
ट्रंप ने सऊदी अरब को घोषित किया 'प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी', पाक को भी मिला है ये दर्जा; क्यों खास?
अमेरिकी राष्ट्रपति ने सऊदी को प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी का दर्जा भी देने की घोषणा की। इस दौरान दोनों देशों ने एफ-35 लड़ाकू विमानों और लगभग 300 अमेरिकी टैंकों की खरीद सहित कई व्यापारिक और रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार रात वाइट हाउस में एक भव्य डिनर के दौरान सऊदी अरब को 'मेजर नॉन-नाटो अलाई' यानी 'प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी' देश का दर्जा दे दिया। यह घोषणा सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ हुई मीटिंग के बाद आई, जो अमेरिका-सऊदी रिश्तों को नई ऊंचाई देने का संकेत है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पाकिस्तान को भी 2004 से यही दर्जा मिला हुआ है? दोनों देशों के लिए यह स्टेटस क्यों खास है? आइए समझते हैं कि यह दर्जा क्या है, कैसे मिलता है और क्यों दुनिया की सुपरपावर अमेरिका इसे इतना महत्व देती है।
सबसे पहले- 'मेजर नॉन-नाटो अलाई' क्या होता है?
कल्पना कीजिए, NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) अमेरिका का सबसे करीबी दोस्तों का क्लब है- जहां 32 देश मिलकर 'एक दूसरे की' रक्षा करते हैं। लेकिन दुनिया बड़ी है और अमेरिका के कई ऐसे दोस्त हैं जो NATO के सदस्य नहीं हैं, फिर भी रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं। ऐसे ही दोस्तों के लिए 1987 में अमेरिकी कानून (सेक्शन 2350a) ने 'मेजर नॉन-नाटो अलाई' का कॉन्सेप्ट बनाया। 1996 में इसे और मजबूत किया गया।
'नॉन-नाटो मेजर अलाई' - यानी NATO के बाहर का बड़ा सहयोगी देश। यह कोई सैन्य गठबंधन नहीं है जहां अमेरिका हमला होने पर तुरंत मदद भेजे। लेकिन यह दर्जा मिलने पर देश को अमेरिका से मिलिट्री और इकोनॉमिक फायदे मिलते हैं, जो दूसरे देशों को नहीं मिलते। अमेरिकी विदेश विभाग कहता है- यह दर्जा अमेरिका की दोस्ती का मजबूत प्रतीक है।
फिलहाल 20 देशों को यह दर्जा है, जैसे ऑस्ट्रेलिया, जापान, इजरायल, मिस्र, जॉर्डन, कुवैत, कतर, मोरक्को, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, थाइलैंड, ब्राजील, अर्जेंटीना, कोलंबिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, ट्यूनिशिया, बहरीन, केन्या और अब सऊदी अरब।
ट्रंप का सऊदी को तोहफा: क्यों और कैसे?
ट्रंप ने सऊदी को यह दर्जा देते हुए कहा- हमारी मिलिट्री कोऑपरेशन को नई ऊंचाई देने के लिए सऊदी को 'मेजर नॉन-नाटो अलाई' बनाना जरूरी था। यह घोषणा वाइट हाउस के ईस्ट रूम में ब्लैक-टाई डिनर के दौरान हुई, जहां सऊदी प्रिंस और ट्रंप ने स्ट्रैटेजिक डिफेंस एग्रीमेंट साइन किया।
क्यों मिला?
