Meditation is to go in search of meaningful life - सार्थक जीवन की खोज में उतरना है ध्यान DA Image
14 दिसंबर, 2019|5:24|IST

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सार्थक जीवन की खोज में उतरना है ध्यान

ईश्वर तक पहुंचने के जितने भी मार्ग हैं, वे ध्यान के ही विभिन्न रूप हैं। मनुष्य का मन समस्याओं की जड़ है और ध्यान उन समस्याओं का समाधान। ध्यान व्यक्ति को कर्ता-भाव से मुक्त कर साक्षी-भाव में प्रतिष्ठित करता है और व्यक्ति जब कर्ता-भाव से मुक्त हो जाता है, तब वह दिव्य हो जाता है।

बीज को स्वयं की संभावनाओं का कोई भी पता नहीं होता है। ऐसा ही मनुष्य भी है। उसे भी पता नहीं है कि वह क्या है, क्या हो सकता है। लेकिन, बीज शायद स्वयं के भीतर झांक भी नहीं सकता है। पर मनुष्य तो झांक सकता है। यह झांकना ही ध्यान है। स्वयं के पूर्ण सत्य को अभी और यहीं जानना ही ध्यान है। ध्यान में उतरें - गहरे और गहरे। गहराई के दर्पण में संभावनाओं का पूर्ण प्रतिफलन उपलब्ध हो जाता है। और जो हो सकता है, वह होना शुरू हो जाता है। जो संभव है, उसकी प्रतीति ही उसे वास्तविक बनाने लगती है। बीज जैसे ही संभावनाओं के स्वप्नों से आंदोलित होता है, वैसे ही अंकुरित होने लगता है। शक्ति, समय और संकल्प सभी ध्यान को समर्पित कर दें, क्योंकि ध्यान ही वह द्वारहीन द्वार है, जो स्वयं को ही स्वयं से परिचित कराता है। 

विवेक ही अंतत: श्रद्धा के द्वार खोलता है। विवेकहीन श्रद्धा, श्रद्धा नहीं, मात्र आत्म-प्रवंचना है। ध्यान से विवेक जगेगा। वैसे ही जैसे सूर्य के आगमन से भोर में जगत जाग उठता है। ध्यान पर श्रम करें, क्योंकि अंतत: शेष सब श्रम समय के मरुस्थल में कहां खो जाता है, पता ही नहीं पड़ता है। हाथ में बचती है केवल ध्यान की संपदा। और मृत्यु भी उसे नहीं छीन पाती है, क्योंकि मृत्यु का वश काल के बाहर नहीं है। इसलिए तो मृत्यु को काल कहते हैं। ध्यान ले जाता है कालातीत में। समय और स्थान, अंतरिक्ष के बाहर। अर्थात अमृत में। काल है विष, क्योंकि काल है जन्म; काल है मृत्यु। ध्यान है अमृत, क्योंकि ध्यान है जीवन। ध्यान पर श्रम, जीवन पर ही श्रम है। ध्यान की खोज, जीवन की ही खोज है। 

ध्यान के लिए श्रम करो। मन की सब समस्याएं तिरोहित हो जाएंगी। असल में तो मन ही समस्या है। शेष सारी समस्याएं तो मन की प्रतिध्वनियां मात्र हैं। एक-एक समस्या से अलग-अलग लड़ने से कुछ भी न होगा। प्रतिध्वनियों से संघर्ष व्यर्थ है। पराजय के अतिरिक्त उसका और कोई परिणाम नहीं है। शाखाओं को मत काटो, क्योंकि एक शाखा के स्थान पर चार शाखाएं पैदा हो जाएंगी। शाखाओं के काटने से वृक्ष और भी बढ़ता है। और समस्याएं शाखाएं हैं। काटना ही है तो जड़ को काटो, क्योंकि जड़ के कटने से शाखाएं अपने आप ही विदा हो जाती हैं। और मन है जड़। इस जड़ को काटो ध्यान से। मन है समस्या। ध्यान है समाधान। मन में समाधान नहीं है। ध्यान में समस्या नहीं है। ध्यान की अनुपस्थिति है मन। मन का अभाव है ध्यान। इसलिए कहता हूं- ध्यान के लिए श्रम करो। 

मन के रहते शांति कहां? क्योंकि वस्तुत: मन ही अशांति है। इसलिए शांति की दिशा में मात्र विचार से, अध्ययन से, मनन से कुछ भी न होगा। विपरीत मन और सबल भी हो सकता है; क्योंकि वे सब मन की ही क्रियाएं हैं। हां, थोड़ी देर को विराम जरूर मिल सकता है; जो शांति नहीं, बस अशांति का विस्मरण मात्र है। इस विस्मरण की मादकता से सावधान रहना। शांति चाहिए तो मन को खोना पड़ेगा। मन की अनुपस्थिति ही शांति है। साक्षी भाव से यही होगा। विचार, कर्म- सभी क्रियाओं के साक्षी बनो। कर्ता न रहो। साक्षी बनो।

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