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बदले-बदले से हैं थिएटर के तेवर...

रंगमंच के मायने काफी बदल चुके हैं। अब नाटकों में हॉरर से लेकर बायोग्राफी तक बहुत कुछ नजर आने लगा है। तकनीक भी थिएटर में आई इन तब्दीलियों में पूरा साथ निभा रही है। दर्शकों को भी नाटकों का यह नया अंदाज पसंद आ रहा है। सारा हाल बताता ज्योति द्विवेदी का आलेख 

हंसाने, रुलाने और सोचने पर मजबूर कर देने वाले नाटकों के बारे में तो आपने सुना ही होगा। थिएटरप्रेमी हैं, तो इन सभी एहसासों में रचे-बसे नाटक देखे भी होंगे। पर अब एक नाटक ऐसा होने जा रहा है, जो आपको डराएगा। ‘ओवी’ नामक यह नाटक नमूना है नाटकों के मिजाज में हौले-हौले आ रही तब्दीलियों का। अगर आपने काफी समय से कोई नाटक नहीं देखा है, तो आपके लिए यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि इन दिनों नाटकों की कहानियों और प्रस्तुतिकरण में बिल्कुल वैसे ही बदलाव आ रहे हैं, जैसे फिल्मों की कहानियों और फिल्मांकन में आए हैं। इनमें एक नयापन है, एक ताजगी है, आज के दौर से सीधा जुड़ाव है। 
नए विषय, नई कहानियां
फिल्मों को वेब की तरह थिएटर भी अब समझ चुका है कि दर्शकों को नई कहानियां दिखानी ही होंगी। जिन कहानियों पर सालोंसाल से नाटक रचे जाते रहे थे, अब उनमें दर्शकों की दिलचस्पी कम हुई है और यह लाजिमी भी है। शायद यही वजह है कि अब नाटककार नई कहानियों के साथ दर्शकों से रूबरू हो रहे हैं। ऐसा ही एक नाटक पिछले हफ्ते राजधानी दिल्ली में फिल्माया गया। ‘आइंस्टीन’ नामक इस नाटक में एक्टर नसीरुद्दीन शाह ने मुख्य भूमिका निभाई। अल्बर्ट आइंस्टीन के मन के भीतर झांकने की कोशिश करते इस नाटक से उस दर्द की झलक मिली, जो उनके दिल में लंबे समय तक रहा था। साथ ही झलक मिली एक पछतावे और अपराधबोध की! दरअसल विज्ञान के जिस सिद्धांत का उन्होंने आविष्कार किया था, उसी के बलबूते कुछ लोगों ने एटम बम बना डाला और विश्व युद्ध में उससे खूब तबाही मचाई। उनके मन की इन गिरहों को टटोलते इन नाटकों में आइंस्टीन का एक अलग ही रूप नजर आया। सफेद घुंघराले बालों वाला विग लगाए नसीर साहब के चेहरे-मोहरे का हकीकत में भी आइंस्टीन से मेल खाना एक खूबसूरत इत्तेफाक था, पर इस इकलौते इत्तेफाक की बदौलत इस नाटक में एक अलग ही नूर आ गया। नसीरुद्दीन शाह कहते हैं,‘एक बार मेरे एक प्रशंसक ने मुझे मेरी एक ड्रॉइंग बना कर भेजी थी, जिसे देखकर मुझे लगा, मैं तो आइंस्टीन की तरह दिखता हूं! मुझे वैसे तो फिजिक्स के पेपर में जीरो मिलता था, पर मैं भावनाओं को समझता हूं। यह नाटक वैज्ञानिक आइंस्टीन की नहीं, बल्कि बतौर एक इनसान आइंस्टीन की कहानी है।’ इस नाटक का निर्देशन भी नसीरुद्दीन शाह ने ही किया था। 
बायोग्राफी का दौर
बॉलीवुड में इन दिनों हस्तियों की जिंदगी पर आधारित बायोग्राफी का दौर है, इसमें कोई शक नहीं है। ठीक उसी तरह बायोग्राफिकल थिएटर का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है। इसी चलन का हिस्सा रहा आरिफ जकारिया और सोनाली कुलकर्णी निर्देशिक थिएटर ‘गर्दिश में तारे’। इस शो में महान एक्टर व फिल्ममेकर गुरु दत्त और उनकी पत्नी गीता दत्त की प्रेम कहानी को दिखाया गया। इस म्यूजिकल प्ले में गुरु दत्त जैसे जीनियस के अवसाद में आने की वजहों और गीता दत्त के जीवन की त्रासदी को दिखाया गया। 
धुंधली होती लक्ष्मण रेखा
एक वक्त था जब थिएटर और फिल्मों के एक्टर, टेक्नीशियन, डायरेक्टर और लेखक अमूमन अलग-अलग होते थे। ज्यादातर दूसरे क्षेत्र में काम करने में झिझकते थे या दिलचस्पी नहीं लेते थे। पर, अब ऐसी कोई सीमाएं नहीं रहीं। अब थिएटर के लोग मौका मिलते ही फिल्मों में भी हाथ आजमा रहे हैं तो फिल्म वाले थिएटर में काम कर रहे हैं। वेब के लोग भी फिल्मों और थिएटर में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। बड़े-बड़े फिल्म एक्टर्स के लिए फिल्मों के साथ ही नाटकों में भी काम करते रहना एक प्रतिष्ठा की बात मानी जा रही है। 

आसान नहीं, मंच पर डर का माहौल बनाना : रोहित 
भारत में यूं तो रामसे ब्रदर्स के दौर से हॉरर मनोरंजन किया जाता रहा है, पर अब दर्शकों के सामने ‘क्लासी हॉरर’ पेश किया जा रहा है। तकनीक की इसमें बहुत बड़ी भूमिका है। उसी के बलबूते यह संभव हो पा रहा है। एक हॉरर नाटक बनाना हॉरर फिल्म बनाने की तुलना में कहीं ज्यादा कठिन है। हॉरर फिल्म में आप सीजीआई जैसे कम्प्यूटर स्पेशल इफेक्ट्स की मदद ले सकते हैं। हर दृश्य कई छोटे-छोटे दृश्यों में बंटा होता है, जिनके कई रीटेक होते हैं, पर नाटक के मामले में ऐसा नहीं होता। हॉरर नाटकों के मामले में लाइट और साउंड इफेक्ट होते हैं, पर उनके साथ लय मिलाते हुए एकदम सही वक्त पर संवाद अदायगी करना काफी चुनौती भरा होता है। 

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  • Web Title:There are changes in theater