ना लाइट और ना इंसान, अंधेरे में ही जबरदस्त प्रोडक्शन कर रही हैं चीन की ‘डार्क फैक्ट्री’
चीन में इन दिनों डार्क फैक्ट्री का चलन बढ़ रहा है। इन फैक्ट्रियों में ना तो इंसान होते हैं और ना ही काम करने वाले लोग। सारा काम ऑटोमेटेड मशीन्स और रोबोड के जरिए होता है। रोजगार के लिए ये फैक्ट्रियां बड़ा खतरा हैं।

इंसानों से काम करवाने के लिए उनकी बहूत सारी जरूरतों का ध्यान देना होता है। वहीं रोबोट से काम करवाने में केवल बिजली की जरूरत है। चीन की में इन दिनों डार्क फैक्ट्री की चलन हो गया है। इन फैक्ट्रियों में बिना रुके 24 घंटे काम होता है। यहां ना तो पानी की जरूरत है और ना ही लाइट्स की और प्रोडक्शन भी बरदस्त। चीन की यह कंपनी हर सेकंड एक फोन बनाती है। यहां इंसान नहीं बल्कि रोबोट काम करते हैं। रोबोट्स को देखने के लिए लाइट की भी जरूरत नहीं होती है और इसलिए इन्हें डार्क फैक्ट्री कहा जाता है।
बता दें कि चीन में मानव संसाधन बहुत महंगा हो रहा है। बुजुर्ग होती आबादी के लिए पेंशन और अन्य सुविधाओं की भी चुनौती है। ऐसे में चीन की कंपनियां इसका तोड़ निकालने में जुटी हैं। अब इन फैक्ट्रियों में गिने चुने ही इंसान दिखेंगे। वह भी रात में कोई नहीं दिखेगा। सिर्फ रोबोट काम करेंगे। यहां तक कि लाइट के स्विच ऑफ कर दिए जाएंगे और अंधेरे में भी काम होता रहेगा।
365 दिन बिना रुके काम
जानकारी के मुताबिक चीन की इन फैक्ट्रियों में बिना रुके 365 दिन काम होता है। एक बड़ी रोबोट क्रांति है। आने वाले समय में यह इंसानों के रोजगार खत्म कर सकती है। ये फैक्ट्रियां पूरी तरह से ऑटोमेटिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट हैं। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स का जमकर इस्तेमाल किया गया है।
क्या हैं डार्क फैक्ट्री
डार्क फैक्ट्री ऐसे कारखाने हैं जहां इंसानों की जरूरत ही नहीं है। सारे काम ऑटोमैटिक मशीनों और रोबोट्स से होते हैं। ऐसे में यहां रात में रोशनी की जरूरत नहीं होती और इसलिए इन्हें डार्क फैक्ट्री कहा जाता है। यह एआई से स्वचलित फैक्ट्री होती है। कई मामलों को नियंत्रित करने के लिए सीमित इंसानों को भर्ती किया जाता है।
बता दें कि तकनीक के मामले में चीन का कोई जो़ड़ नहीं है। वहीं चीन इन दिनों बुजुर्ग होती आबादी और लागत की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में चीन ने इस चुनौती का काट निकाला है। हालांकि इससे चीन में लोगों के रोजगार कम होंगे और गरीबी भी बढ़ेगी। चीन में शाओमी फोन्स की भी ऑटोमेटेड डार्क फैक्ट्री बनाई गई है। यह फैक्ट्री हर तीन सेकंड में एक स्मार्टफोन बना देती है।
इसके अलावा फॉक्सकॉन कंपनी भी इसी तरह काम करने लगी है। यह कंपनी ऐपल और आईफोन की एसेसरीज बनाती है। ईवी और सेमीकडक्टर्स की फैक्ट्रियां भी अब इसी तर्ज पर काम करने लगी हैं। जानकारों का कहना है कि आने वाले समये में ये डार्क फैक्ट्रियां लोगों के रोजगार खा जाएंगी। ऐसे में पूंजी कुछ लोगों के पास ही सिमटकर रह जाएगी
लेखक के बारे में
Ankit Ojhaविद्यालयी जीवन से ही कलात्मक अभिव्यक्ति, विचारशील स्वभाव और मिलनसार व्यक्तित्व और सामान्य के अंदर डुबकी लगाकर कुछ खास खोज लाने का कौशल पत्रकारिता के लिए अनुकूल साबित हुआ। अंकित ओझा एक दशक से डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले अंकित ओझा समाचारों की दुनिया में तथ्यों के महत्व के साथ ही संवेदनशीलता के पक्ष को साधने में निपुण हैं। पिछले चार साल से हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के 'लाइव हिन्दुस्तान' के लिए चीफ कॉन्टेंट प्रड्यूसर पद पर कार्य कर रहे हैं। इससे पहले 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'इंडियन एक्सप्रेस' ग्रुप के साथ भी कार्य कर चुके हैं।
राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, राज्य और सामाजिक सरोकारों की खबरों के संपादन में लंबा अनुभव होने के साथ ही अपने-आसपास की घटनाओं में समाचार तत्व निकालने की अच्छी समझ है। घटनाओं और समाचारों से संबंधित फैसले लेने और त्वरित समाचार प्रकाशित करने में विशेष योग्यता है। इसके अलावा तकनीक और पाठकों की बदलती आदतों के मुताबिक सामग्री को रूप देने के लिए निरंतर सीखने में विश्वास करते हैं। अंकित ओझा की रुचि राजनीति के साथ ही दर्शन, कविता और संगीत में भी है। लेखन और स्वरों के माध्यम से लंबे समय तक आकाशवाणी से भी जुड़े रहे। इसके अलावा ऑडियन्स से जुड़ने की कला की वजह से मंचीय प्रस्तुतियां भी सराही जाती हैं।
अकादमिक योग्यताः अंकित ओझा ने प्रारंभिक शिक्षा नवोदय विद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया मिल्ल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में ही ग्रैजुएशन किया है। इसके बाद भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमए किया है। जामिया में अध्ययन के दौरान ही इटैलियन और उर्दू भाषा में भी कोर्स किए हैं। इसके अलावा पंजाबी भाषा की भी अच्छी समझ रखते हैं। विश्वविद्यालय में NCC का 'C सर्टिफिकेट' भी प्राप्त किया है। IIMC और ऑक्सफर्ड से स्वास्थ्य पत्रकारिता का सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया है।
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