
फिर शुरू होने जा रहे परमाणु परीक्षण, आखिर क्यों लगी थी रोक? ये देश हैं हथियारों के बादशाह
आज 2025 में दुनिया भर में कुल लगभग 12,241 परमाणु हथियार मौजूद हैं, जो नौ देशों के पास हैं। रूस के पास सबसे अधिक 5,459 हथियार हैं, जिसमें आईसीबीएम-आधारित शक्तिशाली स्टॉकपाइल शामिल है।
परमाणु हथियार मानव इतिहास की सबसे विनाशकारी खोज हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा जापान पर गिराए गए बमों ने लाखों जानें लीं और दुनिया को परमाणु युग में धकेल दिया। लेकिन आजकल परमाणु परीक्षण की खबरें दुर्लभ हो गई हैं। आखिरी बार कब हुआ था? क्यों बंद हो गए? परीक्षण क्यों जरूरी होते हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, आज दुनिया में किसके पास ये घातक हथियार हैं? आज हम इन सवालों की गहराई से पड़ताल करेंगे।

परमाणु परीक्षण का इतिहास: शुरुआत से शिखर तक
परमाणु परीक्षण की शुरुआत 16 जुलाई 1945 को हुई, जब अमेरिका ने न्यू मैक्सिको के रेगिस्तान में 'ट्रिनिटी' नामक पहला परीक्षण किया। यह मैनहट्टन प्रोजेक्ट का हिस्सा था, जिसके तहत हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए गए। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ ने सैकड़ों परीक्षण किए। 1945 से 1996 तक कुल 2,000 से अधिक परीक्षण हुए, जिनमें से अधिकांश वायुमंडलीय (ओपन एयर) थे।
अब तक कितने परीक्षण हुए?
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 1945 से लेकर 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) तक दुनिया में कुल 2,000 से अधिक परमाणु परीक्षण किए गए। इनमें से-
- 1,032 अमेरिका ने,
- 715 सोवियत संघ ने,
- 210 फ्रांस ने,
- 45-45 ब्रिटेन और चीन ने किए।
CTBT के बाद सिर्फ 10 परीक्षण हुए हैं-
भारत ने दो (1998), पाकिस्तान ने दो (1998) और उत्तर कोरिया ने छह (2006, 2009, 2013, 2016 में दो बार और 2017 में एक बार) किए।
अमेरिका ने आखिरी बार 1992 में, चीन और फ्रांस ने 1996 में, जबकि सोवियत संघ ने 1990 में परीक्षण किया था। रूस ने सोवियत परमाणु भंडार विरासत में पाया। उसने अब तक कोई नया परीक्षण नहीं किया है।
परीक्षण बंद क्यों हुए?
1950 से 1980 के दशक तक किए गए भूमिगत, जलमग्न और वायुमंडलीय परमाणु परीक्षणों से पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ा। प्रशांत द्वीपों में अमेरिकी परीक्षणों और कजाखस्तान व आर्कटिक क्षेत्रों में सोवियत परीक्षणों से लाखों लोगों की भूमि प्रदूषित हुई और स्वास्थ्य समस्याएं दशकों तक बनी रहीं। रेडियोधर्मी तत्वों से कैंसर, जेनेटिक म्यूटेशन और पारिस्थितिकी असंतुलन हुआ। नवादा टेस्ट साइट (अमेरिका) और सेमिपालाटिंस्क (कजाकिस्तान) जैसे स्थानों पर आज भी रेडियेशन के प्रभाव दिखते हैं। 1963 में अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ ने आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि (PTBT) पर हस्ताक्षर किए, जिसने वायुमंडलीय, अंतरिक्ष और पानी के अंदर परीक्षणों पर रोक लगा दी। इसके बाद परीक्षण भूमिगत हो गए।
1986 के चेरनोबिल हादसे ने परमाणु खतरों को उजागर किया, हालांकि यह परीक्षण नहीं था। लेकिन इससे प्रेरित होकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका और रूस के बीच तनाव कम हुआ। दोनों ने एकतरफा मोरेटोरियम घोषित किया। अमेरिका का आखिरी परीक्षण 1992 में, रूस का 1990 में हुआ।
आखिरकार 1996 में संयुक्त राष्ट्र में अपनाई गई व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि सभी प्रकार के परमाणु विस्फोटों पर रोक लगाती है। अब तक 186 देशों ने हस्ताक्षर किए, 174 ने अप्रूव किया। लेकिन यह लागू नहीं हुई क्योंकि अमेरिका, चीन, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया जैसे प्रमुख देशों ने अप्रूव नहीं किया। फिर भी, CTBT के बाद से कोई आधिकारिक वायुमंडलीय या बड़ा परीक्षण नहीं हुआ। रूस ने इसे 1996 में हस्ताक्षरित कर 2000 में अप्रूव किया, जबकि अमेरिका ने हस्ताक्षर तो किए लेकिन कभी अप्रूव नहीं किया। 2023 में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस की CTBT से औपचारिक वापसी की घोषणा की, जिससे रूस की स्थिति अब अमेरिका जैसी हो गई है।
परमाणु परीक्षण क्यों किए जाते हैं?
