लटक सकता है नीरव मोदी का भारत प्रत्यर्पण, भगोड़े ने चला यूरोपियन कोर्ट वाला पैंतरा; क्या है रूल 39?

Amit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, लंदन
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नीरव मोदी ने भारत प्रत्यर्पण से बचने के लिए यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय में अपील की है। ब्रिटेन में सभी विकल्प खत्म होने के बाद जानिए क्या है उसका यह नया दांव और क्या वह भारत आने से बच पाएगा। पूरी खबर विस्तार से पढ़ें।

लटक सकता है नीरव मोदी का भारत प्रत्यर्पण, भगोड़े ने चला यूरोपियन कोर्ट वाला पैंतरा; क्या है रूल 39?

पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के साथ 1 अरब डॉलर (लगभग 8000 करोड़ रुपये) से अधिक की धोखाधड़ी के आरोपी और भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने खुद को भारत भेजे जाने से रोकने के लिए अपना आखिरी दांव चला है। 55 वर्षीय नीरव मोदी ने अब फ्रांस के स्ट्रासबर्ग स्थित यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय (ECtHR) में अपने प्रत्यर्पण पर रोक लगाने के लिए 'रूल 39' के तहत एक इंजंक्शन (रोक) अर्जी दायर की है।

ब्रिटेन में खत्म हो चुके हैं सभी विकल्प

लंदन उच्च न्यायालय ने 25 मार्च को नीरव मोदी की उस अर्जी को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने अपने प्रत्यर्पण के खिलाफ अपील को फिर से खोलने की मांग की थी। इस झटके के बाद ब्रिटेन में उसके पास बचने का कोई कानूनी रास्ता नहीं बचा था, जिसके चलते स्ट्रासबर्ग स्थित मानवाधिकार न्यायालय ही उसका एकमात्र विकल्प रह गया।

नियमों के मुताबिक, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) 15 मार्च से 28 दिनों के भीतर उसे ब्रिटेन से भारत ला सकती थी। लेकिन अब जब तक ECtHR में उसके 'रूल 39' आवेदन पर विचार चल रहा है, तब तक उसे भारत वापस नहीं लाया जा सकता।

क्राउन प्रॉसिक्यूशन सर्विस (CPS) के एक प्रवक्ता ने इस मामले में बताया कि नीरव मोदी को प्रत्यर्पित किया जाना तय था, लेकिन उसने अपने प्रत्यर्पण पर रोक के लिए ECtHR में 'रूल 39' के तहत आवेदन किया है। हम इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हैं।

क्या है 'रूल 39' और कैसे होती है सुनवाई?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 5 सेंट एंड्रयूज हिल के प्रत्यर्पण मामलों के बैरिस्टर (वकील) बेन कीथ ने इस प्रक्रिया को विस्तार से समझाया।

कोई प्रत्यक्ष सुनवाई नहीं: इस पूरी प्रक्रिया में कोर्ट रूम जैसी कोई सुनवाई नहीं होती है। सब कुछ लिखित रूप में किया जाता है।

48 घंटे में फैसला: अर्जी ECtHR के एक जज के पास जाती है, जो आमतौर पर 48 घंटों के भीतर अपना फैसला सुनाते हैं।

समय सीमा बढ़ सकती है: अगर जज ब्रिटेन सरकार से मामले में और अधिक जानकारी मांगते हैं, तो फैसले में ज्यादा समय लग सकता है। इसकी कोई निर्धारित समय-सीमा नहीं है।

प्रत्यर्पण पर अस्थायी रोक: जब तक ECtHR का जज 'रूल 39' की अर्जी पर विचार कर रहा है, तब तक ब्रिटेन सरकार नीरव मोदी को भारत नहीं भेजेगी।

वकील बेन कीथ के मुताबिक, याचिकाकर्ता को जज को लिखित में यह विश्वास दिलाना होता है कि उसे अपरिवर्तनीय नुकसान का तत्काल जोखिम है और उसने अपने देश के सभी घरेलू कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल कर लिया है।

अर्जी मंजूर होने की कितनी है संभावना?

विशेषज्ञों का मानना है कि 'रूल 39' के तहत राहत मिलना बहुत मुश्किल होता है। आंकड़े भी यही गवाही देते हैं।

  • वर्ष 2025 में ECtHR को ऐसे कुल 2,701 अनुरोध प्राप्त हुए थे।
  • इनमें से केवल 222 आवेदनों को ही मंजूरी मिली थी।
  • ज्यादातर अनुरोध न्यायालय द्वारा खारिज कर दिए जाते हैं।

अगर नीरव मोदी की अर्जी मंजूर हुई तो क्या होगा?

यह ध्यान रखना जरूरी है कि 'रूल 39' के तहत दिए गए आदेश मामले का अंतिम फैसला नहीं होते हैं। ये सिर्फ मामला चलने के दौरान किसी अपरिवर्तनीय नुकसान को रोकने का एक अस्थायी उपाय हैं।

बैरिस्टर कीथ के अनुसार, यदि नीरव मोदी को 'रूल 39' के तहत इंजंक्शन (रोक) मिल जाता है, तो:

  • उसका प्रत्यर्पण तुरंत रुक जाएगा।
  • इसके बाद यह मामला मुख्य सुनवाई में चला जाएगा।
  • मुख्य सुनवाई में दोनों पक्ष अपनी पूरी दलीलें पेश करेंगे।
  • जजों का एक पैनल यह तय करेगा कि मामले में मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नहीं।

लंबी खिंच सकती है कानूनी लड़ाई: इस पूरी प्रक्रिया को निष्कर्ष तक पहुंचने में 3 से 5 साल तक का लंबा समय लग सकता है और इसमें भी शायद ही कभी व्यक्तिगत सुनवाई होती है। कुल मिलाकर, नीरव मोदी ने भारत की जेल से बचने के लिए एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया का सहारा लिया है जो भले ही आसानी से सफल न होती हो, लेकिन उसके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को कुछ समय के लिए जरूर टाल सकती है।

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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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