अमेरिका के साथ तो खेला हो गया! क्लाउड AI से मिसाइल बना रहे ईरान के दोस्त हूती?

लाइव हिन्दुस्तान, सना
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Anthropic की रिपोर्ट में यमन स्थित हूती हथियार सेल द्वारा AI मॉडल Claude के इस्तेमाल का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक AI की मदद से मिसाइल और गाइडेड रॉकेट के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करने का काम किया गया।

हूती विद्रोही मिसाइल बनाने में ले रहे AI की मदद? Anthropic की रिपोर्ट ने चौंकाया
हूती विद्रोही मिसाइल बनाने में ले रहे AI की मदद? Anthropic की रिपोर्ट ने चौंकाया

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में अमेरिका सबसे आगे होने का दावा करता है। देखा जाए तो ये दावा काफी हद तक सही भी है। चैटजीपीट से लेकर एंथ्रोपिक और ग्रोक तक, सब अमेरिकी एआई कंपनियां हैं। अब एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने अमेरिका को परेशान कर दिया है। कहा जा रहा है कि इन्हीं एआई कंपनियों का इस्तेमाल आतंकी संगठन मिसाइल बनाने के लिए कर रहे हैं। इससे लग रहा है कि अमेरिका के साथ खेला हो गया है।

खबरों की मानें तो यमन स्थित हूती समूह मिसाइलें बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर रहा है। दिग्गज अमेरिकी AI कंपनी एंथ्रोपिक की एक नई रिपोर्ट में यमन स्थित एक हथियार इंजीनियरिंग सेल का पता चलने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस समूह ने एंथ्रोपिक के AI मॉडल क्लाउड (Claude) का इस्तेमाल मिसाइलों और एक गाइडेड रॉकेट के लिए गाइडेंस सॉफ्टवेयर डेवलप करने में किया। हूती ईरान के खास दोस्त हैं और उन्हें ईरान से हर तरह की मदद मिलती है।

एंथ्रोपिक ने गुरुवार को जारी अपनी रिपोर्ट में बताया कि उसने चीन, रूस और यमन में ऐसे छह ऑपरेशनों को बाधित किया, जहां क्लाउड का इस्तेमाल पारंपरिक हथियारों के डेवलपमेंट, खुफिया जानकारी जुटाने या हथियारों की खरीद से जुड़े कामों में किया जा रहा था।

2,000 किमी से ज्यादा रेंज वाली मिसाइल पर काम

एंथ्रोपिक के मुताबिक, यमन में सक्रिय यह सेल कई मिसाइल कार्यक्रमों पर काम कर रहा था। इनमें एक मल्टी-स्टेज बैलिस्टिक मिसाइल भी शामिल थी, जिसकी बताई गई रेंज 2,000 किलोमीटर से ज्यादा थी।

इसके अलावा समूह एक मिसाइल सिस्टम पर भी काम कर रहा था, जिसे ‘R2000’ सेट के नाम से जाना जाता है। इसमें हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल का एक वेरिएंट भी शामिल था। हालांकि, एंथ्रोपिक को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि इस समूह ने सफलतापूर्वक कोई ऑपरेशनल हथियार तैयार कर लिया था।

Claude से कैसे लिया गया काम?

रिपोर्ट के अनुसार, इस यमन स्थित सेल ने क्लाउड कोड का इस्तेमाल मानव सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की जगह करते हुए उड़ने वाले वाहनों के लिए गाइडेंस, नेविगेशन और कंट्रोल सॉफ्टवेयर विकसित करने में किया।

इसमें कई तरह के काम शामिल थे:

  • ओपन-सोर्स ऑटोपायलट को फोन-क्लास फ्लाइट कंप्यूटर से जोड़ना
  • उड़ने वाले वाहन को नियंत्रित और स्थिर रखने के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करना
  • कंट्रोल और पोजिशन-एस्टिमेशन सॉफ्टवेयर लिखना
  • कंट्रोल सेटिंग्स को ट्यून करना
  • फर्मवेयर बिल्ड चलाना
  • फ्लाइट सिमुलेशन करना

एंथ्रोपिक ने बताया कि समूह एक साथ क्लाउड के कई इंस्टेंस का इस्तेमाल करता दिखाई दिया। अलग-अलग इंस्टेंस को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई थीं। एक का इस्तेमाल कोडिंग के लिए, दूसरे का रिसर्च के लिए और तीसरे का पहले इंस्टेंस द्वारा तैयार कोड की समीक्षा के लिए किया गया।

