260 साल पुराना रास्ता...कुछ मिनटों में तबाह, नेपाल की बाढ़ ने काट दी हिमालय की लाइफलाइन! जानें अब आगे क्या

लाइव हिन्दुस्तान
Follow us on Google News
share

ये रास्ता 260 साल से भी ज्यादा समय से नेपाल और तिब्बत के बीच व्यापार के लिए इस्तेमाल होता रहा है। आधुनिक सीमा चौकियों और कस्टम व्यवस्था के शुरू होने से बहुत पहले भी हिमालय के इस इलाके की अर्थव्यवस्था पहाड़ी दर्रों के जरिए होने वाले व्यापार पर निर्भर थी

nepal flood news
सदियों पुराना हिमालयी रास्ता, नेपाल-चीन व्यापार की अहम कड़ी बना था।

200 साल से भी ज्यादा समय से नेपाल को तिब्बत से जोड़ने वाला हिमालय का एक संकरा रास्ता सिर्फ एक पहाड़ी सड़क नहीं रहा है। पुराने समय में इसी रास्ते से नमक, ऊन, चावल, व्यापारी, तीर्थयात्री और सेनाएं एक जगह से दूसरी जगह जाती थीं। समय के साथ यह रास्ता नेपाल और चीन के बीच व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गया। 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ ने रासुवागढ़ी-केरुंग मार्ग को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया। बाढ़ की वजह से कई पुल, सड़कें और दूसरी जरूरी सुविधाएं बह गईं। इससे नेपाल और चीन के बीच आने-जाने वाला एक महत्वपूर्ण रास्ता टूट गया।

इस घटना के बाद इस पुराने हिमालयी व्यापार मार्ग की अहमियत एक बार फिर चर्चा में आ गई है। कभी सामान और लोगों की आवाजाही का पारंपरिक रास्ता रहा यह मार्ग आज नेपाल और चीन के बीच व्यापार और संपर्क की एक अहम कड़ी बन चुका है। ऐसे में इसका बंद होना दोनों देशों के बीच व्यापार और आवाजाही के लिए बड़ी परेशानी बन सकता है।

रासुवागढ़ी-केरुंग मार्ग क्यों है अहम?

रासुवागढ़ी नेपाल के रासुवा जिले में स्थित है और तिब्बत की सीमा के बेहद करीब है। चीन की ओर इसी रास्ते पर केरुंग सीमा चौकी है। दोनों देशों के बीच आने-जाने और सामान की आवाजाही के लिए यह मार्ग काफी महत्वपूर्ण है। यह रास्ता भोटे कोशी और त्रिशूली नदी की घाटियों से होकर गुजरता है। यहां पहाड़ बहुत खड़े हैं और घाटियां काफी संकरी हैं। इन्हीं इलाकों में कई गांव, सड़कें, पुल और व्यापार से जुड़ी सुविधाएं बनी हुई हैं।

260 साल पुराना है रास्ता

इस इलाके की भौगोलिक स्थिति इस रास्ते को एक तरफ बेहद महत्वपूर्ण बनाती है, तो दूसरी तरफ इसे प्राकृतिक आपदाओं के प्रति काफी संवेदनशील भी बनाती है। हिमालय को पार करने के लिए यह एक आसान रास्ता माना जाता है, लेकिन तेज बहाव वाली नदियों के किनारे बनी सड़कें और पुल बाढ़ व भूस्खलन जैसी घटनाओं की चपेट में आसानी से आ सकते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, ये रास्ता 260 साल से भी ज्यादा समय से नेपाल और तिब्बत के बीच व्यापार के लिए इस्तेमाल होता रहा है। आधुनिक सीमा चौकियों और कस्टम व्यवस्था के शुरू होने से बहुत पहले भी हिमालय के इस इलाके की अर्थव्यवस्था पहाड़ी दर्रों के जरिए होने वाले व्यापार पर निर्भर थी। पुराने समय में व्यापारी इन्हीं रास्तों से नमक, ऊन, अनाज और दूसरी जरूरी चीजें एक जगह से दूसरी जगह ले जाते थे। आज भी यह मार्ग नेपाल और चीन के बीच व्यापार और संपर्क की एक अहम कड़ी बना हुआ है।

