Explainer: यूक्रेन में युद्ध के बीच कैसे होगा चुनाव? जेलेंस्की तैयार; लेकिन रास्ते में हैं कई पेच

लाइव हिन्दुस्तान, कीव
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यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा है कि अगर अमेरिका और यूरोपीय सहयोगी मतदान की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकें तो वे चुनाव कराने को तैयार हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इससे पहले भी यूक्रेन में चुनाव कराने की वकालत कर चुके हैं।

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जेलेंस्की चुनाव कराने को तैयार

यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की ने आम चुनाव को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर अमेरिका और कीव के यूरोपीय सहयोगी मतदान प्रक्रिया की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकें, तो वे युद्ध के दौरान भी राष्ट्रीय चुनाव कराने के लिए तैयार हैं। जेलेंस्की का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कई मौकों पर यूक्रेन में जल्द चुनाव कराने की वकालत कर चुके हैं। ट्रंप का तर्क रहा है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को जारी रखना यूक्रेन की वैधता और अंतरराष्ट्रीय समर्थन के लिए आवश्यक है। हालांकि, विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों का स्पष्ट मानना है कि मौजूदा युद्ध की परिस्थितियों में चुनाव कराना बेहद जटिल और जोखिम भरा कदम होगा। पद से हटाए गए पूर्व रक्षा मंत्री मिखाइलो फेडोरोव सहित कुछ प्रमुख हस्तियों की मांगों के बाद यह बहस हाल के दिनों में और तेज हो गई है। लेकिन कानूनी, सुरक्षा, रसद, राजनीतिक और वित्तीय स्तर पर कई गंभीर बाधाएं सामने आ रही हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना लगभग असंभव है।

सबसे बड़ी अड़चन क्या?

बता दें कि रूस द्वारा फरवरी 2022 में शुरू किए गए पूर्ण पैमाने के आक्रमण के बाद से यूक्रेन में मार्शल लॉ लगातार लागू है। यूक्रेनी संविधान और मार्शल लॉ संबंधी कानूनों के तहत युद्धकाल में राष्ट्रीय चुनाव कराना स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित है। संविधान का अनुच्छेद और संबंधित कानून युद्ध की स्थिति में राष्ट्रपति, संसद या स्थानीय चुनावों पर रोक लगाते हैं, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और एकता बनी रहे। युद्ध के दौरान चुनाव कराने के लिए यूक्रेन को मौजूदा कानूनों में बड़े पैमाने पर बदलाव करने होंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि युद्धकालीन चुनाव के समय, नियमों, प्रक्रियाओं, मतदाता पात्रता और सुरक्षा प्रावधानों को नियंत्रित करने वाले नए विधायी ढांचे का मसौदा तैयार करने, संसद में चर्चा करने और उसे पारित करने में कम से कम छह महीने या उससे अधिक समय लग सकता है। इस प्रक्रिया में राजनीतिक सहमति बनाना भी एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि विभिन्न दलों के बीच मतभेद गहरा सकते हैं।

सुरक्षा को लेकर टेंशन

सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, मतदान केंद्रों पर लाखों लोगों की भारी भीड़ रूसी ड्रोन और मिसाइल हमलों के लिए आसान निशाना बन सकती है। वर्तमान में रूस नियमित रूप से यूक्रेन के शहरों, ऊर्जा अवसंरचना और नागरिक क्षेत्रों पर हमले कर रहा है। व्यापक हवाई युद्धविराम या प्रभावी वायु रक्षा व्यवस्था के बिना मतदाताओं की शारीरिक सुरक्षा सुनिश्चित करना लगभग असंभव माना जा रहा है। इसके अलावा, यूक्रेन के ऊर्जा क्षेत्र पर रूस के लगातार हमलों ने बिजली आपूर्ति व्यवस्था को बेहद अस्थिर बना दिया है। रॉयटर्स, अल जजीरा और अन्य अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों की रिपोर्टों के अनुसार, बार-बार होने वाली व्यापक बिजली कटौती से इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनें, मतदाता पंजीकरण प्रणाली, मतगणना केंद्र और संचार नेटवर्क पूरी तरह ठप हो सकते हैं। कई क्षेत्रों में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं भी बाधित रहती हैं, जिससे पारदर्शी मतदान प्रक्रिया सुनिश्चित करना और भी कठिन हो जाएगा।

यूक्रेन के सशस्त्र बलों में वर्तमान में लगभग 10 लाख नागरिक कार्यरत हैं। इनमें से बड़ी संख्या सक्रिय मोर्चों पर या ड्रोन हमलों से प्रभावित क्षेत्रों में तैनात है। इन सैनिकों को राष्ट्रीय रक्षा की जिम्मेदारी निभाते हुए सुरक्षित, गोपनीय और निष्पक्ष तरीके से मतदान का अधिकार देना एक अभूतपूर्व रसद संबंधी चुनौती है। मोर्चे पर मोबाइल मतदान केंद्र स्थापित करना या विशेष व्यवस्था करना न केवल खतरनाक होगा, बल्कि व्यावहारिक रूप से बेहद जटिल साबित हो सकता है।

