Explainer: पुतिन ने चली ऐसी चाल कि तिलमिला उठा जापान, आखिर कुरील द्वीप पर क्या है विवाद?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने विवादित कुरील द्वीपों का अपना पहला दौरा किया और जापान को तिलमिला दिया। ऐसे में ये जानना जरूरी है कि आखिर क्या है ये कुरील द्वीप विवाद, जिसने दोनों देशों के बीच 80 साल से शांति संधि तक नहीं होने दी? पूरी डिटेल जानिए।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार ( 13 अगस्त ) को विवादित कुरील द्वीप समूह के दक्षिणी द्वीप इटुरूप (जापान के अनुसार एतोरोफु) का अपना पहला आधिकारिक दौरा किया। यह दौरा रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्र में रूसी प्रशांत बेड़े की सैन्य अभ्यास के ठीक अगले दिन हुआ। पुतिन के इस कदम ने जापान में हलचल मच गई है। यही कारण है कि जापान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया दी गई है। टोक्यो ने इसे 'पूरी तरह अस्वीकार्य' करार दिया और कहा कि यह जापानी जनता की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है।
बता दें कि पुतिन ने द्वीप पर यास्नी मछली प्रसंस्करण संयंत्र का निरीक्षण किया, जहां उन्होंने स्थानीय मछली के अंडे (कैवियार) चखे। उन्होंने कुरिल्स्क के सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट अस्पताल और हीरो ऑफ रशिया एदुआर्द नोर्पोलोव सेकेंडरी स्कूल का भी दौरा किया। स्थानीय लोगों से बातचीत के दौरान उन्होंने मौसम की तारीफ करते हुए कहा कि यहां का मौसम कितना सुंदर है, बिल्कुल रिसॉर्ट जैसा! इसके अलावा द्वीप पर उन्होंने सखालिन क्षेत्र के गवर्नर वालेरी लिमारेन्को से भी मुलाकात की। रूसी राज्य मीडिया के अनुसार, यह पुतिन का कुरील का पहला व्यक्तिगत दौरा है। इससे पहले 2010 में तत्कालीन राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव कुनाशीर द्वीप गए थे।
कुरील द्वीप समूह क्या है और विवाद की वजह?
कुरील द्वीप समूह जापान के उत्तरी मुख्य द्वीप होक्काइडो और रूस के कामचटका प्रायद्वीप के बीच प्रशांत महासागर में फैली ज्वालामुखीय द्वीपों की एक लंबी श्रृंखला है। कुल लगभग 56 द्वीपों वाली इस श्रृंखला में विवाद मुख्य रूप से दक्षिणी छोर के चार द्वीपों ( इटुरूप (एतोरोफु), कुनाशीर (कुनाशिरी), शिकोटन और हबोमाई द्वीपसमूह ) को लेकर है। जापान इन्हें 'उत्तरी क्षेत्र' (नॉर्दर्न टेरिटरीज) कहता है और इन्हें अपना अभिन्न अंग मानता है, जबकि रूस इन्हें सखालिन क्षेत्र के अधीन अपने प्रशासन में रखता है।
ऐतिहासिक रूप से बात किया जाए तो 1855 की शिमोदा संधि के तहत ये दक्षिणी चार द्वीप जापान के अधीन रहे। 1875 की सेंट पीटर्सबर्ग संधि में जापान ने सखालिन को रूस को सौंपकर पूरे कुरील श्रृंखला पर अधिकार प्राप्त किया। 1905 की पोर्ट्समाउथ संधि के बाद जापान ने दक्षिणी सखालिन भी हासिल कर लिया। द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में, अगस्त 1945 में सोवियत संघ ने जापान के आत्मसमर्पण की घोषणा के बाद इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया। लगभग 17000 जापानी निवासियों को वहां से निकाला गया। सोवियत संघ का तर्क था कि याल्टा समझौते (1945) और पॉट्सडैम घोषणा के तहत ये द्वीप उसे मिलने चाहिए थे। जापान इसे अवैध कब्जा मानता है क्योंकि उसने औपचारिक रूप से इन द्वीपों को कभी नहीं सौंपा और 1941 की सोवियत-जापानी तटस्थता संधि का उल्लंघन बताता है।
इस विवाद के कारण जापान और सोवियत संघ (बाद में रूस) ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कभी औपचारिक शांति संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए। 1956 की सोवियत-जापानी संयुक्त घोषणा में दो छोटे द्वीपों (शिकोटन और हबोमाई) को शांति संधि के बाद जापान को लौटाने का प्रावधान था, लेकिन जापान चारों द्वीपों पर जोर देता रहा। 1990 के दशक से लेकर शिंजो आबे के कार्यकाल तक कई वार्ताएं हुईं, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
पुतिन का दौरा अहम क्यों?
