भारत के लिए अच्छी खबर! अमेरिका ने रूसी तेल पर दी गई छूट को एक महीने और बढ़ाया
अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन ने यू-टर्न लेते हुए रूसी तेल की खरीद पर प्रतिबंधों में छूट को एक महीने के लिए और बढ़ा दिया है। जानिए कैसे अमेरिका-इजरायल युद्ध, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने और वैश्विक ऊर्जा संकट ने इस फैसले को प्रभावित किया।

अमेरिका ने रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर लगे प्रतिबंधों में दी गई छूट को एक महीने और बढ़ा दिया है। ट्रंप प्रशासन ने 17 अप्रैल (शुक्रवार) को यूएस ट्रेजरी विभाग के जरिए नया लाइसेंस जारी कर दिया है। इसके तहत देश अब 16 मई 2026 तक समुद्र में लोडेड रूसी तेल खरीद सकते हैं। यह फैसला भारत समेत कई आयातक देशों के लिए राहत भरा है, क्योंकि इससे सस्ता रूसी कच्चा तेल मिलता रहेगा। यह फैसला ट्रंप प्रशासन के उस बयान के मात्र दो दिन बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि इस तरह की छूट को आगे बढ़ाने की उनकी कोई योजना नहीं है।
वैश्विक ऊर्जा संकट और युद्ध का प्रभाव
यह लाइसेंस ट्रंप सरकार के उन प्रयासों का एक हिस्सा है जिसका उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित करना है। ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध के दौरान ऊर्जा की कीमतों में भारी उछाल आया है। यह नया लाइसेंस उस 30-दिवसीय छूट का स्थान लेगा जो 11 अप्रैल को समाप्त हो गई थी। इस समझौते में एक स्पष्ट शर्त यह है कि ईरान, क्यूबा और उत्तर कोरिया से जुड़े किसी भी लेन-देन को इस छूट से बाहर रखा गया है।
बुधवार को, ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा था कि अमेरिका अब रूसी और ईरानी तेल के लिए दी गई छूट को आगे नहीं बढ़ाएगा। लेकिन अब बढ़ा दिया है। ईरान के लिए दी गई छूट भी रविवार को समाप्त होने वाली है। ट्रेजरी विभाग ने 20 मार्च को ईरानी तेल पर छूट जारी की थी। पिछले महीने बेसेंट ने बताया था कि इस छूट के कारण लगभग 140 मिलियन बैरल तेल वैश्विक बाजारों तक पहुंच सका, जिससे युद्ध के दौरान ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ने वाले भारी दबाव को कम करने में मदद मिली।
भारत के लिए फायदेमंद
भारत इस छूट का सबसे बड़ा फायदा उठाने वाले देशों में शामिल है। मार्च 2026 में भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद तीन गुना बढ़ाकर 5.8 अरब डॉलर कर ली थी। रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव ने पहले ही आश्वासन दिया था कि रूस भारत को जरूरत के मुताबिक तेल, एलपीजी और एलएनजी सप्लाई करने के लिए तैयार है। इस छूट से भारतीय रिफाइनरी कंपनियां बिना अमेरिकी प्रतिबंध के जोखिम के रूसी तेल खरीदना जारी रख सकेंगी, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें नियंत्रण में रहेंगी और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। विदेश सचिव की हालिया अमेरिका यात्रा के दौरान भारत ने इस छूट को बढ़ाने की मांग भी की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम साबित होगा, खासकर जब होर्मुज संकट के कारण सप्लाई चेन प्रभावित है।
गौरतलब है कि यह छूट रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों का हिस्सा है। शुरू में मार्च में भारत को खास तौर पर 30 दिन की छूट दी गई थी ताकि समुद्र में फंसे रूसी तेल को क्लियर किया जा सके। उस समय करीब 10 करोड़ बैरल रूसी तेल बाजार में आया, जो एक दिन के ग्लोबल उत्पादन के बराबर है। हालांकि, इस फैसले की अमेरिका में दो तरफ से आलोचना हो रही है। कुछ सांसदों का कहना है कि इससे रूस को युद्ध के लिए पैसा मिल रहा है। यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी रूस पर प्रतिबंध ढीले करने का विरोध जताया है। फिर भी, ट्रंप प्रशासन का फोकस फिलहाल ऊर्जा कीमतों को काबू में रखने पर है।
राजनीतिक विरोध और विशेषज्ञों की राय
अमेरिका में दोनों राजनीतिक दलों के सांसदों ने सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना की थी। सांसदों का तर्क था कि प्रतिबंधों में इस तरह की छूट से ईरान की अर्थव्यवस्था को तब फायदा होगा जब वह अमेरिका के साथ युद्ध लड़ रहा है, और इसी तरह रूस को तब फायदा होगा जब वह यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में उलझा हुआ है।
कंसल्टिंग फर्म 'ओब्सीडियन रिस्क एडवाइजर्स' के एक प्रतिबंध विशेषज्ञ ब्रेट एरिकसन ने कहा कि वाशिंगटन द्वारा दी गई यह छूट संभवतः आखिरी नहीं है। एरिकसन ने स्पष्ट किया कि इस संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को स्थायी नुकसान पहुंचाया है, और बाजारों को स्थिर करने के लिए जो भी उपकरण उपलब्ध थे, वे लगभग समाप्त हो चुके हैं। रूसी राष्ट्रपति के दूत किरिल दिमित्रीव ने पहले कहा था कि पहली छूट से 100 मिलियन बैरल रूसी कच्चे तेल को वैश्विक बाजार में उतरने का रास्ता मिलेगा, जो कि पूरी दुनिया के लगभग एक दिन के उत्पादन के बराबर है।
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