चले थे इस्लामिक नाटो बनाने, एक महीने में ही आ गई दरार? सऊदी अरब ने पाक को दिया तगड़ा झटका, औंधे मुंह गिरे मुनीर

लाइव हिन्दुस्तान, काबुल/रियाद
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इस डील के साथ ही सऊदी अरब ने अफगानिस्तान को अलग-थलग करने की पाकिस्तान की कोशिशों को भी चुनौती दे दी है, जबकि हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' पर हस्ताक्षर किए थे।

shehbaz sharif and asim munir with saudi arabia leaders
पाकिस्तान को सऊदी अरब ने बड़ा झटका दिया है।

पिछले महीने यानी 7 अगस्त को मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर दस्तखत किए थे। इसे मक्का पैक्ट और इस्लामिक नाटो कहा गया। इस समझौते की सबसे बड़ी शर्त यह थी कि तीनों में से किसी भी एक सदस्य देश पर किसी तरह का हमला उन तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। समझौते की यह शर्त नाटो के अनुच्छेद-5 जैसा है, इसीलिए इसी तीम मुस्लिम देशों का इस्लामिक नाटो कहा गया। अब जब सऊदी अरब पर ईरान समर्थित हूती विद्रोही हमला बोल रहे हैं तो पाकिस्तान यमन और हूतियों पर हमले करने से कतरा रहा है। उसे डर है कि ऐसा करने से ईरान नाराज हो जाएगा। लिहाजा, इस्लामिक नाटो का गुब्बार महीने भर के अंदर फूटता नजर आ रहा है और सदस्य देशों के बीच दरार आती दिख रही है।

इसे एक और कदम से समझा जा सकता है कि इसी हफ्ते सऊदी अरब ने पाकिस्तान के पड़ोसी और शत्रु देश अफगानिस्तान में निवेश के लिए एक समझौता किया और उससे पाकिस्तान को एकदम दरकिनार कर दिया। सऊदी अरब की इस डील से पता चलता है कि रियाद इस्लामाबाद से अलग हटकर अपने हितों को आगे बढ़ाना चाह रहा है। इससे अफगानिस्तान में पाकिस्तान की पारंपरिक तौर पर चली आ रही कंट्रोल करने वाली भूमिका भी कमजोर हो सकती है।

7 सितंबर को सऊदी ने किया डील

दरअसल, इसी हफ्ते 7 सितंबर को अफगानिस्तान के तालिबान-नेतृत्व वाले प्रशासन ने सऊदी एनर्जी फर्म 'डेल्टा इंटरनेशनल' के साथ काबुल में एक बड़ा समझौता किया है। दोनों पक्षों ने पश्चिमी कुशक-तिरपुल बेसिन (जिसमें हेरात और बदगिस प्रांतों के कुछ हिस्से शामिल हैं) में तेल और गैस की खोज से जुड़े 25 साल के 200 मिलियन डॉलर के समझौते को अंतिम रूप दिया है। कहा जा रहा है कि यह 200 मिलियन डॉलर का निवेश महज एक शुरुआत भर है। सऊदी अरब आगे चलकर अरबों डॉलर के बड़े एनर्जी प्रोजेक्ट्स पर समझौता करने जा रहा है। अनुमान है कि यह रकम 50-60 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है।

US ने करवाया खेला

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समझौते पर तालिबान प्रशासन के कार्यवाहक खान और पेट्रोलियम मंत्री हेदायतुल्लाह बद्री और डेल्टा इंटरनेशनल एनर्जी के CEO शहर अल-तकी ने हस्ताक्षर किए हैं। अहम बात यह है कि यह समझौता अफ़गानिस्तान में अमेरिका के पूर्व दूत और तालिबान के साथ 2020 के दोहा समझौते के मुख्य वार्ताकार ज़लमे खलीलज़ाद की मौजूदगी में हुआ। समझौते के बाद खलीलज़ाद ने पत्रकारों से कहा कि यह डील इस बात का संकेत है कि अफ़गानिस्तान व्यापार के लिए तैयार है और बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय निवेश आकर्षित करने में सक्षम है।

पहले पाकिस्तान में होना था 20 अरब डॉलर का निवेश

दरअल, खलीलज़ाद की भागीदारी इस डील को भू-राजनीतिक रूप से और अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। वित्तीय नजरिए से यह समझौता भले ही छोटा लगे, लेकिन यह जिस बात का प्रतिनिधित्व करता है, उसके कारण यह कहीं ज़्यादा उल्लेखनीय है। यह पाकिस्तान की उस पुरानी धारणा को चुनौती देता है कि अफ़गानिस्तान के बाहरी आर्थिक और कूटनीतिक संबंध इस्लामाबाद के ज़रिए ही होने चाहिए। एक और दिलचस्प बात यह है कि सऊदी अरब ने पहले पाकिस्तान में 20 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना की घोषणा की थी, लेकिन वह निवेश अमल में नहीं आ पाया। लिहाजा, रियाद अब अफगानिस्तान में एक ठोस निवेश समझौते के साथ आगे बढ़ चुका है। यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि तालिबान-नेतृत्व वाले प्रशासन के प्रति पाकिस्तान के विरोध के बावजूद सऊदी अरब अफगानिस्तान में अपने आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।

पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान में हलचल

इस डील के साथ ही सऊदी अरब ने अफगानिस्तान को अलग-थलग करने की पाकिस्तान की कोशिशों को भी चुनौती दे दी है, जबकि हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' पर हस्ताक्षर किए थे। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि सऊदी अरब इस क्षेत्र में पाकिस्तान के हितों का समर्थन करेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान के क्षेत्रीय हितों के साथ न जुड़ने के फैसले से पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान में हलचल मच गई है।पाकिस्तानी सत्ता को कंट्रोल कर रहे सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इस डील से औंधे मुंह गिरे हैं। अब उनकी इंटरनेशनल साख दांव पर लग गई है।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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