45 साल से अपना दाहिना हाथ छिपाए रहते थे ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई, क्या थी इसके पीछे वजह

Mar 02, 2026 08:06 am ISTAnkit Ojha लाइव हिन्दुस्तान
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अयातुल्लाह अली खामेनेई अपना दाहिना हाथ छिपाए रहते थे। 1981 में उनपर एक जानलेवा हमला हुआ था। इस हमले में उनका एक हाथ खराब हो गया था। खामेनेई ने कहा था, अगर मेरा दिमाग और जुबान चल रही है तो मुझे एक हाथ की जरूरत नहीं है।

45 साल से अपना दाहिना हाथ छिपाए रहते थे ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई, क्या थी इसके पीछे वजह

अमेरिका और इजरायल के हमले में सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने के बाद खाड़ी देशों में तनाव चरम पर है। इसके अलावा कई अन्य देशों में भी प्रदर्शन हो रहे हैं। तीन दशक से अधिक समय से ईरान की सत्ता और राजनीति पर मजबूत पकड़ बनाए रखने वाले सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई अब इतिहास बन चुके हैं। अमेरिकी और इजराइली हवाई हमलों में उनकी मौत की खबर ने न केवल पश्चिम एशिया की राजनीति में भूचाल ला दिया है, बल्कि उस नेता के विवादित शासन पर भी नयी बहस छेड़ दी है जिसने 36 वर्षों तक ईरान पर कठोर नियंत्रण बनाए रखा।

फुरकान ग्रुप ने करवाया था हमला

1989 में अयातुल्लाह खुमैनी की मौत के बाद खामनेई ने सुप्रीम लीडर की जिम्मेदारी संभाली थी। इससे8 साल पहले ही खामेनेई पर जानलेवा हमला हुआ था। वह किसी तरह बच तो गए लेकिन उनके चोट के निशान नहीं गए। 1981 में खामेनेई ईरान के राष्ट्रपति थे। ईरान-इराक युद्ध के वक्त नमाज के बाद वह लोगों के सवालों का जवाब दे रहे थे। इसी बीच एक घुंगराले बाल वाला शख्स आया और उसने खामेनेई की डेस्क पर टेप रिकॉर्डर रख दिया। उसने इसका बटन दबा दिया। एक मिनट के बाद ही वह रिकॉर्डर फट गया।

दाहिना हाथ हो गया बेकार

उसने एक मेसेज भी छोड़ा था जिसमें लिखा था, यह फुरका ग्रुप की तरफ से इस्लामिक रिपब्लिक को एक तोहफा है। इस हमले में खामेनेई बुरी तरह घायल हो गए थे और वह कई महीने अस्पताल में पड़े रहे। इसी दौरान उनका दाहिना हाथ बेकार हो गया। इसमें लकवा मार गया। खामेनेई ने कहा था, मुझे एक हाथ की जरूरत नहीं है। अगर मेरा दिमाग और जुबान काम करती रहेगी तो इसकी भरपाई हो जाएगी।

दाहिना हाथ बेकार होने की वजह से ही खामेनेई बायां हाथ उठाकर ही शपथ लेते थे। ईरान के सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं में शामिल खामेनेई ईरानी समाज में लगभग उतने ही प्रभावशाली थे जितने उनके पूर्ववर्ती अयातुल्ला रूहोल्ला खोमैनी थे, जिन्होंने 1979 में इस्लामी गणराज्य ईरान की स्थापना की थी। हालांकि, ईरानी क्रांति के जनक खोमैनी थे, फिर भी कई लोगों का मानना है कि आधुनिक ईरान में खामेनेई सबसे शक्तिशाली नेता साबित हुए।

तीन दशक से अधिक समय तक सर्वोच्च नेता रहते हुए खामेनेई ने घरेलू राजनीति पर अभूतपूर्व नियंत्रण स्थापित किया और आंतरिक विरोध को सख्ती से कुचला। हाल के वर्षों में उन्होंने अपनी और अपने शासन की सत्ता बनाए रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच हुए जनआंदोलन को उनकी सरकार ने बेहद कठोरता से दबाया, जिसमें हजारों लोग मारे गए।

