क्यों पाकिस्तान में होने लगी अब 16 राज्यों की मांग? एक नहीं 4 हो जाएंगे पंजाब
अलीम खान के अनुसार, पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा (KP) में से प्रत्येक को तीन या चार प्रशासनिक इकाइयों में बांटा जाएगा। इस तरह पाकिस्तान में कुल 12 से 16 प्रांत हो सकते हैं।
पाकिस्तान में एक बार फिर राज्यों की संख्या बढ़ाने की मांग तेज हो चुकी है। बांग्लादेश के जन्म के साथ ही पूर्वी पाकिस्तान को खोने के बाद अब वहां की वर्तमान सरकार प्रशासनिक सुधारों के नाम पर देश को नए छोटे प्रांतों में बांटने की तैयारी कर रही है। सरकार का तर्क है कि इससे शासन व्यवस्था बेहतर होगी, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान के लिए फायदे से ज्यादा नुकसान पैदा कर सकता है।
पाकिस्तान के संघीय संचार मंत्री और इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान पार्टी (IPP) के अध्यक्ष अब्दुल अलीम खान ने हाल ही में पाकिस्तान में छोटे प्रांत बनाने की पैरवी और वादा देश की जनता से किया है।
प्लान क्या है?
अलीम खान के अनुसार, पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा (KP) में से प्रत्येक को तीन या चार प्रशासनिक इकाइयों में बांटा जाएगा। इस तरह पाकिस्तान में कुल 12 से 16 प्रांत हो सकते हैं। सरकार का कहना है कि वर्तमान प्रांत आबादी के लिहाज से बहुत बड़े हैं, जिससे दूर-दराज के इलाकों में विकास नहीं पहुंच पाता। छोटे प्रांतों से जनता को उनके दरवाजे पर ही सरकारी सेवाएं मिल सकेंगी।
कौन समर्थन में, कौन कर रहा विरोध?
इस प्रस्ताव ने पाकिस्तान की गठबंधन सरकार के भीतर भी दरार पैदा कर दी है। पीएम शहबाज शरीफ की सरकार में शामिल IPP और सिंध स्थित MQM-P इस योजना के प्रबल समर्थक हैं। MQM-P ने तो 28वें संविधान संशोधन के जरिए नए प्रांतों के लिए दबाव बनाने की बात कही है। वहीं, बिलावल भुट्टो जरदारी के नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) इस विभाजन के खिलाफ है। सिंध के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने चेतावनी दी है कि वे सिंध के किसी भी तरह के बंटवारे को स्वीकार नहीं करेंगे। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के राष्ट्रवादी संगठनों का मानना है कि यह उनकी सांस्कृतिक पहचान को खत्म करने की साजिश है।
समाधान नहीं, नई मुसीबत
राजनीतिक और प्रशासनिक विशेषज्ञों ने इस कदम को गंभीर खतरा बताया है। पूर्व पुलिस प्रमखु सैयद अख्तर अली शाह का तर्क है कि पाकिस्तान की समस्या प्रांतों की संख्या नहीं, बल्कि कमजोर संस्थाएं और जवाबदेही की कमी है। बिना बुनियादी सुधारों के नए प्रांत बनाने से अराजकता बढ़ेगी। वहीं, पीआईएलडीएटी प्रमुख अहमद बिलाल महबूब ने चेतावनी दी है कि नए प्रांत बनाना बेहद खर्चीला और जटिल काम है। अतीत में भी ऐसे प्रयोगों ने जनता की शिकायतों को कम करने के बजाय और गहरा कर दिया है।
1947 में आजादी के वक्त पाकिस्तान में 5 प्रांत थे। पूर्वी बंगाल, पश्चिम पंजाब, सिंध, NWFP और बलूचिस्तान। 1971 के युद्ध के बाद पूर्वी बंगाल अलग होकर बांग्लादेश बन गया। विशेषज्ञों का डर है कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में पहले से ही जारी अलगाववादी आंदोलनों के बीच प्रांतों का बंटवारा आग में घी डालने जैसा काम कर सकता है।

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