बांग्लादेश में पहले हिंदू निशाने पर, अब कट्टरपंथियों का नया टारगेट मुसलमान; सत्ता के साथ बदला पैटर्न?
बांग्लादेश में कट्टरपंथी हिंसा अब सूफी संतों और उनकी मजारों तक पहुंच गई है। मुहम्मद यूनुस के अंतरिम शासन में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए संगठित हमलों के बाद नई सरकार बनने के बावजूद स्थिति नहीं सुधरी। अब धर्मनिरपेक्ष सूफी परंपरा को निशाना बनाया जा रहा है।

बांग्लादेश में कट्टरपंथी ताकतें तेजी से सिर उठा रही हैं। हिंदू अल्पसंख्यकों पर लगातार हमलों के बाद अब सूफी संतों, मजारों और उनकी परंपराओं को निशाना बनाया जा रहा है। मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान शुरू हुए टारगेटेड हमले नई सरकार बनने के बावजूद रुके नहीं हैं, बल्कि और संगठित रूप लेते जा रहे हैं। सेंटर फॉर सूफी हेरिटेज की ताजा फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 के पहले छह महीनों (1 जनवरी से 30 जून) में बांग्लादेश में कम से कम छह सूफी मजारों पर हमले या धमकियां दर्ज की गई हैं। इन घटनाओं में एक पीर की हत्या, मजारों में तोड़फोड़, आगजनी और श्रद्धालुओं पर लाठीचार्ज शामिल है।
कुश्तिया में सबसे डरावनी घटना
अप्रैल महीने में कुश्तिया जिले में हुई घटना को सूफी समुदाय सबसे ज्यादा डरावनी बता रहा है। पीर अब्दुर रहमान को उनकी अपनी मजार के अंदर ही करीब 300 लोगों की भीड़ ने घेर लिया। भीड़ ने मजार पर चढ़ाई की, तोड़फोड़ की, आग लगा दी और पीर साहब की हत्या कर दी। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक हमलावरों का नारा था कि यह 'शिर्क और बिदअत' (बहुदेववाद और नवाचार) का केंद्र है। इससे ठीक एक महीने पहले मार्च में सिलहट जिले में हजरत इब्राहिम शाह की मजार पर उर्स के मौके पर हमला हुआ। करीब 100 लोगों की भीड़ ने संगीत के विरोध में श्रद्धालुओं पर हमला बोल दिया। हमले में तीन लोग गंभीर रूप से घायल हुए और पास की मस्जिद को भी नुकसान पहुंचा। हमलावरों ने कहा कि उर्स के दौरान बज रहे भक्ति गीत और संगीत इस्लाम के खिलाफ हैं।
राजधानी ढाका में भी तनाव
हिंसा सिर्फ दूरदराज के जिलों तक सीमित नहीं रही। राजधानी ढाका के मीरपुर इलाके में शाह अली बगदादी मजार पर भी हमला हुआ। सीएनएन न्यूज18 की रिपोर्ट के अनुसार, एक वीडियो में साफ-साफ देखा गया कि हमलावर सूफी अनुयायियों पर हरी लाठियों से लगातार प्रहार कर रहे थे। इस दौरान स्थानीय दुकानदारों और श्रद्धालुओं को भी नहीं बख्शा गया। इसके अलावा कुश्तिया की हजरत शाह दरगाह शरीफ, बारिशाल की हबीब शाह दरबार शरीफ और चटगांव की हजरत लाल मिया शाह मजार भी हालिया हमलों की सूची में शामिल हैं।
यूनुस शासन में बड़े पैमाने पर हमले
रिपोर्ट के मुताबिक यह ट्रेंड यूनुस सरकार के दौरान और ज्यादा खतरनाक हो गया था। उस समय 97 मजारों पर हमले हुए, जिनमें तीन लोगों की मौत हुई और 468 लोग घायल हुए। सबसे चौंकाने वाली घटना राजबाड़ी जिले के नूरल पगला मजार की है, जहां हमलावरों ने पीर की कब्र खोदकर लाश बाहर निकाली, उसे लाठियों और जूतों से पीटा और फिर सड़क पर जला दिया। हमले के बाद पहले से तय रैली निकाली गई, लेकिन जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।
सूफी परंपरा पर हमला
बांग्लादेश का इस्लाम सदियों से सूफी संतों, मजारों, उर्स, जिक्र, कविता और लोक संगीत से जुड़ा रहा है। सूफीवाद आध्यात्मिक भक्ति, अल्लाह से व्यक्तिगत संबंध और सहिष्णुता पर आधारित है, जिसने बंगाल की साझा सांस्कृतिक पहचान को आकार दिया। लेकिन अब कट्टरपंथी समूह इसे 'गैर-इस्लामी' करार देकर मिटाने पर तुले हुए हैं। प्रसिद्ध बाउल कलाकार असगोर अली ने नेत्र न्यूज से बातचीत में कहा कि किसी व्यक्ति को कब्र से निकालना, लाठियों और जूतों से पीटना और फिर लाश को सड़क पर जला देना… यह किसी इंसान का काम नहीं हो सकता। दूसरी बाउल कलाकार नूपुर नाडिया ने दुख जताते हुए बताया कि हम महीने में कम से कम 15-20 शो करते थे। अब वह सब खत्म हो गया है। हमारी आवाज दबा दी जा रही है।
वहीं, सूफी संगठनों का कहना है कि ये हमले कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं। हिंदू मंदिरों और घरों पर हुए हमलों के बाद अब सूफी परंपरा को निशाना बनाकर बांग्लादेश की बहुलवादी सांस्कृतिक विरासत को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। स्थानीय प्रशासन और नई सरकार पर सूफी समुदाय आरोप लगा रहा है कि वे हमलावरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। यही कारण है कि आये दिन हमले हो रहे हैं।
लेखक के बारे में
Devendra Kasyapदेवेन्द्र कश्यप पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगस्त 2025 से वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। संस्थान की होम टीम का वह एक अहम हिस्सा हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर रहती है। वायरल कंटेंट के साथ-साथ लीक से हटकर और प्रभावशाली खबरों में उनकी विशेष रुचि है।
देवेन्द्र ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2013 में महुआ न्यूज से की। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में रिपोर्टिंग की। इस दौरान राजनीति के साथ-साथ क्राइम और शिक्षा बीट पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने जी न्यूज (बिहार-झारखंड) में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2015 में ईनाडु इंडिया के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया।
मूल रूप से बिहार के भोजपुरी बेल्ट रोहतास जिले के रहने वाले देवेन्द्र कश्यप ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पटना से प्राप्त की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और MCU भोपाल से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रवास कर रहे हैं।
और पढ़ें
लेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