रणनीतिक महत्व: सऊदी मिडिल ईस्ट का तेल का भंडार है। अमेरिका ईरान के खिलाफ सऊदी को मजबूत बनाना चाहता है। ट्रंप ने गाजा में शांति प्लान के लिए सऊदी की मदद मांगी है, जहां सऊदी रिकंस्ट्रक्शन फंडिंग दे सकता है।
इकोनॉमिक डील: सऊदी प्रिंस ने अमेरिका में निवेश को 600 अरब डॉलर से बढ़ाकर 1 ट्रिलियन डॉलर करने का वादा किया। बदले में, अमेरिका सऊदी को F-35 फाइटर जेट्स, टैंक्स, AI टेक्नोलॉजी और सिविल न्यूक्लियर एनर्जी देगा।
ट्रंप की पॉलिसी: ट्रंप ने सऊदी को हमेशा प्राथमिकता दी। 2017 में उनके पहले विदेश यात्रा का पहला पड़ाव सऊदी था। 2018 के पत्रकार जमाल खशोगी मर्डर पर भी ट्रंप ने सऊदी को क्लीन चिट दे दी।
यह दर्जा सऊदी को 20वां 'मेजर नॉन-नाटो अलाई' बनाता है। इससे पहले, सऊदी के पड़ोसी जैसे इजरायल, कतर, कुवैत, बहरीन, जॉर्डन, मिस्र और ट्यूनिशिया को यह मिल चुका है।
पाकिस्तान का पुराना दर्जा: 2004 से साथी, लेकिन विवादों में
अब बात पाकिस्तान की। 2004 में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 9/11 हमलों के बाद पाक को 'मेजर नॉन-नाटो अलाई' बनाया। क्यों? क्योंकि पाक ने अफगानिस्तान में तालिबान को उखाड़ फेंकने में अमेरिका की मदद की- एयरबेस दिए, अल-कायदा के 500 से ज्यादा सदस्यों को गिरफ्तार किया।
लेकिन यह रिश्ता आसान नहीं रहा:
पाक पर तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को शेल्टर देने का आरोप लगा। 2011 में ओसामा बिन लादेन को पाक में मारने के बाद रिश्ते खराब हुए। 2023 में अमेरिकी कांग्रेस में बिल आया कि पाक का दर्जा छीन लिया जाए। फिर भी, पाक को F-16 जेट्स, मिलिट्री एड और ट्रेनिंग मिली। अमेरिका ने कहा- यह दर्जा पाक की आतंकवाद विरोधी मदद का इनाम था। 2025 में भी पाक को यह दर्जा है, लेकिन ट्रंप के सऊदी फोकस से पाक को चिंता हो सकती है। कुछ अमेरिकी सांसद कहते हैं- पाक चीन के करीब जा रहा है, दर्जा हटाना चाहिए।
फायदे: क्या मिलता है, जो दूसरे देशों को नहीं?
मेजर नॉन-नाटो अलाई (MNNA) का दर्जा मिलने वाले देश को अमेरिका से कई ऐसे विशेष फायदे मिलते हैं जो सामान्य देशों को नहीं मिलते। सबसे बड़ा फायदा हथियारों की खरीद में छूट और तेज डिलीवरी है- अमेरिका के सबसे एडवांस्ड हथियार (जैसे F-35, पैट्रियट मिसाइल सिस्टम) भी बिना लंबी जांच-पड़ताल के मिल सकते हैं, और पुराने लेकिन काम के हथियार प्राथमिकता के साथ मुफ्त या बहुत कम कीमत पर दिए जाते हैं। MNNA देश अमेरिका के साथ मिलिट्री टेक्नोलॉजी पर जॉइंट रिसर्च और डेवलपमेंट कर सकता है, काउंटर-टेररिज्म उपकरणों के लिए अलग से फंडिंग पा सकता है, और अमेरिकी सेना के साथ बड़े स्तर की संयुक्त ट्रेनिंग कर सकता है जिसमें खर्च भी शेयर होता है।
अमेरिकी कंपनियां MNNA देशों में हथियारों का रखरखाव और रिपेयर का ठेका ले सकती हैं, और MNNA देश की अपनी कंपनियां पेंटागन के मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट्स में बोली लगा सकती हैं। अमेरिका अपने हथियार और गोला-बारूद MNNA देश की जमीन पर पहले से स्टोर कर सकता है ताकि जरूरत पड़े तो तुरंत इस्तेमाल हो। सबसे महत्वपूर्ण- लोन, क्रेडिट और मिलिट्री फाइनेंशियल मदद बहुत आसान शर्तों पर मिलती है। कुल मिलाकर यह दर्जा एक तरह का VIP पासपोर्ट है जो अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग को बहुत तेज और सस्ता बना देता है, जबकि बाकी देशों को यही चीजें पाने के लिए सालों इंतजार करना पड़ता है या कई बार मिलती ही नहीं।
ये फायदे NATO सदस्यों जितने नहीं, लेकिन नॉन-नाटो देशों के लिए 'गेम चेंजर' हैं। उदाहरण: पाक को F-16 मिले, सऊदी को F-35। लेकिन याद रखें, यह कोई सिक्योरिटी गारंटी नहीं है कि अमेरिका मदद करेगा या नहीं।

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