खामेनेई का जन्म 1939 में ईरान के उत्तर-पूर्वी शहर मरशद में हुआ था। बचपन में उन्होंने नजफ और क़ुम के इस्लामी मदरसों में पढ़ाई की, जहां से उनकी धार्मिक और राजनीतिक सोच विकसित हुई। 13 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने क्रांतिकारी इस्लाम के विचारों को अपनाना शुरू कर दिया। इनमें धर्मगुरु नवाब सफावी की शिक्षाएं शामिल थीं, जो अक्सर ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासन के खिलाफ राजनीतिक हिंसा का आह्वान करते थे। वर्ष 1958 में उनकी मुलाकात अयातुल्ला रूहोल्ला खोमैनी से हुई और उन्होंने तुरंत उनकी विचारधारा को स्वीकार कर लिया, जिसे ''खोमैनीवाद'' कहा जाता है।

इस विचारधारा में उपनिवेशवाद विरोध, शिया इस्लाम और एक ''न्यायपूर्ण'' इस्लामी समाज के निर्माण के लिए देश की भूमिका पर जोर दिया गया था। खोमैनीवाद का मूल सिद्धांत 'विलायत-ए-फकीह' यानी धर्मगुरु की संरक्षकता है। इसके अनुसार सर्वोच्च नेता के पास वही अधिकार होते हैं जो पैगंबर और शिया इमामों को प्राप्त थे। इसका अर्थ यह था कि ईरान पर शिया इस्लाम के एक विद्वान का शासन होगा। यहीं से खोमैनी और बाद में खामेनेई को अपनी व्यापक शक्ति और नियंत्रण प्राप्त हुआ।

खामेनेई ने खोमैनी के इशारे पर 1962 से शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के खिलाफ लगभग दो दशक तक क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। खोमैनी को 1964 में निर्वासित कर दिया गया था। 1971 में शाह की गुप्त पुलिस ने खामेनेई को गिरफ्तार कर यातनाएं दीं। उनके संस्मरणों में यह जानकारी दी गयी है। वर्ष 1979 में इस्लामी क्रांति के बाद शाह का शासन समाप्त हुआ और खोमैनी निर्वासन से लौटकर ईरान के सर्वोच्च नेता बने।

खामेनेई क्रांतिकारी परिषद के सदस्य बनाए गए और बाद में उप रक्षा मंत्री बने। उन्होंने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के संगठन में भी अहम भूमिका निभाई। शुरू में क्रांति और सर्वोच्च नेता की रक्षा के लिए बनाया गया यह सैन्य प्रतिष्ठान ईरान में सबसे शक्तिशाली राजनीतिक ताकतों में से एक बन गया। वर्ष 1981 में हत्या के एक प्रयास से बचने के बाद खामेनेई 1982 में ईरान के राष्ट्रपति चुने गए और 1985 में दोबारा निर्वाचित हुए। उनके राष्ट्रपति कार्यकाल का अधिकांश समय ईरान-इराक युद्ध के दौरान बीता।

सर्वोच्च नेता के अधीन होते हुए भी, खामेनेई के पास बाद के राष्ट्रपतियों की तुलना में कहीं अधिक शक्ति थी, क्योंकि क्रांति अभी ताजा-ताजा हुई थी और इराक युद्ध शासन के लिए एक बड़ा खतरा था। फिर भी वह खोमैनी की इच्छाओं का पूर्णतया पालन करते रहे। उन्होंने आईआरजीसी के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करने में भी कामयाबी हासिल की, जो उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के बाद भी कायम रहा।

सर्वोच्च नेता बनने का अप्रत्याशित फैसला :

जून 1989 में खराब सेहत के बाद खोमैनी की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी को लेकर स्पष्ट स्थिति नहीं थी। खोमैनी ने शुरू में ग्रैंड अयातुल्ला हुसैन अली मोंतज़ेरी को उत्तराधिकारी माना था, लेकिन बाद में उन्होंने सत्ता की आलोचना की और उन्हें नजरबंद कर दिया गया। खामेनेई के पास नेतृत्व करने की राजनीतिक योग्यता थी। वह खोमैनीवाद के भी प्रबल समर्थक थे। हालांकि, इस्लामी धर्मगुरुओं के समूह विशेषज्ञों की सभा द्वारा सर्वोच्च नेता के रूप में उनका चयन एक आश्चर्यजनक निर्णय के रूप में देखा गया।

