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भारत से बराबरी करना चाहता है पाकिस्तान, इस दिन भेजेगा अपना 'चंद्रयान'; जानिए कितना खास है मिशन?

इसमें दो ऑप्टिकल कैमरे लगे हैं जो चंद्रमा की सतह की तस्वीरें क्लिक करेंगे। बताया जा रहा है कि कई टेस्ट के बाद पाकिस्तान ने अपने ऑर्बिटर आईसीयूबीई-क्यू को चांग'ई6 मिशन के साथ जोड़ दिया है।

भारत से बराबरी करना चाहता है पाकिस्तान, इस दिन भेजेगा अपना 'चंद्रयान'; जानिए कितना खास है मिशन?
Amit Kumarलाइव हिन्दुस्तान,इस्लामाबादWed, 01 May 2024 03:20 PM
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भारत के मून मिशन चंद्रयान-3 की सफलता के बाद पाकिस्तान बेहद बेचैन नजर आ रहा है। यही वजह है कि आर्थिक तंगी से जूझने के बावजूद पड़ोसी देश भी अपना मून मिशन लॉन्च करने जा रहा है। हालांकि यह भारत के चंद्रयान मिशनों के आसपास भी नहीं है। पाकिस्तान का मून मिशन (ICUBE-Q) शुक्रवार (3 मई) को हैनान से चीन के चांग'ई6 पर सवार होकर चंद्रमा की कक्षा में जाएगा। यानी पाकिस्तान अपने दम पर नहीं बल्कि चीन के दम पर भारत से बराबरी करना चाहता है। पाकिस्तान का यह उपकरण चांद पर नहीं उतरेगा, बल्कि उसकी कक्षा में ही रह जाएगा।

पाकिस्तान के मून मिशन का नाम आईसीयूबीई-क्यू है। दरअसल यह एक सैटेलाइट है जो चंद्रमा से जुड़ी जानकारी साझा करेगी। इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस टेक्नोलॉजी (आईएसटी) ने बताया कि उसने पाकिस्तानी सैटेलाइट आईसीयूबीई-क्यू को चीन की शंघाई यूनिवर्सिटी एसजेटीयू और पाकिस्तान की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी सुपारको के सहयोग से डिजाइन और तैयार किया है।

आईसीयूबीई-क्यू ऑर्बिटर में दो ऑप्टिकल कैमरे लगे हैं जो चंद्रमा की सतह की तस्वीरें क्लिक करेंगे। बताया जा रहा है कि कई टेस्ट के बाद पाकिस्तान ने अपने ऑर्बिटर आईसीयूबीई-क्यू को चांग'ई6 मिशन के साथ जोड़ दिया है। चांग’ई6 चीन के मून मिशनों की छठी सीरीज है। ठीक चंद्रयान की तरह। जैसे भारत ने पहले चंद्रयान, फिर चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 लॉन्च किए हैं। चीन भी छठी बार चंद्रमा से जुड़ा मिशन लॉन्च कर रहा है।

चीन का चंद्र मिशन चांग'6, चंद्रमा की सतह पर लैंड करेगा और वहां से नमूने एकत्र करके धरती पर लाएगा ताकि आगे की रिसर्च की जा सके। यह मिशन पाकिस्तान के लिए खास माना जा रहा है। क्योंकि यह आईएसटी द्वारा विकसित पाकिस्तान क्यूबसैट सैटेलाइट ICUBE-Q भी ले जाएगा। क्यूबसैट छोटे सैटेलाइट को कहा जाता है, जो आमतौर पर अपने छोटे आकार और खास डिजाइन के लिए जाने जाते हैं। इनको क्यूब के साइज में बनाया जाता है। इन सैटेलाइट का वजन अक्सर कुछ किलोग्राम से अधिक नहीं होता है और इन्हें विभिन्न उद्देश्यों के लिए अंतरिक्ष में तैनात किया जाता है।