दरअसल, राष्ट्रपति पुतिन का यह दौरा केवल प्रतीकात्मक नहीं है। पिछले एक दशक में रूस ने इन द्वीपों पर अपनी सैन्य उपस्थिति काफी बढ़ा दी है। इटुरूप पर एक महत्वपूर्ण सैन्य हवाई अड्डा स्थित है। आसपास का जलक्षेत्र रूसी नौसेना के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ओखोटस्क सागर और प्रशांत महासागर को जोड़ता है। हाल के वर्षों में रूस-चीन संयुक्त नौसैनिक गश्त भी इन क्षेत्रों से गुजरी है। पुतिन के दौरे से पहले सखालिन में प्रशांत बेड़े के बड़े अभ्यास हुए थे, जिसमें पुतिन ने मिसाइल क्रूजर वार्याग का निरीक्षण भी किया।
रूस का रुख साफ है कि ये द्वीप उसके हैं और युद्ध के परिणाम तथा अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों से इसकी पुष्टि होती है। पुतिन ने दौरे से एक दिन पहले कहा था कि जापान के साथ पहले रचनात्मक संबंध थे (खासकर आबे के समय), लेकिन अब जापान की स्थिति बदल गई है, जो रूस द्वारा उकसाई नहीं गई।
पुतिन के दौरे पर क्या बोला जापान?
जापान के विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोटेगी ने एक्स पर बयान जारी कर कहा कि उत्तरी क्षेत्र, जिसमें एतोरोफु द्वीप शामिल है, ऐतिहासिक रूप से और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जापान का अभिन्न क्षेत्र है। जापान सरकार इस दौरे का कड़ा विरोध करती है। प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने इसे 'अस्वीकार्य' बताया और कहा कि यह जापानी लोगों की भावनाओं को आहत करता है तथा मध्यम और दीर्घकाल में संबंधों को और कठिन बनाता है। उन्होंने रूस से इस मुद्दे की गंभीरता को समझने की अपील की।
बता दें कि जापान पहले भी रूसी अधिकारियों के दौरे का विरोध कर चुका है, जिनमें मेदवेदेव और प्रधानमंत्री मिखाइल मिशुस्तीन शामिल हैं। 2022 में रूस के यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के बाद जापान ने पश्चिमी देशों के साथ मिलकर रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए, जिससे दोनों देशों के संबंध और खराब हो गए।
रणनीतिक और आर्थिक महत्व
ये द्वीप सिर्फ क्षेत्रीय दावे का विषय नहीं हैं। इनके आसपास का समुद्री क्षेत्र मछली, विशेषकर ट्यूना और अन्य समुद्री संसाधनों से भरपूर है। रूस ने यहां विशेष आर्थिक क्षेत्र विकसित करने की योजना भी बनाई है। सैन्य दृष्टि से ये द्वीप रूस की पूर्वी सीमा की सुरक्षा और प्रशांत क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। जापान के लिए ये द्वीप राष्ट्रीय संप्रभुता और युद्ध के बाद के अनसुलझे मुद्दों में एक है।
फिलहाल दशकों से चले आ रहे इस विवाद का कोई निकट भविष्य में समाधान दिखाई नहीं देता। पुतिन का यह दौरा रूस की ओर से अपने दावे को और मजबूती से दोहराने का संकेत है, जबकि जापान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मान रहा है। माना जा रहा है कि पुतिन के इस दौरे से दोनों देशों के संबंध अब और अधिक तनावपूर्ण हो जाएंगे, जिसका असर आने वाले दिनों में दिखेंगे।