नए हथियारों की शक्ति, सटीकता और सुरक्षा जांचना। उदाहरण: थर्मोन्यूक्लियर (हाइड्रोजन) बम बनाने के लिए फिशन-फ्यूजन प्रक्रिया टेस्ट करनी पड़ती है। पुराने हथियारों में प्लूटोनियम क्षय होता है, इसलिए स्टॉकपाइल की जांच जरूरी। बिना परीक्षण के, हथियार अनुपयोगी हो सकते हैं। शक्ति प्रदर्शन भी एक वजह है।
फिर से परीक्षण क्यों?
परमाणु परीक्षण दो कारणों से किए जाते हैं-
- तकनीकी जानकारी जुटाने के लिए, और
- राजनीतिक संकेत भेजने के लिए।
टेस्ट से यह पता चलता है कि नए परमाणु हथियार कितने प्रभावी हैं और पुराने हथियार अभी भी काम कर रहे हैं या नहीं। 2020 में, वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि ट्रंप प्रशासन ने उस समय भी परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करने पर विचार किया था। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका फिर से परीक्षण करता है, तो यह रूस और चीन को एक “रणनीतिक शक्ति प्रदर्शन” का संदेश होगा। रूसी राष्ट्रपति पुतिन पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर अमेरिका परीक्षण शुरू करता है, तो रूस भी ऐसा करेगा। उनके अनुसार, “दुनिया पहले से ही एक नए परमाणु शस्त्र दौड़ में प्रवेश कर चुकी है।”
विश्व में परमाणु हथियारों की स्थिति
आज 2025 में दुनिया भर में कुल लगभग 12,241 परमाणु हथियार मौजूद हैं, जो नौ देशों के पास हैं। रूस के पास सबसे अधिक 5,459 हथियार हैं, जिसमें आईसीबीएम-आधारित शक्तिशाली स्टॉकपाइल शामिल है। अमेरिका के पास 5,177 हथियार हैं, जो जमीन, समुद्र और हवा आधारित ट्रायड सिस्टम पर निर्भर हैं। चीन तेजी से विस्तार कर रहा है और उसके पास 600 से अधिक हथियार हैं, मुख्य रूप से डीएफ-41 मिसाइलें। फ्रांस के पास 290 हथियार हैं, जो सबमरीन-आधारित हैं, जबकि ब्रिटेन के पास 225 हथियार हैं और वह अमेरिकी तकनीक पर निर्भर है।
भारत के पास 180 हथियार हैं, जिसमें अग्नि मिसाइलें शामिल हैं और वह नो फर्स्ट यूज नीति अपनाता है। पाकिस्तान के पास 170 हथियार हैं, मुख्य रूप से नासर मिसाइल प्रणाली। इजरायल के पास अनौपचारिक रूप से 90 हथियार माने जाते हैं, हालांकि वह इसकी पुष्टि नहीं करता। उत्तर कोरिया के पास लगभग 50 हथियार हैं और वह ह्वासोंग मिसाइलों के साथ सक्रिय परीक्षण करता रहता है। रूस और अमेरिका मिलकर विश्व के 90 प्रतिशत परमाणु हथियार रखते हैं। 1986 में दुनिया में परमाणु हथियारों की कुल संख्या 70,000 से अधिक थी, जो अब घटकर करीब 12,000 रह गई है- जिनमें से ज्यादातर रूस और अमेरिका के पास हैं। वर्तमान में रूस, अमेरिका और चीन तीनों अपने परमाणु हथियार भंडारों का आधुनिकीकरण कर रहे हैं।

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