जिहादी नेटवर्क से हथियारों तक...क्या बांग्लादेश बन रहा भारत के लिए नया सुरक्षा खतरा?
बांग्लादेश के पूर्व विदेश मंत्री डॉ. ए.के. अब्दुल मोमेन ने संयुक्त राष्ट्र से देश में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है और कट्टरता, जिहादी उग्रवाद तथा हथियारों के बढ़ते प्रसार को लेकर चेतावनी दी है।

भारत के लिए बांग्लादेश में बढ़ती कट्टरता, जिहादी उग्रवाद और हथियारों का प्रसार अब आंतरिक मामला नहीं रह गया है। पूर्व विदेश मंत्री डॉ एके अब्दुल मोमेन की संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की अपील के बाद नई दिल्ली में सुरक्षा एजेंसियां सिलीगुड़ी कॉरिडोर, सीमावर्ती जिलों और पूर्वोत्तर तक इसके संभावित असर को लेकर अलर्ट हो गई हैं। दरअसल, मोमेन ने चेतावनी दी है कि देश में कट्टरता, जिहादी उग्रवाद और हथियारों का प्रसार तेजी से बढ़ रहा है तथा राजनीतिक-सुरक्षा स्थिति लगातार बिगड़ रही है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को संबोधित आधिकारिक अपील में मोमेन ने कहा है कि हालिया राजनीतिक परिवर्तनों के बाद ग्रामीण बांग्लादेश में जिहादी गतिविधियां, कट्टरपंथी सोच और अवैध हथियार फैल रहे हैं। उन्होंने इसे केवल आंतरिक संकट नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शांति के लिए गंभीर खतरा बताया है। बता दें कि मोमेन पहले बांग्लादेश के संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि भी रह चुके हैं। उनके अनुसार, स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब चुप नहीं रह सकता।
जेलों में मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप
पूर्व विदेश मंत्री ने बांग्लादेशी जेलों में कथित मानवाधिकार उल्लंघन, हिरासत में मौतों और अत्यधिक भीड़भाड़ की संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वतंत्र समीक्षा की मांग की है। अपील में दावा किया गया है कि लगभग चार लाख बंदियों को बिना जमानत या औपचारिक आरोप के हिरासत में रखा गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बांग्लादेश की जेलों में बंदियों की संख्या इससे काफी कम बताई जाती है, हालांकि जेलें क्षमता से अधिक भरी हुई हैं और बड़ी संख्या में कैदी विचाराधीन हैं। मानवाधिकार संगठनों ने भी लंबे समय से बिना मुकदमे हिरासत और जेलों में मौतों की शिकायतें दर्ज की हैं।
भारत के लिए बड़ा सुरक्षा अलर्ट
वहीं, क्षेत्र की निगरानी कर रहे शीर्ष खुफिया सूत्रों का कहना है कि अगर बांग्लादेश में अस्थिरता और कट्टरपंथ गहराता रहा, तो इसका सीधा असर भारत की आंतरिक सुरक्षा पर पड़ सकता है। यह चिंता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि बांग्लादेश भारत के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक सिलीगुड़ी कॉरिडोर के निकट है। इस संकरे भू-भाग को 'चिकन नेक' कहा जाता है। यही गलियारा भारत के मुख्य हिस्से को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। किसी भी लंबी अस्थिरता से सीमा पर ऐसे अंतराल बन सकते हैं, जिनका फायदा बाहरी शत्रुतापूर्ण ताकतें उठाने की कोशिश कर सकती हैं।
लूटे गए हथियारों का खतरा
एक और बड़ी चिंता हथियारों के गोदामों की लूट के बाद हथियारों के कथित प्रसार की है। सूत्रों द्वारा उद्धृत खुफिया आकलन के अनुसार, तस्करी या लूटे गए हथियार भारत के अवैध हथियार बाजार में पहुंच सकते हैं। इससे पूर्वोत्तर के विद्रोही समूहों और संगठित आपराधिक गिरोहों तक आधुनिक हथियार पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि सीमा पार हथियारों की आवाजाही केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक खतरा है।
जिहादी नेटवर्क पर कड़ी नजर
भारतीय सुरक्षा एजेंसियां बांग्लादेश स्थित चरमपंथी नेटवर्क पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। चिंता के केंद्र में जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी), उससे अलग हुआ नियो-जेएमबी और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम, जिसे अंसार अल-इस्लाम भी कहा जाता है, शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि ये नेटवर्क ऑनलाइन प्रचार और जमीनी भर्ती दोनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे भारत के सीमावर्ती जिलों, खासकर पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में कट्टरपंथी सोच फैलने की आशंका है। डर केवल आतंकवादी हमलों तक सीमित नहीं है। एजेंसियां यह भी जांच रही हैं कि क्या ये नेटवर्क संवेदनशील इलाकों में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा सकते हैं और सामाजिक सद्भाव बिगाड़ सकते हैं।
नई दिल्ली की नजर इतनी गहरी क्यों?
भारत के लिए यह केवल बांग्लादेश का आंतरिक राजनीतिक संकट नहीं है। राजनीतिक अस्थिरता, कट्टरपंथ, हथियारों का प्रसार, चरमपंथी नेटवर्क और सीमा की कमजोरियां एक साथ मिलकर व्यापक सुरक्षा चुनौती पैदा कर सकती हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि जिहादी नेटवर्क, अवैध हथियार तस्करी, संगठित अपराध और शत्रुतापूर्ण बाहरी तत्व एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। अगर ऐसा समन्वय बना, तो इसका असर केवल सीमावर्ती राज्यों तक सीमित नहीं रहेगा। यही कारण है कि भारतीय एजेंसियां स्थिति पर लगातार निगरानी रख रही हैं।