नेपाल-तिब्बत के बीच सदियों से चलता रहा व्यापार

पुराने समय में नेपाल से व्यापारी अनाज और चावल लेकर उत्तर की ओर जाते थे। इसके बदले तिब्बत से नमक और ऊन नेपाल लाया जाता था। यह व्यापार दोनों क्षेत्रों के लिए बेहद जरूरी था। तिब्बत के ऊंचे पठार पर नमक आसानी से मिलता था, लेकिन वहां खेती और अनाज का उत्पादन कम होता था। वहीं, नेपाल के मध्य पहाड़ी इलाकों में अनाज की अच्छी पैदावार होती थी, लेकिन नमक की उपलब्धता कम थी। इसलिए दोनों क्षेत्रों के बीच सामान का आदान-प्रदान जरूरत के हिसाब से होता था। उस समय व्यापार आसान नहीं था। व्यापारी पहाड़ों के कठिन और खतरनाक रास्तों से कारवां के जरिए सामान एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाते थे।

व्यापार के साथ रणनीतिक रूप से भी अहम था यह रास्ता

नेपाल और तिब्बत के बीच यह रास्ता सिर्फ व्यापार के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं था। जिस शक्ति का इन पहाड़ी मार्गों पर नियंत्रण होता था, उसके पास लोगों की आवाजाही, जरूरी सामान की सप्लाई और दूसरे इलाकों तक पहुंच पर भी बढ़त होती थी। पुराने दस्तावेजों के मुताबिक, साल 1744 में गोरखा शासकों ने नुवाकोट पर कब्जा किया था। इसके पीछे इस इलाके की रणनीतिक स्थिति के साथ-साथ तिब्बत जाने वाले व्यापारिक रास्ते पर इसका महत्वपूर्ण स्थान भी एक वजह था।

बाद में नेपाल ने तिब्बत में किए गए अपने सैन्य अभियानों के दौरान भी इसी हिमालयी मार्ग का इस्तेमाल किया। इससे पता चलता है कि यह रास्ता सदियों से व्यापार के साथ-साथ सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण रहा है।

व्यापार के पुराने रास्ते से रणनीतिक सीमा चौकी तक

20वीं सदी में इस रास्ते का स्वरूप काफी बदल गया। सड़कों का निर्माण शुरू हुआ और राजनीतिक हालात भी बदले। इससे खच्चरों और याक के जरिए सामान ले जाने वाले पुराने व्यापार का महत्व धीरे-धीरे कम हो गया। हालांकि, यह रास्ता तब भी नेपाल और तिब्बत के बीच संपर्क का अहम जरिया बना रहा। इस इलाके का रणनीतिक इतिहास आज भी रसुवागढ़ी किले में देखा जा सकता है। यह ऐतिहासिक किला 1850 के दशक में जंग बहादुर राणा के तिब्बत के खिलाफ अभियान के दौरान बनाया गया था। यह किला बताता है कि पुराने समय में यह इलाका सुरक्षा और सैन्य गतिविधियों के लिहाज से कितना महत्वपूर्ण था।

बाद में दोनों देशों के बीच आधुनिक सीमा और सड़क व्यवस्था विकसित हुई। इसके साथ ही रसुवागढ़ी नेपाल और चीन के बीच एक औपचारिक व्यापारिक रास्ते के रूप में विकसित हो गया। 2010 के दशक में रसुवागढ़ी सीमा मार्ग शुरू हुआ। इससे नेपाल और चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के बीच सड़क के जरिए सीधा संपर्क स्थापित हुआ। इस तरह सदियों पुराना व्यापारिक रास्ता खत्म होने के बजाय नए रूप में फिर से महत्वपूर्ण बन गया। पुराने कारवां मार्ग ने आधुनिक समय में नेपाल-चीन व्यापार के एक बड़े रास्ते के तौर पर नई जिंदगी हासिल कर ली।

बाढ़ ने क्या-क्या तबाह किया?

