़कर ऐसे संस्थागत तंत्र विकसित करने होंगे, जो सहयोग को ठोस कार्रवाई और कार्रवाई को दीर्घकालिक परिणामों में बदल सकें।
ओआरएफ के अध्यक्ष समीर सरन ने कहा कि ब्रिक्स के तीसरे दशक में तीन प्राथमिकताएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बनाना, तकनीक के जरिए समावेशी एवं टिकाऊ विकास सुनिश्चित करना और सतत विकास व पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स किसी निश्चित मंजिल तक पहुंचने वाला संगठन नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता रखने वाला मंच है।
फोरम के ब्रिक्स एट 20 सत्र में दो दशकों में संगठन के संस्थागत विकास और भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा हुई। ओआरएफ के उपाध्यक्ष हर्ष वी. पंत ने कहा कि आने वाली पीढ़ी की भूमिका ब्रिक्स के भविष्य को आकार देने में अहम होगी। चीन काउंसिल फॉर ब्रिक्स थिंक-टैंक कोऑपरेशन की उप महासचिव जिंग झाओ ने विस्तार के साथ सहमति निर्माण को भी जरूरी बताया। उन्होंने युवा शोधकर्ताओं की भागीदारी बढ़ाने, शैक्षणिक आदान-प्रदान और शोध अवसरों को मजबूत करने पर जोर दिया।