44 लाख से अधिक यूक्रेनी शरणार्थी

अकेले यूरोपीय संघ में 44 लाख से अधिक यूक्रेनी शरणार्थी अस्थायी सुरक्षा की स्थिति में रह रहे हैं। इसके अलावा, दुनिया के अन्य देशों में भी बड़ी संख्या में यूक्रेनी नागरिक बिखरे हुए हैं। यूक्रेन के विदेशी दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों के पास इतने बड़े पैमाने पर वोटों की सुरक्षित, पारदर्शी और सुचारू प्रक्रिया करने की भौतिक क्षमता, स्टाफ और संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। विदेशों में मतदान की व्यवस्था में देरी, अनियमितताएं या धोखाधड़ी के आरोप लगने का खतरा भी बना रहेगा।

सबसे गंभीर मुद्दा उन क्षेत्रों का है जो अभी भी रूस के नियंत्रण में हैं। यूक्रेन का लगभग 19 प्रतिशत भूभाग रूसी कब्जे में है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लाखों वयस्क नागरिक चुनाव में भाग लेने से पूरी तरह वंचित रह जाएंगे। इससे चुनाव की राष्ट्रीय वैधता पर गंभीर सवाल उठेंगे और परिणामों को अधूरा या पक्षपातपूर्ण माना जा सकता है।

मतदाता सूची पूरी तरह पुरानी

बताया जा रहा है कि देश के अंदर और बाहर बड़े पैमाने पर तथा तेजी से हुए विस्थापन के कारण राज्य मतदाता सूची पूरी तरह पुरानी और अपडेटेड नहीं रह गई है। लाखों लोग अपना मूल निवास छोड़ चुके हैं, कई की मृत्यु हो चुकी है या वे लापता हैं। यह पता लगाना कि कौन मतदान के लिए पात्र है और कहां मतदान कर सकता है, एक जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया है जिसमें कई महीने लग सकते हैं। नई सूची तैयार करने में गलतियां होने पर कानूनी विवाद और अविश्वास बढ़ सकता है।

एकता पर खतरा

लोकतांत्रिक चुनाव के लिए गहन राजनीतिक प्रचार, सार्वजनिक बहस, मीडिया कवरेज और वर्तमान प्रशासन की आलोचना आवश्यक होती है। कई यूक्रेनियन नागरिकों को डर है कि युद्ध के दौरान विभाजनकारी राजनीतिक अभियान राष्ट्रीय एकता को भंग कर सकते हैं, जो रूस के खिलाफ संघर्ष जारी रखने के लिए बेहद जरूरी है। युद्धकाल में आंतरिक राजनीतिक संघर्ष दुश्मन के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

इसके अलावा वित्तीय दृष्टि से भी चुनाव एक बड़ा बोझ होगा। राष्ट्रीय चुनाव कराने का अनुमानित खर्च 220 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक बताया जा रहा है। इसमें मतदान केंद्रों की सुरक्षा, रसद, कर्मचारियों का वेतन, तकनीक और प्रचार सामग्री शामिल है। आलोचकों का तर्क है कि इतनी बड़ी राशि और प्रशासनिक ध्यान को सैन्य रक्षा, हथियार खरीद, नागरिक सुरक्षा और पुनर्निर्माण से हटाकर राजनीति की ओर मोड़ना युद्ध प्रयासों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।

इसके अलावा, जल्दबाजी में, आंशिक या अव्यवस्थित तरीके से कराए गए मतदान को रूसी दुष्प्रचार नेटवर्क द्वारा आसानी से हथियार बनाया जा सकता है। मॉस्को परिणामों को 'फर्जी', 'अवैध' या 'अंतरराष्ट्रीय दबाव में हुए' करार देने की कोशिश करेगा। इससे यूक्रेन की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा, सहयोगियों का विश्वास और घरेलू मनोबल दोनों को नुकसान पहुंचने का खतरा है

जनता की राय और सवाल

हालांकि लंबे समय तक मार्शल लॉ लागू रहने से दीर्घकालिक लोकतांत्रिक शासन और जवाबदेही पर सवाल जरूर उठते हैं, लेकिन उपलब्ध सर्वेक्षणों से साफ पता चलता है कि यूक्रेनी जनता का बहुमत युद्ध में जीत हासिल करने तक चुनाव कराने का विरोध करता है। आम नागरिकों का मानना है कि वास्तव में स्वतंत्र, निष्पक्ष और सुरक्षित मतदान के लिए व्यावहारिक बाधाएं फिलहाल दुर्गम हैं। वे प्राथमिकता सुरक्षा, स्थिरता और रूस की हार को देते हैं।

Devendra Kasyap

लेखक के बारे में

Devendra Kasyap

देवेन्द्र कश्यप पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगस्त 2025 से वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। संस्थान की होम टीम का वह एक अहम हिस्सा हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर रहती है। वायरल कंटेंट के साथ-साथ लीक से हटकर और प्रभावशाली खबरों में उनकी विशेष रुचि है।

देवेन्द्र ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2013 में महुआ न्यूज से की। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में रिपोर्टिंग की। इस दौरान राजनीति के साथ-साथ क्राइम और शिक्षा बीट पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने जी न्यूज (बिहार-झारखंड) में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2015 में ईनाडु इंडिया के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया।

मूल रूप से बिहार के भोजपुरी बेल्ट रोहतास जिले के रहने वाले देवेन्द्र कश्यप ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पटना से प्राप्त की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और MCU भोपाल से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रवास कर रहे हैं।

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