प्लीज! मदद कीजिए, उन पर हमले कीजिए: ट्रंप के सामने दो-दो बार गिड़गिड़ाए सऊदी प्रिंस; लेकिन हो गया खेला

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी प्रिंस के दो बार गुजारिश करने के बाद भी ट्रंप ने इससे सीधे इनकार कर दिया। अमेरिकी अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि प्रशासन की अभी हूतियों के खिलाफ सीधे तौर पर दखल देने की कोई योजना नहीं है।

Donald Trump approves US Saudi Arabia Nuclear deal
सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप।

मिडिल-ईस्ट में तनाव चरम पर पहुंच गया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के किनारे पर स्थित रणनीतिक और व्यापारिक शहर मोचा पर कब्जा कर लिया है और अब हूती बाब अल मंडेब स्ट्रेट पर कब्जा करने की फिराक में हैं। अगर ऐसा हुआ तो सऊदी अरब रणनीतिक रूप से हूतियों के चक्रव्यूह में फंस जाएगा। इतना ही नहीं हूतियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन से हमले भी किए हैं। पलटवार करते हुए सऊदी अरब ने भी उनके कई ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया है लेकिन इसी बीच सऊदी अरब ने अमेरिका से मदद की गुहार लगाई लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने झटका दे दिया।

दो अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से Axios की रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने गुरुवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दो बार फोन किया और उनसे हूतियों के खिलाफ हमले करने का अनुरोध किया, लेकिन ट्रंप ने इससे इनकार कर दिया। सऊदी अरब का यह अनुरोध इसलिए था क्योंकि ईरान समर्थित यह गुट लाल सागर के एक अति महत्वपूर्ण चोकपॉइंट के करीब पहुंच गया था।

यह क्यों अहम है?

रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी प्रिंस के दो बार गुजारिश करने के बाद भी ट्रंप ने इससे सीधे इनकार कर दिया। अमेरिकी अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि प्रशासन की अभी हूतियों के खिलाफ सीधे तौर पर दखल देने की कोई योजना नहीं है। बता दें कि यह घटनाक्रम तब हुआ है जब हूती विद्रोहियों ने यमन के एक अहम तटीय शहर मोचा पर कब्ज़ा कर लिया और बाब अल-मंडेब समुद्री मार्ग के और करीब पहुंच गए। यह समुद्री मार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला अहम जल मार्ग है और वैश्विक व्यापार और सऊदी अरब के तेल निर्यात के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

तेल की कीमतों में बड़ी उछाल

जिस दिन सऊदी प्रिंस ने अमेरिकी राष्ट्रपति से फोन पर हूतियों के खिलाफ सैन्य हमले करने का अनुरोध किया, उसी दिन यानी गुरुवार को तेल की कीमतों में तेजी से उछाल आया है और यह करीब 116 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई है, क्योंकि इस बात की चिंता सता रही है कि लाल सागर में लड़ाई से रणनीतिक रूप से अहम समुद्री रास्ते पर खतरा पैदा हो सकता है। यह स्थिति और भी अहम हो गई है क्योंकि ईरान पहले से ही होर्मुज समुद्री मार्ग से होने वाली शिपिंग में बाधा डाल रहा है। दरअसल, बाब अल-मंडेब पर हूतियों का कब्ज़ा या बढ़ती सैन्य गतिविधि तेहरान और उसके सहयोगियों को अमेरिका और उसके खाड़ी देशों के सहयोगियों पर दबाव बनाने का एक और संभावित माध्यम बन सकता है। ईरान और उसके दोस्त इसी रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं।

अमेरिका की दोहरी चाल या मजबूरी?

एक तरफ अमेरिका सऊदी प्रिंस के अनुरोध को टुकरा रहा है, वहीं दूसरी तरफ वही अमेरिका सऊदी अरब को अपना समर्थन भी बढ़ा रहा है। दरअसल, अमेरिका यमन में सीधे तौर पर सैन्य दखल से बचना चाहता है। यही वजह है कि उसने सऊदी प्रिंस MBS के अनुरोध को सीधे तौर पर ठुकरा दिया। अमेरिका को पता है कि यमन में उसके सैन्य दखल से यह जंग और गहरा सकती है और मिडिल-ईस्ट में तेजी से युद्ध पसर सकता है, जिसकी चपेट में खाड़ी के कई देश आ सकते हैं। खबरों के मुताबिक, इसी रणनीतिक संदेश को पहुंचाने और जरूरी तालमेल बिठाने के लिए अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर गुरुवार को ही सऊदी अरब जा पहुंचे।

सऊदी और हूती में कैसे बढ़ा टकराव?

बता दें कि सऊदी और हूती गुटों के बीच टकराव जुलाई में तब और बढ़ गया, जब रियाद ने ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार से लौट रहे वरिष्ठ हूती अधिकारियों को ले जा रहे एक ईरानी विमान को सना में उतरने से रोक दिया था। इसके बाद MBS ने सना हवाई अड्डे पर सऊदी हमले के लिए ट्रंप का राजनीतिक समर्थन मांगा था, साथ ही तब यह भी साफ किया कि रियाद को अमेरिकी सैन्य मदद की जरूरत नहीं है लेकिन गुरुवार को सीधे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग, रियाद के उस पुराने रुख में बदलाव दिखाती है जिसमें कहा गया था कि वह अमेरिकी सैन्य दखल के बिना हूती खतरे से निपट सकता है।

सऊदी का बदल गया स्टैंड

सऊदी के रुख में यह बदलाव तब आया, जब हूतियों ने लाल सागर में सऊदी टैंकरों पर हमला करके और देश के तेल-निर्यात मार्गों को धमकाकर जवाबी कार्रवाई की और फिर सऊदी ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर भी हमले शुरू कर दिए। हालांकि, सऊदी अरब और उसके यमनी सहयोगियों ने हूती ठिकानों के खिलाफ हवाई हमलों और जमीनी अभियानों से भी जवाब दिया है लेकिन हूतियों के हौसले पस्त नहीं हुए हैं।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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