हाल की भीषण बाढ़ ने जिस नदी घाटी को नेपाल और चीन के बीच व्यापार का अहम रास्ता बनाया था, उसी इलाके में भारी तबाही मचा दी। अचानक आई बाढ़ ने रसुवागढ़ी इलाके को बुरी तरह प्रभावित किया। बाढ़ के पानी में सड़कें, पुल, सीमा से जुड़ी सुविधाएं और बिजली का बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हो गया। नेपाल और चीन को जोड़ने वाला अहम मितेरी यानी मैत्री पुल भी इस आपदा की चपेट में आ गया।

बाढ़ से नेपाल और चीन के बीच आने-जाने और सामान की आवाजाही के लिए इस्तेमाल होने वाला एक प्रमुख जमीनी व्यापार मार्ग प्रभावित हुआ है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार और परिवहन पर असर पड़ सकता है। यह आपदा ऐसे इलाके में आई है, जो पहले से ही बाढ़ और भूस्खलन के खतरे वाला माना जाता है। साल 2025 में भी रसुवागढ़ी इलाके में भीषण बाढ़ आई थी। लगातार हो रही ऐसी घटनाओं ने इस हिमालयी व्यापार मार्ग की सुरक्षा और मजबूती को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

इस रास्ते को दोबारा बनाना इतना मुश्किल क्यों है?

रसुवागढ़ी-केरुंग मार्ग को फिर से शुरू करना सिर्फ एक पुल की मरम्मत करने जितना आसान नहीं है। यह पूरा रास्ता बेहद खड़ी और संकरी पहाड़ी घाटियों से होकर गुजरता है। कई जगह सड़क और पुल नदी के बिल्कुल पास बने हैं, जबकि दूसरी ओर अस्थिर पहाड़ी ढलान हैं। ऐसे में किसी भी निर्माण कार्य में काफी सावधानी बरतनी होगी। हाल की आपदा भी बेहद गंभीर थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक, पहाड़ के ऊपरी हिस्से में ग्लेशियर या बर्फ और चट्टानों का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आया। इसके बाद तेज गति से बर्फ, चट्टान और मलबा नीचे की ओर बहा। यह मलबा लहेंडे खोला नदी में पहुंचा और फिर इसका असर भोटे कोशी और त्रिशूली नदी तंत्र पर पड़ा।

इसका मतलब है कि सिर्फ सड़क और पुल को दोबारा बना देना पर्याप्त नहीं होगा। अगर बाढ़, भूस्खलन और पहाड़ों से मलबा आने जैसे असली खतरों को ध्यान में रखकर निर्माण नहीं किया गया, तो भविष्य में वही बुनियादी ढांचा फिर से खतरे में पड़ सकता है। पूरे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के अस्थिर होने, बर्फ तेजी से पिघलने, जमीन के जमाव वाले हिस्सों के कमजोर होने और मौसम के तेजी से बदलने को लेकर चिंता बढ़ रही है। हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि इस खास घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ने के लिए अभी और अध्ययन की जरूरत है।

Rajat Kumar

लेखक के बारे में

Rajat Kumar

रजत कुमार, बीते आठ सालों से पत्रकारिता कर रहा हूं। मैंने, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन की है और भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया है। अपने आठ साल के पत्रकारिता करियर में मैंने, प्रभात खबर, इंडिया टुडे और मनीकंट्रोल के डिजिटल प्लेटफॉर्म के साथ काम किया है। फिलहाल, लाइव हिंदुस्तान के साथ अपने पत्रकारिता के सफर को आगे बढ़ा रहा हूं।

आम लोगों की कहानियां लिखना और उन्हें सुनाना बेहद पंसद है। बीते आठ सालों से ऐसी कई कहानियों को लोगों तक पहुंचाने की कोशिश जारी है। पत्रकारिता के इस सफर में दो लोकसभा चुनाव और पांच से अधिक विधानसभा चुनाव को कवर करने का भी मौका मिला है। चुनावी रिपोर्टिंग के साथ-साथ जनसरोकार से जुड़े मुद्दों की पत्रकाारिता भी जारी है। राजनीति, क्रिकेट, सिनेमा और इतिहास पसंदीदा विषय रहे हैं। इस विषयों पर लिखना- पढ़ना जारी है।

और पढ़ें

लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।

Hindi Newsविदेश न्यूज़260 साल पुराना रास्ता पलभर में तबाह, बाढ़ ने काट दी नेपाल की लाइफलाइन!