...तो ईरान नहीं, पाकिस्तान होता निशाना; इजरायल-US के हमले पर ऐसा क्यों बोले एक्सपर्ट

Mar 02, 2026 02:48 pm ISTUpendra Thapak लाइव हिन्दुस्तान
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इजरायल और अमेरिका के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत हो गई है। इसके बाद ईरान ने पलटवार करते हुए पूरे मध्य-पूर्व पर हमला बोल दिया है। अमेरिका के ठिकानों  पर लगातार ईरानी मिसाइलों, ड्रोन्स से हमला हो रहा है, जबकि तेहरान पर भी लगातार हमले हो रहे हैं।

...तो ईरान नहीं, पाकिस्तान होता निशाना; इजरायल-US के हमले पर ऐसा क्यों बोले एक्सपर्ट

Iran America Israel War: इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए हमलों के बाद ईरान के पलटवार ने पूरे मिडिल ईस्ट को युद्ध की जद में ले लिया है। अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान पर हमला बोल रहे हैं, तो वहीं ईरान क्षेत्र में मौजूद अमेरिका के ठिकानों और उसके सहयोगी देशों को निशाना बना रहा है। इस संघर्ष की शुरुआत अमेरिका और इजरायल के दशकों पुराने उस डर के साथ हुई थी कि वह इस क्षेत्र के किसी भी देश को परमाणु हथियार नहीं बनाने देगा। अमेरिका लगातार इस बात को कहता आ रहा है कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है, हालांकि ईरान हमेशा से इस बात से इनकार करता रहा है। लेकिन क्या सच में अमेरिका ने केवल परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए ईरान पर हमला किया है? विशेषज्ञों का ऐसा मानना नहीं है। विदेशी मामलों के जानकार प्रोफेसर चेलानी की मानें, तो अगर अमेरिका और इजरायल की चिंता केवल परमाणु हथियार और अंतरमहाद्वीपीय दूरी तक मार करने वाली मिसाइल ही होती, तो वह ईरान से पहले पाकिस्तान पर मार करता।

सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपने इस बयान के पक्ष में तर्क देते हुए प्रोफेसर ने कहा कि पाकिस्तान भी ईरान की तरह ही एक इस्लामिक देश है और यह सर्वविदित है कि वह ईरान की तरह ही आतंकी संगठनों को मदद करता रहा है। उन्होंने लिखा, "ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले का संबंध परमाणु या मिसाइल प्रसार या आतंकवाद को सहायता देने से बहुत कम है। अगर इन दोनों देशों की वास्तविक चिंताएं यही रही होतीं, तो इनका अधिक स्पष्ट लक्ष्य पाकिस्तान होता। एक ऐसा देश, जो घोषित रूप से परमाणु हथियार रखता है। इसके पास 170 से ज्यादा परमाणु वारहेड हैं। अमेरिकी खुफिया विभाग के मुताबिक इसके बाद इंटर कॉन्टिनेंटल मिसाइल भी है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका तक मार कर सकती है। इतना ही नहीं यह देश खुलेतौर पर आतंकवाद को समर्थन भी देता है, यहां तक की ओसामा बिन लादेन भी इसी देश में मिला था।"

प्रोफेसर ने कहा कि अगर इस रूप में देखा जाए तो पाकिस्तान, ईरान से कहीं ज्यादा बड़ा खतरा नजर आता है। क्योंकि ईरान की तरफ देखें, तो वह पाकिस्तान से इतर परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) का हस्ताक्षरकर्ता देश है और कई पश्चिमी देशों द्वारा यह माना जाता है कि वह अभी परमाणु हथियार बनाने की क्षमता विकसित करने से काफी दूर है। उन्होंने कहा, "यह माना जाता है कि ईरान अभी तक केवल 60 फीसदी यूरेनियम इनरिच करने की क्षमता को प्राप्त कर पाया है, जो कि परमाणु हथियार (90फीसदी) से काफी दूर है। इसके बाद भी अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ा है, न कि पाकिस्तान के खिलाफ। अमेरिका का पक्ष देखें, तो उन्होंने अपने इस खतरनाक कदम को इस दावे के साथ सही ठहराया है कि अगर ईरान को परमाणु हथियार बनाने दिया जाता, तो यह इजरायल और अमेरिका के लिए अस्तित्व का खतरा बन सकता था।"

परमाणु हथियार नहीं, फिर क्या है हमले का असली मकसद?

प्रोफेसर चेलानी ने इस युद्ध के लिए ईरान के परमाणु हथियार नहीं, बल्कि अमेरिका द्वारा इस क्षेत्र में अपने हितों को साधने को वजह बताया। उन्होंने कहा, "इस युद्ध का तर्क रक्षात्मक नहीं है, बल्कि भू-राजनीतिक है। यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को नया आकार देने और तेहरान में अपने मन मुताबिक सत्ता स्थापित करने के लिए है। ईरान में सत्ता परिवर्तन के बाद क्षेत्र में मौजूद उसके प्रॉक्सी संगठन भी कमजोर होंगे। इसके अलावा होर्मुज स्ट्रेट, जिससे दुनिया का लभगभ 20 फीसदी व्यापारिक तेल गुजरता है, उस पर भी अमेरिका का नियंत्रण हो जाएगा, जो क्षेत्र में उसके प्रभाव को और भी ज्यादा बढ़ा देगा।"

आपको बात दें, इजरायल इस क्षेत्र में ईरान के बाद पाकिस्तान को ही अपना सबसे बड़ा खतरा बताता रहा है। हालांकि, अमेरिका की इस मामले में राय दूसरी है। पाकिस्तान के बनने के बाद से ही अमेरिका लगातार उसे सहायता देता है। शीत युद्ध के दौरान भी पाकिस्तान ने अमेरिकी खेमे का चुनाव किया था। एक समय तक ज्यादातर पाकिस्तानी हथियारों को अमेरिका ही सप्लाई करता था। इसके बाद भारत को सोवियत संघ के रूप में एक दोस्त चुनना पड़ा था। पाकिस्तान ने अरबों डॉलर लेकर अमेरिका की वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भी साथ दिया था। ऐसा माना जाता है कि इस बीच जब भारत ने परमाणु क्षमता हासिल की, तो क्षेत्रीय संतुलन को बनाए रखने के लिए पश्चिमी देशों ने ही पाकिस्तान की यह शक्ति हासिल करने में मदद की थी।

हालांकि, जब अमेरिका अफगानिस्तान से निकला, तो पाकिस्तान का महत्व कम हो गया। एक समय यह आया कि ऐसी खबरें आने लगी कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का फोन उठाना भी बंद कर दिया है। पाकिस्तान भी जाकर चीन की गोद में बैठ गया, लेकिन फिर ट्रंप के कार्यकाल में पाकिस्तान एक बार फिर से अमेरिका का करीबी होता नजर आ रहा है।

Upendra Thapak

लेखक के बारे में

Upendra Thapak

उपेंद्र ने डिजिटल पत्रकारिता की शुरुआत लाइव हिन्दुस्तान से की है। पिछले एक साल से वे होम टीम में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024, ऑपरेशन सिंदूर और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की कवरेज की है। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (बैच 2023-24) से पूरी करने वाले उपेंद्र को इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीति, खेल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़े विषयों में गहरी रुचि है। स्नातक स्तर पर बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के कारण उन्हें मेडिकल और वैज्ञानिक विषयों की भाषा की भी अच्छी समझ है। वे मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के निवासी हैं।

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