UAE ने रातों-रात हजारों पाकिस्तानियों का बोरिया-बिस्तर बांधा; ना कारण बताया, ना मोहलत दी
अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करना पाकिस्तान को भारी पड़ गया है। UAE ने कड़ी नाराजगी जताते हुए बिना कारण बताए हजारों पाकिस्तानी शिया कामगारों को देश से डिपोर्ट कर दिया है। पढ़ें पूरी खबर।

अमेरिका और ईरान में जारी जंग के बीच खुद को मध्यस्थ यानी बिचौलिए के तौर पर पेश करने की पाकिस्तान की कोशिश उसी पर भारी पड़ गई है। पाकिस्तान के इस कदम से मुस्लिम देश संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ उसके कूटनीतिक संबंध बिगड़ गए हैं। यूएई से बड़े पैमाने पर पाकिस्तानी कामगारों को डिपोर्ट (निर्वासित) किया जा रहा है।
यूएई क्यों है पाकिस्तान से खफा?
खाड़ी में कई हफ्तों तक चले संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने में पाकिस्तान ने अहम भूमिका निभाई है। अब न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यूएई इस बात से बेहद नाराज है कि पाकिस्तान ने अमीराती क्षेत्र को निशाना बनाकर किए गए ईरानी हमलों की कड़ी निंदा नहीं की। इसी नाराजगी के चलते यूएई की तरफ से पाकिस्तानियों पर यह सख्त कार्रवाई की जा रही है।
बिना कारण बताए हजारों पाकिस्तानियों को किया डिपोर्ट
न्यूयॉर्क टाइम्स ने कई पाकिस्तानी कामगारों और समुदाय के नेताओं से बातचीत के आधार पर बताया है कि हाल के हफ्तों में हजारों पाकिस्तानी शिया मुसलमानों को यूएई से निकाल दिया गया है। कई लोगों का दावा है कि उन्हें डिपोर्ट करने से पहले बिना कोई कारण बताए हिरासत में रखा गया था।
पाकिस्तानी शिया नेताओं का कहना है कि उनके समुदाय के लोगों को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि उनके ईरान के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। सामुदायिक संगठनों का अनुमान है कि मध्य-अप्रैल से लेकर अब तक हजारों परिवार इस निर्वासन से प्रभावित हो चुके हैं।
हालांकि, यूएई ने अभी तक इन आरोपों पर सार्वजनिक रूप से कोई बयान नहीं दिया है। वहीं, दूसरी तरफ पाकिस्तान ने भी ऐसे किसी सामूहिक निर्वासन अभियान के दावों को खारिज किया है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका
इस मुद्दे ने पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि यूएई से आने वाला पैसा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी जीवन रेखा है। वर्तमान में 20 लाख से अधिक पाकिस्तानी यूएई में रहते और काम करते हैं। अकेले पिछले साल ही इन पाकिस्तानी कामगारों ने 8 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम अपने देश भेजी थी।
पाकिस्तान की कूटनीति और डगमगाती अर्थव्यवस्था इस समय खाड़ी देशों के बदलते रुख के बीच फंसी हुई है। एक तरफ जहां पाकिस्तान ने सऊदी अरब से अपनी नजदीकियां बढ़ाई हैं, वहीं दूसरी तरफ यूएई (UAE) का रवैया उसके प्रति बेहद सख्त हो गया है। दशकों से पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को कर्ज का 'रोल-ओवर' करके सहारा देने वाले यूएई ने अपना 3.5 अरब डॉलर का कर्ज तुरंत वापस ले लिया है। अप्रैल 2026 में पाकिस्तान को मजबूरन यह भारी-भरकम कर्ज यूएई को चुकाना पड़ा, जिसके लिए उसे सऊदी अरब से मिली नई आर्थिक मदद (डिपॉजिट) का सहारा लेना पड़ा। यूएई का यह कदम साफ दर्शाता है कि पाकिस्तान का सऊदी की तरफ अधिक झुकाव और ईरान विवाद में उसकी मध्यस्थता वाली भूमिका के चलते अबू धाबी का रुख अब 'मुफ्त मदद' से बदलकर 'सख्त वसूली' वाला हो गया है।
अमेरिका 'प्रोजेक्ट फ्रीडम प्लस' की तैयारी में
यह निर्वासन का मामला ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़े संकेत दिए हैं। ट्रंप ने कहा है कि अगर ईरान के साथ बातचीत विफल होती है, तो वॉशिंगटन "प्रोजेक्ट फ्रीडम" को फिर से शुरू कर सकता है। यह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों की सुरक्षा के लिए बनाई गई एक समुद्री सुरक्षा पहल है। खाड़ी में जारी अस्थिरता के बीच ट्रंप ने साफ किया है कि इस ऑपरेशन को "प्रोजेक्ट फ्रीडम प्लस" के नाम से और भी व्यापक रूप में वापस लाया जा सकता है।
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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।
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