तारिक रहमान की सरकार बनते ही टकराव शुरू; बांग्लादेश में फिर आंदोलन की तैयारी, 2 दलों ने छेड़ी रार
BNP के नेताओं का कहना है कि जुलाई चार्टर पर बेमन से साइन किया गया था। पार्टी को चार्टर के कई नियमों से दिक्कत है। BNP ने यह भी कहा है कि जुलाई चार्टर बनाते समय उससे सलाह नहीं ली गई थी।

बांग्लादेश में तारिक रहमान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली है। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने उन्हें एक समारोह में संसद भवन में प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। उनके साथ 13 अन्य कैबिनेट मंत्रियों ने भी शपथ ली है। दूसरी तरफ, विपक्षी जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन्स पार्टी (NCP) ने रहमान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इन दोनों दलों ने चेतावनी दी है कि अगर बीएनपी सरकार जुलाई चार्टर को नहीं अपनाती है तो देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू किए जाएंगे। हालांकि शुरुआती असहमति और बहिष्कार की चेतावनी के बाद दोनों दलों के सांसदों ने शपथ ग्रहण कर लिया।
बता दें कि तारिक रहमान की पार्टी BNP ने अपने सांसदों को कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल फॉर्म पर साइन करने से मना कर दिया था और तारिक रहमान समेत BNP के सभी सांसदों ने सिर्फ बांग्लादेशी संसद के सदस्य के तौर पर ही शपथ ली है। BNP का कहना है कि कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल के नियम अभी मौजूदा संविधान का हिस्सा नहीं हैं और इस पर संसद में विचार-विमर्श की जरूरत है। BNP ने मंगलवार को ऐलान किया कि उसके MP कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल के सदस्य के तौर पर शपथ नहीं लेंगे, जिसका मकसद जुलाई चार्टर रेफरेंडम में हुए बदलावों को शामिल करके बांग्लादेश के कॉन्स्टिट्यूशन को बदलना है। BNP के पुराने नेता सलाउद्दीन अहमद ने तारिक रहमान की मौजूदगी में पार्टी के फैसले का ऐलान किया।
दो शपथ प्रक्रियाओं से शुरू हुआ विवाद
दरअसल, यह विवाद दो अलग-अलग शपथ प्रक्रियाओं से जुड़ा है, जिन्हें सभी निर्वाचित सांसदों को लेना था। हाल ही में हुए चुनाव में मतदाताओं ने सांसदों का चुनाव करने के साथ-साथ जुलाई चार्टर पर भी जनमत संग्रह में भाग लिया था। चुनाव में बीएनपी ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया, हालांकि विपक्ष ने धांधली के आरोप लगाए। दूसरी ओर जुलाई चार्टर को लगभग 62 प्रतिशत समर्थन मिला, जिसका उद्देश्य संसद को सीमित अवधि के लिए संविधान संशोधन हेतु विशेष अधिकार देना है।
जुलाई चार्टर पर दस्तखत करने वाली BNP ने मारी पलटी
बीएनपी ने इस चार्टर पर हस्ताक्षर तो किए थे, लेकिन पार्टी नेतृत्व कई प्रावधानों को लेकर असहमति जताता रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि चार्टर तैयार करते समय उनसे सलाह नहीं ली गई। चुनाव और जनमत संग्रह एक ही दिन कराने का फैसला अंतरिम नेतृत्व द्वारा लिया गया था, जिसमें अर्थशास्त्री और नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस की भूमिका चर्चा में रही। सांसदों और सरकार के शपथ समारोह से पहले मंगलवार को BNP के वरिष्ठ नेता सलाउद्दीन अहमद ने पार्टी की ओर से घोषणा की कि बीएनपी सांसद संविधान सुधार परिषद के सदस्य के रूप में शपथ नहीं लेंगे। यह घोषणा तारिक रहमान की मौजूदगी में की गई।
BNP पर भड़की जमात और एनसीपी
इसके बाद जमात और एनसीपी नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। जमात के उप प्रमुख सैयद अब्दुल्ला मुहम्मद ताहर ने स्थानीय अखबार Prothom Alo से कहा कि यदि बीएनपी सांसद संविधान परिषद की शपथ नहीं लेते हैं तो जमात सांसद भी किसी प्रकार की शपथ नहीं लेंगे। वहीं एनसीपी की संयुक्त संयोजक मोनिरा शारमिन और सांसद अब्दुल्ला एल अमीन ने भी इसी तरह की चिंता जताई और सड़क पर उतरने का ऐलान कर दिया। हालांकि बाद में गठबंधन के भीतर लंबी चर्चा के बाद फैसला लिया गया कि अन्य दल शपथ प्रक्रिया पूरी करेंगे। रिपोर्ट के अनुसार जमात और एनसीपी सांसदों ने संसद और संविधान सभा दोनों के सदस्य के रूप में शपथ ले ली, जबकि बीएनपी सांसदों ने कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल के सदस्य के तौर पर शपथ नहीं ली है।

सड़कों पर आंदोलन की चेतावनी
इसी बीच जमात नेताओं ने चुनावी गड़बड़ियों और हिंसा के आरोप लगाते हुए सड़कों पर आंदोलन की चेतावनी दी है। पार्टी महासचिव मिया गोलम पोरवार ने द बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि चुनावी अनियमितताओं और हिंसा ने जनता की उम्मीदों को तोड़ दिया है। उन्होंने इसे तानाशाही प्रवृत्ति से जोड़ते हुए तीखी आलोचना की। बहरहाल, नई सरकार के शपथ लेने से पहले ही बांग्लादेश में नया विवाद और हंगामा उबाल मारने लगा है। वहां राजनीतिक बयानबाजी में “फासीवाद” शब्द फिर से चर्चा में आ चुका है, जिसका इस्तेमाल पहले शेख हसीना और उनकी पार्टी अवामी लीग के खिलाफ आंदोलन के दौरान किया गया था। अब यही शब्द बीएनपी नेतृत्व के खिलाफ भी इस्तेमाल हो रहा है।
फिर अस्थिर हो सकता है बांग्लादेश
इस बीच, एनसीपी के मुख्य आयोजकनसीरुद्दीन पटवारी ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध और राजनीतिक दमन के खिलाफ आंदोलन जारी रहेगा। विश्लेषकों का मानना है कि शपथ विवाद और संवैधानिक सुधार को लेकर मतभेद आने वाले दिनों में बांग्लादेश की राजनीति को और अस्थिर कर सकते हैं।

लेखक के बारे में
Pramod Praveenप्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।
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