पहले ईंधन की मार, अब दाने-दाने पर आफत; ईरान जंग से दुनियाभर में क्यों खाद्य संकट के आसार
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है, तो आने वाले महीनों में फर्टिलाइजर की कीमतों में और वृद्धि हो सकती है, जिससे दुनिया के कई देशों में कृषि लागत बढ़ेगी और अंततः खाद्यान्न महंगे हो सकते हैं।

मिडिल-ईस्ट में चल रहा संघर्ष अब वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बनता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान में युद्ध की स्थिति अगर लंबी चली तो दुनिया भर में फर्टिलाइजर (खाद) की आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है, जिससे कृषि उत्पादन और खाद्यान्न कीमतों पर व्यापक असर पड़ सकता है और अगर ऐसा हुआ तो दुनिया की एक बड़ी आबादी दाने-दाने को मोहताज हो सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार मध्य-पूर्व क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े फर्टिलाइजर संयंत्रों और उनके कच्चे माल का प्रमुख केंद्र है। वैश्विक व्यापार का लगभग 25 से 35 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से गुजरता है। यह संकरा समुद्री मार्ग एक ओर ईरान से घिरा हुआ है और मौजूदा युद्ध की स्थिति में जहाजों के लिए लगभग बंद हो गया है। इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में फर्टिलाइजर से जुड़े कच्चे माल की आपूर्ति बाधित हो रही है। ईरान खुद भी यूरिया का एक बड़ा निर्यातक देश है। ऐसे में दुनिया भर में खाद आपूर्ति में बड़ा संकट पैदा हो चुका है।
यूरिया निर्यात में चौथे स्थान पर ईरान
CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर यूरिया निर्यात में रूस, मिस्र और सऊदी अरब के बाद ईरान चौथे स्थान पर है। चूंकि सऊदी अरब का निर्यात भी उसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है, इसलिए उस पर भी इस संकट का प्रभाव पड़ रहा है। उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार युद्ध शुरू होने के बाद से मिस्र में यूरिया की कीमतों में एक-तिहाई से अधिक की वृद्धि हो चुकी है। इसके अलावा फर्टिलाइजर निर्माण में उपयोग होने वाले सल्फर की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं।
आधे सल्फर निर्यात मध्य-पूर्व के देशों से
विशेषज्ञ बताते हैं कि दुनिया के लगभग आधे सल्फर निर्यात मध्य-पूर्व के देशों से आते हैं, इसलिए वहां की अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ता है। ऊर्जा अवसंरचना पर हमलों ने भी स्थिति को जटिल बना दिया है। क्षेत्र में गैस उत्पादन प्रभावित होने लगा है, जबकि प्राकृतिक गैस फर्टिलाइजर बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इस कारण कई उत्पादकों को उत्पादन घटाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।ईरान
विकासशील देशों के लिए गंभीर चुनौती
नॉर्वे की प्रमुख रासायनिक कंपनी Yara International के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Svein Tore Holsether ने चेतावनी दी है कि “हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक खाद्य उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। फर्टिलाइज़र कोई साधारण वस्तु नहीं है, क्योंकि दुनिया के लगभग आधे खाद्य उत्पादन का आधार यही है।” विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है, तो आने वाले महीनों में फर्टिलाइज़र की कीमतों में और वृद्धि हो सकती है, जिससे दुनिया के कई देशों में कृषि लागत बढ़ेगी और अंततः खाद्यान्न महंगे हो सकते हैं। यह स्थिति विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।
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