जंजीरों में जकड़े भारतीय, फिर फ्लाइट में ठूंसा; अमेरिकी क्रूरता के पीछे छुपा है अरबों का बिजनेस

लाइव हिन्दुस्तान, वाशिंगटन
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अमेरिका में अवैध प्रवासियों को वापस भेजने की कार्रवाई अब अरबों डॉलर के मुनाफे वाले बिजनेस में बदल चुकी है। जानिए कैसे टेक फर्म, प्राइवेट जेल और एयरलाइंस कंपनियां अमेरिकी सरकार के 165 अरब डॉलर के बजट से बंपर कमाई कर रही हैं।

जंजीरों में जकड़े भारतीय, फिर फ्लाइट में ठूंसा; अमेरिकी क्रूरता के पीछे छुपा है अरबों का बिजनेस

हाल ही में अमेरिका से डिपोर्ट किए गए भारतीयों की तस्वीरें और उनकी आपबीती ने दुनिया भर का ध्यान खींचा है। इन लोगों को किसी खूंखार अपराधी की तरह हाथों में हथकड़ियां और पैरों में भारी जंजीरें बांधकर, बेहद अमानवीय परिस्थितियों में चार्टर विमानों में ठूंस कर भारत वापस भेजा गया। घंटों तक बिना किसी बुनियादी सुविधा के बेड़ियों में जकड़े रहना केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़े और काले सच की तरफ इशारा करता है। अमेरिका में घुसपैठ और अवैध प्रवासन पर हो रही इस सख्त कार्रवाई के पीछे केवल राजनीतिक या सुरक्षा के मुद्दे नहीं हैं। इसके पीछे एक अरबों डॉलर की इंडस्ट्री काम कर रही है, जिसके लिए हर एक डिपोर्ट किया जाने वाला इंसान महज एक 'मुनाफे का आंकड़ा' है।

अमेरिकी कांग्रेस के 'वन बिग ब्यूटीफुल बिल' के जरिए अगले चार सालों में होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) में लगभग 165 अरब डॉलर का फंड दिया जा रहा है। इस भारी-भरकम बजट से सीधा फायदा बड़ी कंपनियों को मिल रहा है। आइए समझते हैं कि इस बिलियन डॉलर वाले डिपोर्टेशन बिजनेस में किसकी और कैसे कमाई हो रही है।

बेड़ियों में जकड़े इंसान: अमेरिकी क्रूरता की असल वजह

जब किसी भारतीय या अन्य देश के नागरिक को अवैध रूप से सीमा पार करने के आरोप में पकड़ा जाता है, तो उसे डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू होती है। लेकिन इन लोगों को जंजीरों में क्यों बांधा जाता है? सुरक्षा के नाम पर निजी कॉन्ट्रैक्टर्स प्रवासियों के साथ क्रूर व्यवहार करते हैं। हाथ-पैरों में जंजीरें और कमर में बेल्ट बांधना इन निजी कंपनियों के लिए "लागत कम करने" और "नियंत्रण बनाए रखने" का एक क्रूर तरीका है, ताकि कम गार्ड्स के साथ ज्यादा से ज्यादा लोगों को एक बार में ट्रांसपोर्ट किया जा सके। इस अमानवीय व्यवहार का सीधा संबंध उस मुनाफे से है जो निजी कंपनियां इन प्रवासियों की मजबूरी और खौफ से कमा रही हैं।

अरबों डॉलर का डिपोर्टेशन बिजनेस: कौन भर रहा है अपनी जेबें?

डिपोर्टेशन कोई साधारण सरकारी प्रक्रिया नहीं रह गई है; यह एक पूरा कॉर्पोरेट इकोसिस्टम बन चुका है। इमिग्रेशन और कस्टम्स एन्फोर्समेंट (ICE) का बजट आज अरबों डॉलर में है, जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा प्राइवेट कंपनियों की जेब में जाता है। इस क्रैकडाउन से मुख्य रूप से चार सेक्टर अंधाधुंध पैसा कमा रहे हैं:

प्राइवेट जेल और डिटेंशन सेंटर

अमेरिका में ज्यादातर इमिग्रेशन डिटेंशन सेंटर प्राइवेट कंपनियों (जैसे GEO Group और CoreCivic) द्वारा चलाए जाते हैं। सरकार इन कंपनियों को प्रति कैदी, प्रति दिन के हिसाब से पैसे देती है। जितने ज्यादा लोग पकड़े जाएंगे और जितने लंबे समय तक जेल में रहेंगे, इन कंपनियों का मुनाफा उतना ही बढ़ेगा। इन सेंटर्स में खर्च बचाने के लिए प्रवासियों को घटिया खाना और खराब मेडिकल सुविधाएं दी जाती हैं।

चार्टर एयरलाइंस और 'ICE Air'

भारतीयों को वापस लाने वाले विमान नियमित कमर्शियल फ्लाइट्स नहीं होते। ICE (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स इंफोर्समेंट) निजी एयरलाइंस के साथ करोड़ों डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट करता है। इस नेटवर्क को अनौपचारिक रूप से "ICE Air" कहा जाता है। ये प्राइवेट चार्टर कंपनियां एक फ्लाइट के लिए भारी-भरकम रकम वसूलती हैं।

प्रवासियों को वापस भेजने के लिए चार्टर उड़ानों का एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है, जिससे एयरलाइंस की चांदी हो रही है।

