दशकों से जिस खेल पर अमेरिका का कब्जा, उसी में ट्रंप को मात दे गए चीन और ईरान; पूरी कहानी
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका लगातार दूसरे देशों के ऊपर आर्थिक प्रतिबंध लगातार अपनी मनमानी चलाता रहता था। मनमानी करने वाले देशों के ऊपर वह डॉलर के उपयोग से रोक लगाकर और सिलिकॉन वैली तक पहुंच रोककर दंडित करता था। यूरोपीय देश नाटो सहयोगी होने के नाते अमेरिका का साथ देते थे।

Donald Trump: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के साथ ही लगातार अड़ियल रवैया अपनाए हुए हैं। दशकों से अमेरिका के नेतृत्व में आगे बढ़ रहे नाटो देशों को भी उन्होंने वाशिंगटन से दूर कर दिया है। अब यह देश भी अमेरिका से थोड़ी दूरी बनाकर ही चल रहे हैं। इसी बीच एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें कहा गया है कि जिस आर्थिक प्रतिबंधों के खेल पर दशकों से अमेरिका अपना वर्चस्व बनाए हुए था। ईरान और चीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उनके उसी खेल में मात दे दी है।
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, एक समय पर अमेरिका अपने हितों को पूरा करने के लिए दुनिया भर के देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने का अधिकार रखता था। मनमानी करने वाले देशों के ऊपर वह डॉलर के उपयोग से रोक लगाकर और सिलिकॉन वैली तक पहुंच रोककर दंडित करता था। यूरोपीय देश नाटो सहयोगी होने के नाते अमेरिका का साथ देते थे। इससे यह प्रतिबंध और भी ज्यादा सफल हो जाते थे। अमेरिका ने रूस, उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देशों पर कई दशकों तक आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए थे, जिसकी वजह से इन देशों को भारी नुकसान हुआ है। अब लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में यही आर्थिक प्रतिबंध और व्यापारिक रास्तों को रोकना अमेरिका खिलाफ जा रहा है। ट्रंप के टैरिफ वार के खिलाफ चीन ने वैश्विक सप्लाई लाइन को सिकोड़कर अमेरिका पर पलटवार किया, तो वहीं ईरान ने होर्मुज को रोककर तेल की कीमतों को बढ़ाकर अमेरिका की परेशानी को बढ़ा दिया।
चीन और ईरान अमेरिका पर दबाव बनाने में क्यों रहे सक्षम?
पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन की अड़ियल रवैए की वजह से किसी भी विशेषज्ञ ने ईरान युद्ध से पहले इसके वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में नहीं सोचा। रिपोर्ट में सीनेट वित्त समिति के वरिष्ठ डेमोक्रेट, ओरेगन के सीनेटर रॉन वायडेन के हवाले से कहा गया है कि अमेरिकी वित्त विभाग ने युद्ध से पहले इस संघर्ष के संभावित ऊर्जा बाजार परिणामों का कोई विश्लेषण नहीं किया था। ऐसे में होर्मुज स्ट्रेट के ऊपर ईरान का प्राकृतिक रूप से मजबूत हाथ हैं। जब तेहरान ने होर्मुज पर प्रतिबंध लगाया, तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था हांफने लगीं।
अमेरिकी आर्थिक मामलों के जानकार एडवर्ड फिशमैन ने कहा, "वैश्विक अर्थव्यवस्था को 1990 के दशक के अनुकूल वातावरण के लिए डिजाइन किया गया था, जब हमने यह मान लिया था कि चीन और रूस हमारे मित्र होंगे। लेकिन हम भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बढ़ते दौर में जी रहे हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहेगी जब तक एक नई वैश्विक अर्थव्यवस्था नहीं बन जाती।" ऐसे में चीन की बढ़ती मजबूती और कई महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र अमेरिका को परेशान करते रहेंगे।
अमेरिकी विदेश मंत्री जता चुके हैं चिंता
ट्रंप के टैरिफ ऐलान के पहले अमेरिकी टैरिफ्स का एक वैश्विक डर बना हुआ था। लेकिन ट्रंप ने उन टैरिफों को लागू कर दिया और अब दुनिया के तमाम देश उनकी हकीकत को समझ चुके हैं। ऐसे में ट्रंप ने शांतिकाल के लिए अमेरिका के सबसे बड़े हथियार को यूं ही चलाकर नष्ट कर दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त की है कि अन्य देशों का आर्थिक प्रभाव “हमारी विदेश नीति बनाने की क्षमता को सीमित कर देगा” जब तक कि अमेरिका अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता नहीं लाता। रुबियो ने पिछले साल एक भाषण में कहा, “21वीं सदी के लगभग सभी अग्रणी उद्योगों में हम किसी न किसी स्तर पर असुरक्षित हैं, और यह अब हमारे सामने मौजूद सर्वोच्च भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं में से एक बन गया है।”
पोस्ट ने कहा कि जब अन्य देशों ने अपने आर्थिक लाभों को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, तो ट्रंप प्रशासन को इसकी उम्मीद नहीं थी। पिछले अप्रैल में, जब चीन ने ट्रंप के टैरिफ के जवाब में दुर्लभ पृथ्वी पदार्थों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया, जो नागरिक और सैन्य उत्पादों में महत्वपूर्ण घटक हैं। तो राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया पर इस कदम को “एक बड़ा आश्चर्य” बताया। इसी तरह, जब ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया, तो अमेरिका के पास भी कोई जवाब नहीं था।
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Upendra Thapakउपेंद्र ने डिजिटल पत्रकारिता की शुरुआत लाइव हिन्दुस्तान से की है। पिछले एक साल से वे होम टीम में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024, ऑपरेशन सिंदूर और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की कवरेज की है। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (बैच 2023-24) से पूरी करने वाले उपेंद्र को इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीति, खेल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़े विषयों में गहरी रुचि है। स्नातक स्तर पर बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के कारण उन्हें मेडिकल और वैज्ञानिक विषयों की भाषा की भी अच्छी समझ है। वे मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के निवासी हैं।
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