
निकाह, तलाक और... इराक के इस कानून को क्यों बताया जा रहा महिलाओं के लिए घातक?
जनवरी 2025 में इराकी संसद ने 1959 के पुराने व्यक्तिगत स्थिति कानून में परिवर्तन किया था, जिसके तहत नागरिकों को पारिवारिक मामलों में धार्मिक या सिविल नियमों के बीच विकल्प चुनने की स्वतंत्रता मिल गई। नए प्रावधानों के मुताबिक, कोई पुरुष अपने विवाह अनुबंध को शिया धार्मिक संहिता के अंतर्गत बदल सकता है।
ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) ने बुधवार को इराक की संसद द्वारा पारित नए जाफरी पर्सनल स्टेटस कोड (Ja'afari Personal Status Code) की तीखी आलोचना की है। शिया जाफरी इस्लामी न्यायशास्त्र पर आधारित यह कोड विवाह, तलाक, बच्चों की कस्टडी, देखभाल और उत्तराधिकार जैसे पारिवारिक मामलों में पुरुषों को स्पष्ट रूप से प्राथमिकता प्रदान करता है। संगठन के अनुसार, यह संशोधन महिलाओं के मौलिक अधिकारों को बुरी तरह प्रभावित करता है और उन्हें 'दूसरे दर्जे का नागरिक' बना देता है।

दरअसल, जनवरी 2025 में इराकी संसद ने 1959 के पुराने व्यक्तिगत स्थिति कानून में परिवर्तन किया था, जिसके तहत नागरिकों को पारिवारिक मामलों (विवाह, उत्तराधिकार, तलाक और बच्चों की कस्टडी) में धार्मिक या सिविल नियमों के बीच विकल्प चुनने की स्वतंत्रता मिल गई। इसी संशोधन के तहत शिया बंदोबस्ती कार्यालय ने 'जाफरी (शिया) नियमों पर आधारित व्यक्तिगत स्थिति संहिता' तैयार की, जिसे संसद ने मंजूरी दे दी। नए प्रावधानों के मुताबिक, कोई पुरुष अपनी पत्नी को सूचित किए बिना अपने विवाह अनुबंध को शिया धार्मिक संहिता के अंतर्गत बदल सकता है।
गजल नाम की एक महिला ने ह्यूमन राइट्स वॉच को बताया कि उन्हें अदालत से नोटिस प्राप्त हुआ है। इसमें उल्लेख है कि उनके पूर्व पति ने तलाक के दस वर्ष बाद उनके 10 वर्षीय बेटे की कस्टडी समाप्त करने और पूर्वव्यापी प्रभाव से शिया पर्सनल स्टेटस कोड लागू करने के लिए मुकदमा दायर किया है। गजल ने संगठन से कहा कि यह पूरी तरह असहनीय है कि कोई व्यक्ति महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने वाले कानून के तहत विवाह करे, लेकिन दशक भर बाद उसी कानून में छेड़छाड़ कर उन अधिकारों को छीन ले। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने अपना विवाह तब समाप्त किया था जब वह हिंसक हो चुका था।
ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, यह नई संहिता पतियों को पत्नी की सहमति या सूचना के बिना तलाक देने की छूट देती है। इसके अलावा, सात वर्ष की आयु के बाद बच्चों की कस्टडी और जिम्मेदारी पिता के हवाले कर दी जाती है। हालांकि पत्नी विवाह अनुबंध में बहुविवाह या तलाक के लिए अपनी सहमति की शर्त रख सकती है, लेकिन यदि पति इनका उल्लंघन करता है तो भी विवाह या तलाक को कानूनी रूप से मान्य माना जाएगा।
संगठन की इराक शोधकर्ता सारा सनबार ने टिप्पणी की कि यह नया कोड महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव को और गहरा करता है तथा उन्हें कानूनी तौर पर दूसरे दर्जे का दर्जा प्रदान करता है। यह महिलाओं और लड़कियों से उनके जीवन पर नियंत्रण छीनकर पुरुषों को सौंप देता है। इसे तुरंत निरस्त किया जाना चाहिए। संशोधन के प्रारंभिक मसौदे की नारीवादी समूहों और नागरिक समाज संगठनों ने कड़ी भर्त्सना की थी, क्योंकि इससे मुस्लिम लड़कियों की न्यूनतम विवाह आयु नौ वर्ष तक गिर सकती थी।
गौरतलब है कि इसी महीने एमनेस्टी इंटरनेशनल ने चेतावनी जारी की थी कि ये बदलाव अपंजीकृत विवाहों को वैधता प्रदान करेंगे, जिनका दुरुपयोग अक्सर बाल विवाह प्रतिबंधों को तोड़ने के लिए होता है। इससे तलाक और उत्तराधिकार में महिलाओं व लड़कियों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। हालांकि, नया संशोधन सुन्नी अदालतों को अपना स्वतंत्र कोड जारी करने की अनुमति देता है, लेकिन वे अभी भी 1959 के मूल कानून का पालन कर रहे हैं।

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Devendra Kasyapलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


