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इमाम हुसैन की शहादत आज भी लोगों को दिखाती है राह

मुहर्रम की 10वीं तारीख को हजरत इमाम हुसैन की शहादत के रूप में याद किया जाता है। पटना सिटी सहित शहर के इमामबाड़ों में हजरत इमाम हुसैन की याद में मातम की मजलिस सहित कई तरह के एहतेमाम का दौर जारी रहा। राजधानी और आसपास के इलाकों में मंगलवार को ताजिया के अखाड़ों में मुहर्रम को लेकर काफी भीड़ रही। पटना सिटी में अलग-अलग अखाड़ों से मुहर्रम का जुलूस निकला। करबला में ताजिया मिलान किया गया। मुस्लिम घरों में हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के नवासे इमाम हुसैन की याद में कुरआनख्वानी और फातिहा भी हुआ।

इस्लामी जानकारों के अनुसार 10 मुहर्रम 61 हिजरी (680 ई) को करबला के मैदान में इमाम हुसैन को यजीदों ने शहीद कर दिया। हजरत हुसैन ने यजीद के साथ जो जंग लड़ी, उसका मकसद सत्ता या सिंहासन प्राप्त करना नहीं था, बल्कि इस्लाम धर्म के उसूल के मुताबिक खिलाफत हासिल करना था। इसलिए हजरत हुसैन ने यजीद की खिलाफत मानने से इंकार कर दी और सत्य के लिए यजीद से जंग करने को तैयार हो गए। हजरत हुसैन ने यजीद को यह समझाने की हर मुमकिन कोशिश की कि वादे के मुताबिक वह खुद को खलीफा घोषित न करे और तमाम मुसलमानों से सलाह-मशविरा के बाद कोई फैसला लिया जाए, लेकिन यजीद नहीं माना। अगर हजरत हुसैन का जंग करना मकसद होता, तो वे अपने साथ लश्कर ले कर निकलते।

हक पर कुर्बान होने की मिसाल
इतिहास गवाह है कि हजरत हुसैन के साथ उनके अपने खानदान के लोग और कुछ अन्य सहयोगियों, जिनकी तादाद केवल 72 थी और जिनमें औरतें व बच्चे भी शामिल थे, जबकि दूसरी तरफ यजीद के लश्कर की तादाद हजारों में थी। इससे यह साबित हो जाता है कि हजरत हुसैन किसी तरह भी इस जंग को टालना चाहते थे, लेकिन कुदरत को तो कुछ और ही मंजूर था। दुनिया को यह सबक सिखाना था कि सत्य के लिए बड़ी से बड़ी ताकतों के सामने झुकना नहीं है और असत्य को हर हाल में अस्वीकार करना है, लेकिन यजीद और उसकी फौज ने 10वीं मुहर्रम को हजरत हुसैन और उनके सहयोगियों को शहीद कर डाला।

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  • Web Title:There was a lot of crowd in Muharram in Patna