खाली पड़े चर्च घटती भीड़, जर्मनी में ईसाई धर्म पर बड़ी रिपोर्ट; अब इन इमारतों का क्या होगा?

Jan 01, 2026 09:45 pm ISTDevendra Kasyap लाइव हिन्दुस्तान
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नए साल के आगमन से कुछ दिन पहले, जर्मनी-नीदरलैंड सीमा के पास बैड बेंटहाइम के गिल्डेहॉस इलाके में स्थित छोटे कैथोलिक सेंट आना चर्च में लगभग पूरी तरह भीड़ थी। गायक मंडली गा रही थी और छोटा ऑर्गन उनका साथ दे रहा था। लेकिन यह इस छोटे चर्च में आखिरी प्रार्थना सभा थी।

खाली पड़े चर्च घटती भीड़, जर्मनी में ईसाई धर्म पर बड़ी रिपोर्ट; अब इन इमारतों का क्या होगा?

जर्मनी में एक समय था जब चर्च की घंटियां गांवों और शहरों की धड़कन होती थीं। प्रार्थना की पुकार, उत्सवों की गूंज और सामुदायिक जीवन का केंद्र। लेकिन आज तेजी से बदलते समाज में आस्था कमजोर पड़ रही है। सदस्यों की संख्या घटने से सैकड़ों कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट चर्च बंद हो चुके हैं। जहां कभी भजन गूंजते थे, वहां अब सन्नाटा है... या फिर नया जीवन शुरू हो रहा है। ये इमारतें अब अपार्टमेंट, साइकिल दुकानें, जिम, होटल या किताबों की दुकानें बन रही हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा। इसके पीछे की वजह क्या है?

दरअसल, नए साल के आगमन से कुछ दिन पहले, जर्मनी-नीदरलैंड सीमा के पास बैड बेंटहाइम के गिल्डेहॉस इलाके में स्थित छोटे कैथोलिक सेंट आना चर्च में लगभग पूरी तरह भीड़ थी। गायक मंडली गा रही थी और छोटा ऑर्गन उनका साथ दे रहा था। लेकिन यह इस छोटे चर्च में आखिरी प्रार्थना सभा थी। अब यहां कोई प्रार्थना नहीं होगी, और यह चर्च हमेशा के लिए बंद हो गया। चर्चों का बंद होना एक भावुक मामला रहा है, जो दिल और आंखों को छू जाता है।

बताया जा रहा है कि जर्मनी में चर्च बंद होने की मुख्य वजह सदस्यों की संख्या है। अकेले 2024 में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट चर्चों ने मौत या सदस्यता छोड़ने के कारण दस लाख से अधिक सदस्य खो दिए। वर्तमान में 45% से ज्यादा जर्मन अभी भी प्रोटेस्टेंट या कैथोलिक चर्च से जुड़े हैं, जबकि तीस साल पहले यह आंकड़ा करीब 69% था। इसी वजह से अब चर्चों को अपवित्र (डेकॉन्सेक्रेट) किया जा रहा है। 2000 से अब तक सैकड़ों कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट चर्च बंद हो चुके हैं। जर्मन बिशप सम्मेलन के अनुसार, 2000 से 2024 के बीच 611 कैथोलिक चर्च बंद या सेवामुक्त हो गए। प्रोटेस्टेंट चर्च का अनुमान है कि इस अवधि में 300 से 350 चर्च स्थायी रूप से बंद हुए, हालांकि ये आंकड़े सटीक नहीं है। संभव है कि आंकड़ों में बदलाव हो सकता है।

अब सवाल उठता है कि बंद चर्चों का क्या होता है? कुछ मामलों में, खासकर बर्लिन में, बढ़ते ऑर्थोडॉक्स ईसाई समुदायों ने इन इमारतों को अपना लिया है, लेकिन यह अपवाद है। ज्यादातर बंद प्रार्थनास्थलों को बेच दिया जाता है या ध्वस्त कर दिया जाता है। हालांकि कुछ का फिर से उपयोग भी किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, कोलोन और आचेन के बीच जूलिच शहर में पूर्व कैथोलिक सेंट रोचस चर्च अब साइकिल की दुकान है। थॉमस ओएलर्स ने अपना व्यवसाय टॉम्स बाइक सेंटर यहां ट्रांसफर कर दिया। चर्च अधिकारियों ने उनसे संपर्क किया था, क्योंकि यह वही चर्च था जहां उनका बपतिस्मा हुआ था, पहला पवित्र भोज लिया था और वे अक्सर प्रार्थना में शामिल होते थे। बाहरी रूप से इमारत में बहुत कम बदलाव हुए हैं।

म्यूनस्टर के उत्तर में वेट्रिंगेन में एक मठ को 'फुटबॉल चर्च' में बदल दिया गया, जहां फुटबॉल खेली जाती है। क्लेव में पूर्व प्रोटेस्टेंट चर्च ऑफ द रेजरेक्शन अब बॉक्सिंग रिंग बन गया है। पूर्व चर्चों में अब पब, लाइब्रेरी, किताबों की दुकानें हैं। पूरे मठों को होटल में बदल दिया गया है। डसेलडोर्फ में एक होटल ने अपना पुराना नाम 'मुटरहॉस' (मदर हाउस) रखा है, जो ननों के कॉन्वेंट को याद दिलाता है। वहीं, आवास संकट के बीच चर्च भवनों को अपार्टमेंट में बदलने के मामले बढ़ रहे हैं। बर्लिन, रॉस्टॉक, ट्रायर, कोलोन और वुप्पर्टल में। सबसे पुराने बड़े परिसरों में से एक एसेन का लुकास-के-हाउस है। 1961 में बनी प्रोटेस्टेंट सेंट ल्यूक चर्च को 2008 में अपवित्र किया गया और 2012-2013 में अपार्टमेंट में बदल दिया गया। सीढ़ियों के नीचे दो पट्टिकाएं हैं- एक 1959 की और दूसरी 2012 की। मूल रंगीन कांच की खिड़कियां अभी भी हैं।

Devendra Kasyap

लेखक के बारे में

Devendra Kasyap

देवेन्द्र कश्यप पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगस्त 2025 से वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। संस्थान की होम टीम का वह एक अहम हिस्सा हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर रहती है। वायरल कंटेंट के साथ-साथ लीक से हटकर और प्रभावशाली खबरों में उनकी विशेष रुचि है।

देवेन्द्र ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2013 में महुआ न्यूज से की। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में रिपोर्टिंग की। इस दौरान राजनीति के साथ-साथ क्राइम और शिक्षा बीट पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने जी न्यूज (बिहार-झारखंड) में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2015 में ईनाडु इंडिया के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया।

मूल रूप से बिहार के भोजपुरी बेल्ट रोहतास जिले के रहने वाले देवेन्द्र कश्यप ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पटना से प्राप्त की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और MCU भोपाल से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रवास कर रहे हैं।

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