CSI एविएशन: यह प्राइवेट ब्रोकर कंपनी अमेरिकी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) के फ्लाइट नेटवर्क का मुख्य केंद्र है। इसे बिना टेंडर के 6 महीने के लिए 78.1 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट मिला है, जो बढ़कर 162.2 मिलियन डॉलर तक जा सकता है।

ग्लोबलएक्स: यह सब-कैरियर कंपनी DHS की लगभग 70% डिपोर्टेशन उड़ानों को संभालती है। अगस्त में इसे 65 मिलियन डॉलर प्रति वर्ष का 5 साल का बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिला है। (जुलाई में ऐसी उड़ानों की संख्या 1,214 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी।)

अवेलो: एक कंज्यूमर एयरलाइन होने के बावजूद यह कंपनी अब इमिग्रेशन मिशन के तहत प्रवासियों को ले जाने का काम कर रही है, जो अपने आप में अप्रत्याशित है।

सिक्योरिटी और ट्रांसपोर्ट कॉन्ट्रैक्टर्स

डिटेंशन सेंटर से लेकर एयरपोर्ट तक प्रवासियों को ले जाने, उन्हें जंजीरों में बांधने और फ्लाइट के अंदर पहरा देने का काम निजी सिक्योरिटी कंपनियों को आउटसोर्स किया जाता है। क्रूरता की जो तस्वीरें सामने आती हैं, वे अक्सर इन्हीं प्राइवेट गार्ड्स की देन होती हैं, जिनकी ट्रेनिंग मानवाधिकारों से ज्यादा 'भीड़ को नियंत्रित' करने पर केंद्रित होती है।

टेक और सर्विलांस

बॉर्डर पर सिर्फ फिजिकल दीवारें ही नहीं बन रहीं, बल्कि 'डिजिटल वॉल' (निगरानी तंत्र) के नाम पर भी अरबों खर्च हो रहे हैं। नए कानून के तहत बॉर्डर सर्विलांस के लिए 6 बिलियन डॉलर और बायोमेट्रिक्स के लिए 673 मिलियन डॉलर का भारी-भरकम फंड रखा गया है।

पलांटिर: इसे ICE के लिए 'ImmigrationOS' नाम का डेटा हब बनाने के लिए 30 मिलियन डॉलर का ठेका मिला है, ताकि रियल-टाइम निगरानी हो सके।

एंडुरिल इंडस्ट्रीज: ऑटोमैटिक सर्विलांस टावर लगाने के लिए इसे 41.86 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया है।

लेक्सिसनेक्सिस: फेशियल रिकग्निशन (चेहरा पहचानने वाली तकनीक) और डेटा पाइपलाइन तैयार करने के लिए इस कंपनी ने 22 मिलियन डॉलर की डील हासिल की है।

प्राइवेट डिटेंशन सेंटर्स: जेलों के नाम पर करोड़ों के ठेके

प्राइवेट इमिग्रेशन जेल और हिरासत केंद्र चलाने वाली कंपनियों का मुनाफा इस समय आसमान छू रहा है।

जियो ग्रुप (GEO Group): इस कंपनी को टेनेसी के मेसन में 600 बेड की क्षमता वाली एक बंद जेल को फिर से ICE साइट के रूप में खोलने की मंजूरी मिली है। अगस्त 2030 तक चलने वाले इस कॉन्ट्रैक्ट से कंपनी हर साल 30 से 35 मिलियन डॉलर कमाएगी। इसके अलावा नेवार्क में भी कंपनी ने 15 साल की एक प्राइवेट डिटेंशन डील हासिल की है।

एक्विजिशन लॉजिस्टिक्स: इसे टेक्सास के अल पासो में 5,000 बेड का शॉर्ट-टर्म डिटेंशन सेंटर बनाने के लिए 1.24 बिलियन (अरब) डॉलर का ठेका मिला है। इसे फोर्ट ब्लिस में अमेरिका का सबसे बड़ा ICE सेंटर बनाने का काम सौंपा गया है।

अकिमा इंफ्रास्ट्रक्चर: ग्वांतानामो बे में DHS की माइग्रेंट डिटेंशन फैसिलिटी को संचालित करने के लिए इस कंपनी के पास 2029 तक के लिए 163.4 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट है।

मुनाफे और क्रूरता का सीधा संबंध

जब इमिग्रेशन को एक बिजनेस मॉडल में बदल दिया जाता है, तो इंसानियत पीछे छूट जाती है। प्राइवेट जेलों और चार्टर उड़ानों का सीधा वित्तीय हित इसी बात में है कि इमिग्रेशन नीतियां सख्त हों, ज्यादा से ज्यादा लोग पकड़े जाएं और उन्हें डिपोर्ट किया जाए।

भारतीयों के हाथ-पैरों में बांधी गई जंजीरें केवल अमेरिका की सख्त इमिग्रेशन नीति का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह दिखाती हैं कि कैसे एक अरबों डॉलर का उद्योग इंसानी गरिमा को कुचलकर अपना मुनाफा कमा रहा है। जब तक डिपोर्टेशन एक मुनाफे का सौदा बना रहेगा, तब तक प्रवासियों के खिलाफ यह क्रूरता और ज्यादती सिस्टम का हिस्सा बनी रहेगी।

Amit Kumar

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डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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