नेपाल में तबाही से 5 महीने पहले आई थी रिपोर्ट, चेतावनी को क्यों किया गया नजरअंदाज
मौजूदा आपदा ने इन चेतावनियों की गंभीरता को सामने ला दिया है। ग्लेशियल झीलों के पीछे जमा पानी अगर प्राकृतिक बांध के टूटने से अचानक बाहर निकलता है तो कुछ ही मिनटों में नदी का जलस्तर कई मीटर तक बढ़ सकता है।

नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। लेकिन इस आपदा से करीब 5 महीने पहले ही वैज्ञानिकों ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों के खतरे को लेकर गंभीर चेतावनी जारी कर दी थी। मार्च 2026 में इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों की स्थिति पर रिपोर्ट जारी किया था। रिपोर्ट में बताया गया कि 2000 के बाद ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। वैज्ञानिकों ने चेताया कि तेजी से पिघलती बर्फ, अस्थिर पहाड़ी ढलान और बढ़ती ग्लेशियल झीलें आने वाले समय में अचानक और बेहद विनाशकारी बाढ़ का खतरा बढ़ा सकती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा आपदा ने इन चेतावनियों की गंभीरता को सामने ला दिया है। ग्लेशियल झीलों के पीछे जमा पानी अगर प्राकृतिक बांध के टूटने से अचानक बाहर निकलता है तो कुछ ही मिनटों में नदी का जलस्तर कई मीटर तक बढ़ सकता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है। हालांकि 26 अगस्त की घटना को लेकर वैज्ञानिकों का शुरुआती आकलन यह है कि इसका मुख्य कारण किसी पहले से मौजूद ग्लेशियल झील का फटना नहीं, बल्कि ऊंचाई पर ग्लेशियर के बड़े हिस्से का टूटकर नीचे गिरना, नदी का रास्ता रोकना और फिर अचानक पानी का तेज बहाव पैदा करना था। यानी खतरा केवल ग्लेशियल झीलों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्लेशियरों की अस्थिर ढलानें भी अचानक बड़ी आपदा पैदा कर सकती हैं।
बर्फ के नुकसान की गति तेजी से बढ़ी
मार्च में जारी ICIMO की रिपोर्ट के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 2000 के बाद बर्फ के नुकसान की गति तेजी से बढ़ी है। इस क्षेत्र के बड़े हिस्से में ग्लेशियर 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई के बीच स्थित हैं और इसी ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान बढ़ने का प्रभाव चिंता पैदा कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, बर्फ पिघल रही है और कई स्थानों पर पहाड़ी ढलानों की स्थिरता भी प्रभावित हो रही है। जुलाई 2025 में भी इसी नदी तंत्र में ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ आ चुकी थी। इसके बाद नेपाल और चीन के बीच वास्तविक समय में बाढ़ और ग्लेशियर संबंधी जानकारी साझा करने की व्यवस्था बनाने पर सहमति बनी थी, लेकिन यह व्यवस्था अभी तक औपचारिक रूप से लागू नहीं हो सकी।
अब 26 अगस्त की त्रासदी ने सवाल खड़ा कर दिया है कि 5 महीने पहले मिली वैज्ञानिक चेतावनियों के बावजूद आपदा से निपटने की तैयारी कितनी प्रभावी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में केवल ग्लेशियल झीलों की निगरानी पर्याप्त नहीं होगी। ग्लेशियरों की गति, बर्फीली ढलानों की स्थिरता, भूस्खलन और नदियों के जलस्तर की लगातार निगरानी के साथ आधुनिक सैटेलाइट और भूकंपीय प्रणालियों का इस्तेमाल जरूरी है। साथ ही नेपाल और चीन के बीच वास्तविक समय में मौसम, नदी और ग्लेशियर संबंधी आंकड़ों का आदान-प्रदान मजबूत करना होगा।