दरअसल, उनकी नियुक्ति ने काफी विवाद और आलोचना को जन्म दिया। कुछ धर्मगुरुओं ने कहा कि उनके पास ''ग्रैंड अयातुल्ला'' का दर्जा नहीं है, जो संविधान के अनुसार आवश्यक था। इन आलोचकों का मानना ​​था कि अल्लाह से उचित संबंध के बिना ईरानी लोग ''केवल एक इंसान'' के वचन का सम्मान नहीं करेंगे।

जुलाई 1989 में संविधान संशोधन के लिए जनमत संग्रह कराया गया, जिसमें सर्वोच्च नेता बनने की शर्तों को बदला गया और खामेनेई को अयातुल्ला का दर्जा दिया गया। इसके बाद वह सर्वोच्च नेता बन गए। खामेनेई की स्थिति कागजों पर तो मजबूत हो गई थी, लेकिन 1982 से राष्ट्रपति होने के बावजूद उन्हें धार्मिक अभिजात वर्ग और आम जनता दोनों के बीच खोमैनी जैसी लोकप्रियता प्राप्त नहीं थी। विधान संशोधन के बाद उन्हें व्यापक अधिकार मिल गए, वे नीतियां तय कर सकते थे, संरक्षक परिषद के सदस्यों की नियुक्ति कर सकते थे और जनमत संग्रह कराने का आदेश दे सकते थे।

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लेखक के बारे में

Ankit Ojha

विद्यालयी जीवन से ही कलात्मक अभिव्यक्ति, विचारशील स्वभाव और मिलनसार व्यक्तित्व और सामान्य के अंदर डुबकी लगाकर कुछ खास खोज लाने का कौशल पत्रकारिता के लिए अनुकूल साबित हुआ। अंकित ओझा एक दशक से डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले अंकित ओझा समाचारों की दुनिया में तथ्यों के महत्व के साथ ही संवेदनशीलता के पक्ष को साधने में निपुण हैं। पिछले चार साल से हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के 'लाइव हिन्दुस्तान' के लिए चीफ कॉन्टेंट प्रड्यूसर पद पर कार्य कर रहे हैं। इससे पहले 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'इंडियन एक्सप्रेस' ग्रुप के साथ भी कार्य कर चुके हैं।


राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राज्य और सामाजिक सरोकारों की खबरों के संपादन में लंबा अनुभव होने के साथ ही अपने-आसपास की घटनाओं में समाचार तत्व निकालने की अच्छी समझ है। घटनाओं और समाचारों से संबंधित फैसले लेने और त्वरित समाचार प्रकाशित करने में विशेष योग्यता है। इसके अलावा तकनीक और पाठकों की बदलती आदतों के मुताबिक सामग्री को रूप देने के लिए निरंतर सीखने में विश्वास करते हैं। अंकित ओझा की रुचि राजनीति के साथ ही दर्शन, कविता और संगीत में भी है। लेखन और स्वरों के माध्यम से लंबे समय तक आकाशवाणी से भी जुड़े रहे। इसके अलावा ऑडियन्स से जुड़ने की कला की वजह से मंचीय प्रस्तुतियां भी सराही जाती हैं।


अकादमिक योग्यताः अंकित ओझा ने प्रारंभिक शिक्षा नवोदय विद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया मिल्ल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में ही ग्रैजुएशन किया है। इसके बाद भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमए किया है। जामिया में अध्ययन के दौरान ही इटैलियन और उर्दू भाषा में भी कोर्स किए हैं। इसके अलावा पंजाबी भाषा की भी अच्छी समझ रखते हैं। विश्वविद्यालय में NCC का 'C सर्टिफिकेट' भी प्राप्त किया है। IIMC और ऑक्सफर्ड से स्वास्थ्य पत्रकारिता का सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया है।

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