AI की सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देने की कोशिश

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समूह ने एंथ्रोपिक की सुरक्षा व्यवस्था को बार-बार चकमा देने की कोशिश की। इसके लिए उसने अपने काम का असली उद्देश्य छिपाया, गतिविधियों को कई अलग-अलग सेशन में बांटा और ऐसे तरीके अपनाए ताकि किसी एक बातचीत से पूरे हथियार कार्यक्रम की जानकारी सामने न आए। एंथ्रोपिक के मुताबिक, उसकी सुरक्षा व्यवस्था ने ऐसे कई अनुरोधों को रोक दिया, लेकिन सभी अनुरोधों को नहीं रोका जा सका।

गाइडेड रॉकेट का टेस्ट भी किया

एंथ्रोपिक ने बताया कि इस समूह ने एक गाइडेड रॉकेट का परीक्षण भी किया। हालांकि, यह टेस्ट सफल होता दिखाई नहीं दिया। टेस्ट के विफल होने के कुछ ही घंटों बाद समूह फिर Claude के पास पहुंचा और यह पता लगाने की कोशिश की कि आखिर क्या गलत हुआ था।

इसके बाद एंथ्रोपिक ने इस ऑपरेशन से जुड़े अकाउंट्स पर प्रतिबंध लगा दिया और इससे जुड़ी जानकारी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के साझेदारों के साथ साझा की। कंपनी को यह भी पता चला कि समूह ने पहले से ही एक ऐसा ऑफलाइन सिमुलेशन टूलकिट तैयार कर रखा था, जो क्लाउड या MATLAB जैसे इंजीनियरिंग सॉफ्टवेयर पर निर्भर नहीं था।

AI से हथियारों के विकास का काम आसान होने का खतरा

एंथ्रोपिक की रिपोर्ट में यमन वाला मामला पारंपरिक हथियारों से जुड़े चार ऑपरेशनों में शामिल है। दूसरे मामलों में ड्रोन स्वॉर्म के लिए सॉफ्टवेयर, टॉरपीडो को रोकने वाली प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर व एयर-डिफेंस सप्रेशन के लिए टारगेटिंग सॉफ्टवेयर से जुड़े काम शामिल थे।

कंपनी के मुताबिक, इन मामलों में AI का इस्तेमाल मुख्य तौर पर ऐसे हथियारों के सॉफ्टवेयर और फर्मवेयर को तैयार करने और बेहतर बनाने के लिए किया गया, जिनके हार्डवेयर और तकनीक तक संबंधित लोगों की पहले से पहुंच और विशेषज्ञता थी।

एंथ्रोपिक का कहना है कि AI जरूरी नहीं कि मौजूदा तकनीकी ढांचे की जगह ले रहा हो, लेकिन यह हथियारों के विकास में जरूरी मानवीय इंजीनियरिंग काम की मात्रा को कम कर सकता है। रिपोर्ट में कंपनी ने चेतावनी दी कि AI की बढ़ती तकनीकी क्षमताओं के साथ उसका गलत इस्तेमाल रोकना भी ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है।

मिसाइलों से आगे जैविक शोध को लेकर भी चिंता

एंथ्रोपिक ने अपनी जांच के दौरान संभावित रूप से खतरनाक जैविक शोध से जुड़े कई अन्य मामलों की भी पहचान की। इनमें बर्ड फ्लू, चिकनगुनिया, ऑर्थोपॉक्सवायरस और विषैले टॉक्सिन से संबंधित काम शामिल थे। कंपनी ने 30 दिनों की अवधि में संभावित रूप से चिंताजनक गतिविधियों से जुड़े करीब 35 अलग-अलग रिसर्च प्रयासों की पहचान की।

हालांकि, एंथ्रोपिक ने यह भी स्पष्ट किया कि वह यह तय नहीं कर सकी कि इन मामलों में शामिल लोगों का उद्देश्य नुकसान पहुंचाना था या वे वैध वैज्ञानिक शोध कर रहे थे। एक मामले में चिकनगुनिया वायरस की संक्रमण क्षमता और इम्यून सिस्टम से बचने की क्षमता पर गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च के लिए ग्रांट आवेदन तैयार करने में मदद शामिल थी। दूसरे मामले में यह शोध किया जा रहा था कि बर्ड फ्लू वायरस स्तनधारियों के अनुसार कैसे ढलते हैं और गंभीर बीमारी कैसे पैदा करते हैं।

एंथ्रोपिक ने कहा कि AI मॉडलों के सामने जैविक दुरुपयोग सबसे गंभीर जोखिमों में से एक बना हुआ है। कंपनी ने हाई-यील्ड विस्फोटकों और हथियारों के विकास से जुड़ी गतिविधियों की पहचान कर उन्हें रोकने के लिए नए क्लासिफायर भी पेश किए हैं। एंथ्रोपिक ने कहा है कि वह अपनी जांच से मिली जानकारी को अपनी सुरक्षा व्यवस्था में शामिल करती रहेगी और संबंधित खतरे से जुड़ी जानकारी सरकारों व अन्य संगठनों के साथ साझा करती रहेगी।

Amit Kumar

लेखक के बारे में

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डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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