ग्रीनलैंड के लिए चीन बड़ा खतरा... डोनाल्ड ट्रंप के दावे में कितना दम है?

Jan 13, 2026 03:57 pm ISTDevendra Kasyap लाइव हिन्दुस्तान
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावा के बीच सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या चीन वाकई ग्रीनलैंड के लिए इतना बड़ा खतरा है? विश्लेषकों और हालिया रिपोर्टों के अनुसार, आर्कटिक क्षेत्र में चीन एक छोटा और सीमित खिलाड़ी है।

ग्रीनलैंड के लिए चीन बड़ा खतरा... डोनाल्ड ट्रंप के दावे में कितना दम है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार ग्रीनलैंड पर जोरदार दावा कर रहे हैं। उन्होंने बार-बार कहा है कि अमेरिका को ग्रीनलैंड को 'हासिल करना' होगा, क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो रूस या चीन वहां कब्जा कर लेंगे। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए 'बहुत जरूरी' है, और यह 'रूसी और चीनी जहाजों से घिरा हुआ' है। वे कहते हैं कि अमेरिका को 'मालिकाना हक' चाहिए, क्योंकि लीज या समझौते से रक्षा नहीं हो सकती। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वे रूस या चीन को 'पड़ोसी' नहीं बनने देंगे।

अमेरिकी राष्ट्रपति के दावा के बीच सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या चीन वाकई ग्रीनलैंड के लिए इतना बड़ा खतरा है? विश्लेषकों और हालिया रिपोर्टों के अनुसार, आर्कटिक क्षेत्र में चीन एक छोटा और सीमित खिलाड़ी है। ट्रंप द्वारा बताए गए 'हर जगह चीनी विध्वंसक और पनडुब्बियां' जैसे दावों का कोई ठोस सबूत नहीं मिलता। वेसल ट्रैकिंग डेटा ( MarineTraffic) से पता चलता है कि ग्रीनलैंड के आसपास चीनी या रूसी जहाजों की मौजूदगी नहीं है। कई विशेषज्ञों, जैसे डेनमार्क और यूरोपीय अधिकारियों ने इसे 'बकवास' बताया है।

आर्कटिक में चीन की वास्तविक स्थिति क्या है?

दरअसल, ट्रंप का दावा है कि अमेरिकी हस्तक्षेप के बिना ग्रीनलैंड में चीनी सैन्य उपस्थिति बढ़ जाएगी, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। चीन की आर्कटिक में सैन्य मौजूदगी बहुत कम है और मुख्य रूप से रूस के सहयोग पर निर्भर है। 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद रूस-चीन संयुक्त अभियानों में थोड़ी वृद्धि हुई है, जैसे 2024 में अलास्का के पास बमवर्षक गश्त। चीन के पास कुछ हिमभंजक जहाज (आइसब्रेकर) हैं, जो समुद्र तल मानचित्रण कर सकते हैं, और आर्कटिक अवलोकन के लिए उपग्रह भी हैं, लेकिन बीजिंग इन्हें वैज्ञानिक अनुसंधान बताता है।

चीन का प्रभाव बढ़ रहा है या नहीं?

मर्कटोर इंस्टीट्यूट की हेलेना लेगार्डा जैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर चीन की सेना या जुड़े संगठन क्षेत्र में नियमित उपस्थिति बनाते हैं, तो यह सुरक्षा चिंता का विषय हो सकता है। हालांकि चीन इस आर्कटिक को भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का उभरता क्षेत्र मानता है। 2018 में शुरू की गई 'पोलर सिल्क रोड' परियोजना बेल्ट एंड रोड का आर्कटिक हिस्सा है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 'ध्रुवीय महाशक्ति' बनना है। चीन ने आइसलैंड और नॉर्वे में अनुसंधान केंद्र बनाए हैं, और रूसी एलएनजी तथा स्वीडिश रेलवे जैसी परियोजनाओं में निवेश किया है।

हालांकि, चीन को कई जगह विरोध का सामना भी करना पड़ा है। ग्रीनलैंड में पुरानी नौसैनिक अड्डे या फिनलैंड में हवाई अड्डे खरीदने के प्रस्ताव असफल रहे। अमेरिका के दबाव में ग्रीनलैंड ने 2019 में 5G के लिए हुआवेई को ठुकराया। रूस अपवाद है, जहां चीन उत्तरी तट पर संसाधनों और बंदरगाहों में भारी निवेश कर रहा है।

चीन क्या हासिल करना चाहता है?

ग्रीनलैंड में दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के बड़े भंडार हैं (दुनिया का आठवां सबसे बड़ा), जो इलेक्ट्रिक वाहनों और सैन्य उपकरणों के लिए महत्वपूर्ण हैं। चीन इन सामग्रियों का वैश्विक उत्पादन में अग्रणी है, लेकिन ग्रीनलैंड में उसके प्रयास सीमित सफल रहे। क्वानेफजेल्ड प्रोजेक्ट 2021 में पर्यावरणीय चिंताओं से रुका, और 2024 में एक अन्य भंडार अमेरिकी पैरवी के बाद न्यूयॉर्क की फर्म को बेचा गया। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले की आशंकाएं (चीनी निवेश से प्रभाव बढ़ना) साकार नहीं हुईं।

Devendra Kasyap

लेखक के बारे में

Devendra Kasyap

देवेन्द्र कश्यप पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगस्त 2025 से वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। संस्थान की होम टीम का वह एक अहम हिस्सा हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर रहती है। वायरल कंटेंट के साथ-साथ लीक से हटकर और प्रभावशाली खबरों में उनकी विशेष रुचि है।

देवेन्द्र ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2013 में महुआ न्यूज से की। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में रिपोर्टिंग की। इस दौरान राजनीति के साथ-साथ क्राइम और शिक्षा बीट पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने जी न्यूज (बिहार-झारखंड) में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2015 में ईनाडु इंडिया के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया।

मूल रूप से बिहार के भोजपुरी बेल्ट रोहतास जिले के रहने वाले देवेन्द्र कश्यप ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पटना से प्राप्त की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और MCU भोपाल से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रवास कर रहे हैं।

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