पाकिस्तान में आंटे का संकट! 92% सरकारी खरीद फेल; अब रोटी के लिए मचेगा हाहाकार?
पाकिस्तान के सिंध में गेहूं खरीद नीति पूरी तरह फेल होने से आटे की कीमतें ₹140/किग्रा पार पहुंच गई हैं। जमाखोरों के आगे बेबस सीएम मुराद अली शाह ने बुलाई आपात बैठक। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में कृषि और प्रशासनिक व्यवस्था के चरमराने के बीच गेहूं का भारी संकट पैदा हो गया है। मुख्यमंत्री सैयद मुराद अली शाह ने खुले बाजार में गेहूं की बढ़ती कीमतों पर गंभीर चिंता जताई है। यह पूरी स्थिति सरकार की उस नाकामी को उजागर करती है, जहां वह बाजार में जमाखोरों और मुनाफाखोरों पर लगाम कसने में पूरी तरह विफल रही है।
सरकारी खरीद में भारी नाकामी
4 जून तक खाद्य विभाग ने 10 लाख मीट्रिक टन के लक्ष्य के मुकाबले केवल 79,835.66 मीट्रिक टन गेहूं की ही खरीद की है, जो लक्ष्य का 8% से भी कम है। सरकार द्वारा तय किया गया समर्थन मूल्य (PKR 3,500 प्रति 40 किलो) बाजार भाव से काफी कम था। इसके कारण किसानों ने अपना गेहूं सरकारी एजेंसियों को बेचने के बजाय निजी खरीदारों को ऊंचे दामों पर बेचना बेहतर समझा।
आम जनता पर महंगाई की मार
सरकारी खरीद न होने और निजी खरीदारों के दबदबे के कारण पूरे देश में खुले बाजार में गेहूं के दाम 25% तक बढ़ गए हैं। कराची में गेहूं की कीमत PKR 11,100 प्रति 100 किलोग्राम तक पहुंच गई है। हैदराबाद में यह कीमत PKR 10,900 तक है।
इन सबके परिणामस्वरूप, आटे की खुदरा कीमत PKR 135 से PKR 140 प्रति किलो के बीच पहुंच गई है। यह सरकार द्वारा तय की गई सब्सिडी वाली कीमत (PKR 107 प्रति किलो) से कहीं अधिक है, जिसका सीधा और सबसे बुरा असर कम आय वाले परिवारों पर पड़ रहा है।
मुख्यमंत्री की आपातकालीन बैठक और निर्देश
इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए मुख्यमंत्री शाह ने सीएम हाउस में एक उच्च स्तरीय आपातकालीन बैठक बुलाई। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि जमाखोरों और सट्टेबाजों को प्रांत की खाद्य सुरक्षा से खेलने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने खाद्य विभाग और संबंधित एजेंसियों को बाजार को नियंत्रित करने और कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई कीमतों पर रोक लगाने का निर्देश दिया। साथ ही, इन विभागों से नियमित प्रगति रिपोर्ट भी मांगी गई है। उन्होंने कहा, "गेहूं केवल एक वस्तु नहीं है- यह हमारे लोगों का मुख्य भोजन और सामाजिक स्थिरता का आधार है। हम नागरिकों के अधिकारों के साथ किसी को खेलने की इजाजत नहीं देंगे।"
जमीनी हकीकत और आगे का संकट
डॉन अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री के इन कड़े निर्देशों और दावों के बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं है। सरकारी योजना पूरी तरह से विफल रही है और प्रशासन के पास सप्लाई चैन को बनाए रखने की क्षमता नहीं दिख रही है। जमाखोरी लगातार जारी है, जिससे सिंध प्रांत इस समय एक बड़े और 'खुद के द्वारा पैदा किए गए' खाद्य सुरक्षा संकट के मुहाने पर खड़ा है।
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