11 देशों ने मिडल ईस्ट में तबाह हुए मुल्कों की मदद का किया ऐलान, IMF और वर्ल्ड बैंक से क्या गुहार?

Apr 15, 2026 10:19 pm ISTPramod Praveen रॉयटर्स, लंदन
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यूरोपीय संघ ने भी अलग से मिडल ईस्ट के तबाह हुए इलाकों के लिए 458 मिलियन यूरो यानी लगभग 4,100 करोड़ रुपये  की मानवीय सहायता की पुष्टि की है।

11 देशों ने मिडल ईस्ट में तबाह हुए मुल्कों की मदद का किया ऐलान, IMF और वर्ल्ड बैंक से क्या गुहार?

ब्रिटेन और जापान समेत 11 देशों के वित्त मंत्रियों ने ईरान जंग में तबाह हुए मध्य-पूर्व के मुल्कों की ‘समन्वित’ आर्थिक मदद की अपील की है। इन देशों ने बुधवार (15 अप्रैल) को विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से अपील की है कि प्रभावित देशों को "समन्वित आपातकालीन सहायता" उपलब्ध कराई जाए, ताकि जरूरत के हिसाब से वित्तीय मदद और लचीले टूलकिट उपलब्ध कराए जा सकें। ब्रिटिश सरकार द्वारा जारी एक संयुक्त बयान में मंत्रियों ने कहा, "हम IMF और विश्व बैंक से अपील करते हैं कि वे ज़रूरतमंद देशों को समन्वित आपातकालीन सहायता प्रदान करें; यह सहायता उन देशों की परिस्थितियों के अनुरूप हो और इसमें उनके पास उपलब्ध सभी संसाधनों और लचीलेपन का पूरा इस्तेमाल किया जाए।"

बयान में आगे कहा गया है, “अगर ईरान-अमेरिका के बीच शत्रुता फिर से शुरू हुई या संघर्ष का दायरा बढ़ा या होर्मुज़ समुद्री मार्ग में लगातार बाधाएं आती रहीं तो ये वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, उनकी सप्लाई चेन और दुनिया की आर्थिक और वित्तीय स्थिरता के लिए यह गंभीर अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकती हैं।”

इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत पर 58 अरब डॉलर तक का खर्च

इस बीच, रायटर्स ने ऊर्जा रिसर्च कंपनी Rystad Energy के डेटा का हवाला देते हुए बताया है कि मध्य-पूर्व युद्ध के कारण इस क्षेत्र को ऊर्जा से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत पर 58 अरब डॉलर तक का खर्च उठाना पड़ सकता है; इसमें अकेले तेल और गैस सुविधाओं पर ही 50 अरब डॉलर तक का खर्च शामिल है। यह अनुमान रिसर्च फर्म के तीन हफ़्ते पहले के शुरुआती 25 अरब डॉलर के अनुमान से काफ़ी ज़्यादा है। यह 8 अप्रैल को US और ईरान के बीच हुए संघर्ष-विराम से पहले हुए नुकसान के व्यापक दायरे को दर्शाता है।

मरम्मत से कोई नई क्षमता नहीं बनेगी

Rystad के सीनियर एनालिस्ट करण सतवानी कहते हैं, “मरम्मत के काम से कोई नई क्षमता नहीं बनती। यह मौजूदा क्षमता को दूसरी तरफ़ मोड़ देता है, और इस बदलाव का असर प्रोजेक्ट में देरी और महंगाई के रूप में मध्य-पूर्व से कहीं दूर तक महसूस किया जाएगा।” उन्होंने कहा कि 58 अरब डॉलर का बिल तो सिर्फ़ मुख्य बात है, लेकिन वैश्विक स्तर पर ऊर्जा निवेश की समय-सीमा पर पड़ने वाले इसके दूरगामी प्रभाव भी उतने ही महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।”

Rystad का कहना है कि मरम्मत पर कुल खर्च औसतन लगभग 46 अरब डॉलर रहने की संभावना है; इसमें डाउनस्ट्रीम रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल संपत्तियों का हिस्सा सबसे ज़्यादा होगा, क्योंकि वे काफ़ी जटिल होती हैं और उन्हें नुकसान भी बड़े पैमाने पर हुआ है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि औद्योगिक, बिजली और विलवणीकरण (desalination) संपत्तियों की मरम्मत पर अतिरिक्त 3 अरब से 8 अरब डॉलर तक का खर्च आ सकता है।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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