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बांग्लादेश में दशकों तक रहा ‘बेगमों का वर्चस्व’, अब महिलाओं के चुनाव लड़ने पर भी संकट

बांग्लादेश में दशकों तक रहा ‘बेगमों का वर्चस्व’, अब महिलाओं के चुनाव लड़ने पर भी संकट

संक्षेप:

बांग्लादेश में आम चुनाव की सरगर्मी तेज है। आवामी लीग पर बैन लगने के बाद बीएनपी और जमात ए इस्लामी ही बड़ी पार्टी बनकर सामने आई हैं। बीएनपी ने 10 महिलाओं को टिकट दिया है, तो वहीं जमात ने एक भी महिला को उम्मीदवार नहीं बनाया है।

Feb 05, 2026 10:36 pm ISTUpendra Thapak लाइव हिन्दुस्तान
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Bangladesh elections: पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश इन दिनों चुनावी जोश में है। आवामी लीग की अनुपस्थिति में खालिदा जिया की बीएनपी और कट्टर इस्लामवादी पार्टी जमात के बीच में मुख्य मुकाबला है। 2024 में शेख हसीना को सत्ता से उखाड़ फेंकने वाले तथाकथित छात्र संगठन भी इस चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यही है कि पिछले तीन दशकों से बेगमों की लड़ाई का गवाह रहने वाले बांग्लादेश में चुनाव में महिलाओं की भागीदारी को लेकर क्या माहौल है। यह सवाल इसलिए भी है क्योंकि जमात जैसे संगठन ने एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। जमात की महिला संगठन ने कुरान का हवाला देते हुए पार्टी के इस निर्णय को सही ठहराने की कोशिश भी की।

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बांग्लादेश की स्थानीय मीडिया के मुताबिक कुछ दिनों में होने वाले चुनाव के लिए प्रत्याशियों की घोषणा हो चुकी है। लगभग चार दशक तक महिलाओं के हाथों में सत्ता रहने के बाद इस बार हालात यह हैं कि कुल मिलाकर 78 महिलाएं ही चुनाव लड़ रही हैं। इनमें से भी ज्यादातर महिलाएं वह हैं, जो कि अपने पीछे एक विरासत लेकर आती हैं। इनमें से ज्यादा अपने पति, भाई या पिता की राजनैतिक विरासत के लिए लड़ रही हैं।

बांग्लादेशी चुनाव आयोग आंकड़ों के मुताबिक मुख्य रूप से चुनाव लड़ रही राजनैतिक पार्टियों ने भी महिलाओं को टिकट देने में आनाकानी की है। 71 में से 61 महिलाओं को राजनैतिक दलों ने टिकट दिया है, वहीं दूसरी तरफ 17 महिलाएं निर्दलीय रूप से मैदान में उतरी हैं। गौरतलब है कि बांग्लादेशी चुनाव आयोग ने महिलाओं की भूमिका को बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन तमाम राजनैतिक दलों ने इसका पालन नहीं किया। इसके बाद 33 फीसदी महिलाओं को टिकट देने की बात को ठंड़े बस्ते में डाल दिया गया।

द डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश की अधिकांश महिलाएं पारिवारिक विरासत की वजह से चुनावी मैदान में हैं। इनमें से ऐसी महिलाएं लगभग न के बराबर हैं, जिन्होंने विश्वविद्यालय या जमीनी स्तर पर काम करके अपने लिए जगह बनाई हो। इसका सबसे बड़ा कारण ऐसे लोगों की जीतने की उम्मीद बहुत कम होना है। खालिदा जिया और शेख हसीना भी ऐसे ही उदाहरण हैं, जो अपने पिता और पति की विरासत को आगे बढ़ाती हुई नजर आई थीं।

जमात ने नहीं दिया एक भी टिकट

शेख हसीना की आवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोकने के बाद बांग्लादेश में मुख्य रूप से बीएनपी और जमात ही बड़ी पार्टियां नजर आती हैं। दोनों ही पार्टियों का एक बड़ा वोट बैंक है। इसमें से जमात ने एक भी महिला प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया है। पार्टी से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने बात को टालते हुए कहा कि जमात के गठबंधन के कुछ दलों ने महिलाओं को टिकट दिया है। पार्टी की महिला शाखा ने इस फैसले का बचाव करते हुए इसे इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार बताया। दूसरी तरफ खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी ने 10 महिलाओं को टिकट दिया है। इन दसों का संबंध किसी न किसी बड़े राजनैतिक परिवार से हैं।

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री के पद पर भले ही पिछले लगभग चार दशकों से दो बेगमों का वर्चस्व रहा हो। लेकिन नीचे के स्तर पर महिलाओं की उपस्थिति कुछ ज्यादा नहीं रही है। ऐतिहासिक रूप से भी बांग्लादेशी राजनीति में वंशवाद के अतिरिक्त ज्यादा महिलाएं ऊपर नहीं आ पाती हैं।

Upendra Thapak

लेखक के बारे में

Upendra Thapak

उपेंद्र ने डिजिटल पत्रकारिता की शुरुआत लाइव हिन्दुस्तान से की है। पिछले एक साल से वे होम टीम में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर कार्यरत हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024, ऑपरेशन सिंदूर और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की कवरेज की है। पत्रकारिता की पढ़ाई भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली (बैच 2023-24) से पूरी करने वाले उपेंद्र को इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, राजनीति, खेल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से जुड़े विषयों में गहरी रुचि है। स्नातक स्तर पर बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई करने के कारण उन्हें मेडिकल और वैज्ञानिक विषयों की भाषा की भी अच्छी समझ है। वे मूल रूप से मध्यप्रदेश के भिंड जिले के निवासी हैं।

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